Friday, 26 August 2016

यही नारी की गौरव गाथा है



       फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा से लेकर कई सारे लोग रियो ओलम्पिक में भारत को मिले दो पदको को लेकर विवादित टिप्पणी लिए घूम रहे है, तो वहीं सनल कुमार शशिधरन जैसे लोग थूक भी रहे है| हो सकता है इन लोगों की यह कोई मानसिक वृति हो! पर असलियत में देश इन बेटियों की जीत पर प्रसन्न होकर नाच रहा है| बस वो लोग ज्यादा दुखी दिखाई दिए जा रहे है जो लड़कियों की चाल और कपड़े की नाप से संस्कृति का क्षेत्रफल नापते हैं, जो हदें बनाते हैं उनके होने की, उनके जीने की| परेशान है वो जिनको उनके उछलने से सभ्यता दरकती दिखाई देती है| शायद इस सोच से अपने देश की महिलाएं वर्षो से लड़ भी रही है| मैं कोई कलयुग की भागवत कथा नहीं कहता कि मसाला मिलाता-मिलाता लोगों को आनंद में सराबोर कर दूँ| नहीं! बस एक चर्चा है जो होनी चाहिए वरना ओलम्पिक के 2 पदकों की वाह-वाह में सच की वो आह दब जाएगी जो घुटन लेकर जी रही है| जैशा प्यासी होकर भी मैराथन में भागी, साइना घुटने में चोट थी पर इसके बावजूद भी खेली। साक्षी जीत गयी, देश की बेटी जीत गयी| पर अचानक शोर मचा नहीं यार वो जाट की बेटी थी| जब वो बेटियां खेल रही थी इस देश के लोग ही थे जो इन्टरनेट उनकी जाति तलाश कर रहे थे शायद बेशर्मी की इससे बड़ी मिसाल किसी और देश में ना मिले? इस काम में गोल्ड मेडल मिलना चाहिए ना? सिंधू हार कर भी जीत गयी भले ही सिल्वर पदक मिला हो! किसी ने सिंधू की जीत पर थूका तो किसी ने साक्षी पर धार्मिक टिप्पणी की| शायद लोग भूल जाते है कि हार जीत तो युद्ध हो या हर एक खेल का उसका हिस्सा होता है| ये तो ओलम्पिक था यहाँ कोई हारता है तो कोई जीतता है, मगर सब वो खिलाड़ी सम्मानीय है जो ओलंपिक जैसे स्थान तक पहुँचते हैं।
 लड़के ही क्यों, कुछ लड़कियां भी सोच रही होगी! पता नहीं कैसे घरवाले होते है इन महिला खिलाडियों के  बड़ा पत्थर का जिगर होता होगा उनके घरवालों का जो अनजान लोगों के साथ अपनी लड़कियों को विदेश में खेलने भेज देते है| हमें तो हमारे घरवाले मामा- फूफा व् अन्य रिश्तेदारी में भी अकेली नहीं जाने देते| हम तो दसवीं के बाद इस वजह से घर बैठा लिए थे कि आगे का स्कूल पडोस के गाँव या शहर में था| दरअसल भारत जैसे देश में एक लड़की के रूप में जन्म लेकर दो पदक झटकना कोई मामूली बात नहीं है| उस देश में जहाँ साल दो साल से भी कम उम्र की बच्चियां भी कभी कभी दरिंदो की वासना का शिकार हो जाती है,| जहाँ लाखो लड़कियां पैदा होने से पहले गर्भ में में ही मार दी जाती हो!, जहाँ एक लड़की को स्कूल जाने के लिए मिन्नते करनी पड़ती हो| आमतौर पर हमारे भारतीय परिवेश में एक लड़का जब घर से खेलने जाता है तो उस पर कोई प्रतिबंध नहीं होता यदि उसका खेल की तरफ झुकाव है तो ज्यादातर परिवार उसे सहारा देते दिखाई देते है| किन्तु जब ग्रामीण परिवेश में रहने वाली एक लड़की इस फैसले के बारे में सोचती है तो उसका मन सबसे पहले ये सवाल करता है कि पता नही घरवाले मानेंगे या नहीं? क्योकि जिस समाज में लड़की को पैरो से बिना आवाज किये चलना सिखाया जाता हो, उसे बताया जाता हो धप-धप की आवाज किये बिना चलना है| उसे नजरें कितनी उठाकर बात करनी है, हँसना है कितनी जोर से हँसना है|
 जिस देश में लड़कियों के लिए यह आदर्श मापदंड बनाया गया हो कि मर्दों के खाना खाने के बाद उसे खाना है|  झाड़ू लगाते समय गले को चुन्नी से कितना ढकना है, सूट का आगे से गला इतना, और सलवार की मोहरी के साथ सूट का पल्लू कितना होना चाहिए, कुल्हे से इतना नीचे पल्लू का कट तक तय किया जाता हो| जहाँ उसे पुरुष की मर्दानगी में झुलसना पड़ता हो, उसे सिखाया जाता हो कि चूल्हे से आगे सोचना उसके लिए बेकार है| जहाँ उसे घर का कोई काम मना करने पर कभी भाई का मुक्का तो कभी माँ बाप की झिड़क खानी पड़ती हो! भला उस देश में उसका उछलना, कूदना छोटे कपडे पहनना कोई कैसे स्वीकार करेगा? इसके बाद भी वो सोचती है यदि पापा मान गये तो दादा-दादी, माँ मान गयी तो ताऊ या चाचा-चाची इन सबकी स्वीकृति भी लेनी पड़ती हो| इसके बाद भी प्रश्न समाप्त नहीं होते| फिर बात आती है कहाँ और किसके साथ खेलेगी? कोच कौन होगा? किसके साथ रहेगी? किसके साथ आएगी जाएगी? पडोस क्या कहेगा, आदि आदि प्रश्न भी खड़े होते है| इसके बाद यदि सब मामले ठीक-ठाक सुलझ जाये तो उसे परिवार की इज्जत मान का मांझा एक घोषित सामाजिक क्षेत्रफल में पकड़कर उड़ना पड़ता है|
 शुक्र है ईश्वर का दोनों गर्भ से बचकर रियो तक पहुंची वरना भारतीय दल खाली हाथ उल्टा लौटता| साक्षी और सिंधु  दोनों बधाई की हकदार है। दोनों का धन्यवाद् इस देश के लोगो को एक सीख देने के लिए कि औरतों को चूल्हे चौके में मत रखो, उसे हिम्मत दी जाये उसका शोषण बंद हो तो वो देश के लिए पदक भी जीत सकती है| अब लोगों को सिंधू के गले में लटके चांदी और साक्षी के तांबे पर अपना हक जताने और उसे देश की बेटी कहने से पहले, हर उस बेटी को भी स्वीकार करना होगा जिसके जिस्म से सरेआम कपड़े उतार लिए जाते हैं। जो हर रोज बस ट्रेन भीड़ में अपने अंगो पर कसी फब्तियों से खरोंची जाती है|सालों से अपने अस्तित्व के लिए लड़ती इन बेटियों की मेहनत पर, अगर अपनी इच्छाओं की रोटियां सेक ही रहे हो तो उन बेटियों को भी सम्मान व न्याय दिया जाना चाहिए, जो रेप का शिकार हुई आज कमरे के कोने में दुबककर साक्षी, सिंधू के सम्मान के आयोजन को लाइव देख रही है, नारी शक्ति पर बड़े-बड़े भाषण सुन रही है| इस देश के लोगों को एक महिला से प्रेम भी चाहिए, साथ में बच्चें भी, वो ही अच्छी तरह घर में झाड़ू पोछा करे और सबके जूते भी साफ करें, वो मार भी खाए पर आह ना करें| वो अपने चरित्र की रक्षा करते हुए मेडल भी जीत कर लाये इस देश में स्त्री का चरित्र कहाँ होता है घुटनों से ऊपर और पेट से निचे के स्थान को चरित्र का केंद्र समझा जाता इस स्थिति से पार पाकर यदि कोई लड़की ओलम्पिक जैसे महा मुकाबले के लिए देश की तरफ से क्वालीफाई करती है यही बहुत बड़ा सम्मान और गर्व है और यदि पदक जीत ले ये उस नारी की गौरव गाथा है| अब चाहें इसे शीश नवाकर स्वीकार करे या हलक में ऊँगली डलवाकर निर्णय हमारा है!! राजीव चौधरी

Tuesday, 23 August 2016

नेता इस मुद्दे को चखने को तैयार नहीं है|



सरकार की लापरवाही से जब कोई अधिकारी मरता है तो अखबार से लेकर सड़क तक नाम छप जाता है| लेकिन बिहार का गोपालगंज जिला तो बेनाम लाशें गोद में लिए रो रहा है जो की सरकार की ही घोर लापरवाही का नतीजा है| एक बार फिर हमेशा की तरह वो ही घिसे पिटे सरकारी बयान आ रहे है कि दोषी कोई भी हो बक्शा नहीं जायेगा, कड़ी  कारवाही की जाएगी आदि-आदि| बहुत पहले हिंदी फिल्म के आखिर में लगभग एक डायलाग जरुर होता था कि अपने हथियार फेंक दो पुलिस ने तुम्हे चारों तरफ से घेर लिया है| इसी तरह कुछ दिन पहले बिहार सरकार भी अचानक शराबबंदी कर मानों कह रही थी कि बोतले फेंक दो सरकार तुम्हें सुधारना चाह रही है! लत तो लत होती हैं चाहें वो सरकारी महकमे में रिश्वत के लेन-देन की हो या किसी अमीर-गरीब आदमी की शराब पीने की| भला इतनी जल्दी कैसे छुट जाएगी? बस रास्ते बदल जाते है मुसाफिर वो ही रहते है|
 
अब प्रश्न यह कि यह लोग शराब पीते क्यों है? आज हम सब स्तंभकार, विश्लेषक, सामाजिक मुद्दों पर विचार विमर्श करने वाले जब भी लिखने बैठते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि विषय की गहराई में जरुर जाये! इस बात को कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता कि शराब का चाहें कम सेवन किया जाय या अधिक, प्रत्येक स्थिति में वो व्यक्ति को सिर्फ और सिर्फ हानि ही पहुंचाती है| वह न केवल व्यक्ति के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती है, वरन उसके सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक ढांचे को भी तहस-नहस कर देती है| शराब कभी अमीरी और शान-ओ-शौकत का पेय पदार्थ समझा जाता था और कुछ वर्षो पहले तक तो मध्यम, गरीब वर्ग में तो इसका नाम भी लेना अपराध जैसा था| जबकि शराब का वर्णन पुराणों में भी कुछ इसी तरह किया गया कि देवता अक्सर सोमरस का पान किया करते थे| यहाँ तक की लिखने वालों ने तो समुंद्र मंथन में भी इनके निकलने का वर्णन किया| कुरान की जन्नत में तो इसकी नदी बहती बताई जाती है| फिल्मों में नायक का दिल टूट जाये या कोई खुशी की बात हो अक्सर जाम छलकते दिखाए जाते है| भला जब इतना सब कुछ बता दिया तो एक गरीब आदमी इससे महरूम क्यों रहे? सुख- दुःख का अहसास तो उसे भी होता होगा वो भी तो इस सोमरस के आलोकिक आनंद को पाना चाहता होगा जिसे अमीर से लेकर देवता और फरिस्ते तक पाते बताये गये है?
में कोई शराब का पक्षधर नहीं हूँ किन्तु देश में आजादी से लेकर भले ही किसी राज्य सरकार पर गाँव-गाँव सडक का निर्माण ना हुआ हो शिक्षा का बुनयादी ढांचा भले ही किसी गाँव में ना खड़ा हुआ हो, बिजली पानी तो बहुत दूर की बात है पर आबकारी विभाग की मेहनत की बदोलत शराब जरुर गाँव-गाँव पहुँच गयी| इसके बाद जब लोग इसके आदी हो गये तो शराबबंदी शुरू कर दी आखिर क्यों? पहले उनके हाथ में बोतल दी क्यों थी, जब दी तो अब छीनी क्यों? या फिर सरकारों को अब पता चला कि यह चीज खराब और सेहत से लेकर पैसो तक का नुकसान करती है|

कोई बता सकता कि इतने सालों की बुरी आदत एक दिन में कैसे ठीक हो जाएगी? जो देश पिछले 69 सालों से अपने कागजी सिस्टम को नहीं सुधार पाया वो भला एक दिन में एक गरीब, अशिक्षित शराब के लती को कैसे सुधारेगा? जबकि सब जानते कि सबसे ज्यादा अकानूनी, अमर्यादित गैर जिम्मेदारी की कथा इसी देश में छपती है| अगर शराबी को शराब नहीं मिलेगी तो क्या वह नशा मुक्त हो जायेगा? शायद नहीं! पहले तो वह इधर उधर तलाश करेगा इसके बाद यदि नहीं मिलेगी या ज्यादा महंगी मिलेगी तो अन्य सस्ते नशे की तलाश करेगा| पिछले दिनों बिहार से ही खबर आई थी कि शराबबंदी के बाद अब नशेड़ी गांजा, भांग चरस व अफीम की लत मे फंसा हैं। मतलब शराब के आदी अब नशे के लिए दूसरे विकल्प ढूंढ़ने लगे हैं। इस बिहार चुनाव में जब में नितीश कुमार के सुशासन के होर्डिंग बेनर देखता था तो सोचता था कि जरुर इस प्रदेश में दूध और व्हिस्की की नदियां बहती होगी दूध वाले दूध पियों और व्हिस्की के दीवाने व्हिस्की| यहाँ के सेठ और साहूकार,  गरीब और मजदूरों के घर पानी भरते होंगे और सुवर्ण जाति के लोग दलितों पिछड़ों से अपने घरों में पूजा पाठ करातें होंगे! खैर सच्चाई सबके सामने है और सुशासन की परिभाषा से भी शायद हर कोई वाकिफ हो गया होगा! अब प्रश्न यह है कि इन लाशों के लिए जिम्मेदार किसको ठहराए? वहां के प्रशासन को या मीडिया को? जो मीडिया देश भर में होने वाले छोटे मोटे झगड़ों में अपरधियों और पीड़ितों की जाति तलाश लेती है क्या उस मीडिया को नहीं पता था कि यहाँ खुलकर शराब की बिक्री हो रही है? जबकि एक प्रसिद्ध अखबार का दफ्तर तो वहां से थोड़ी दूर पर ही स्थित है और मरने वाले सभी लोग दलित व अल्पसंख्यक बताये जा रहे है! हर एक मामले को जाति और धर्म से जोड़ने वाले नेता अब क्यों मौन है या आतंकवादी की तरह शराबी की भी जाति धर्म नहीं होती? शायद इन गरीब शराबियों की लाशों में मसाला नहीं इस वजह से कोई कथित पत्रकार और नेता इस मुद्दे को चखने को तैयार नहीं है|
 
जहरीली शराब से मौत की यह घटना जिस जगह हुई वहां से थाना और पुलिस के बड़े अधिकारीयों के ऑफिस ज्यादा दूरी पर नहीं है सारा गोपालगंज जानता था कि शराबबन्दी के बाद यहां धड़ल्ले से नकली शराब बिकती है| नहीं जानता था तो सिर्फ वह प्रशासन, जिसके अधिकांश सिपाही उसी जगह बैठकर कर शराब पीते थे| अब भले ही सरकारी आंकड़े 20 के आसपास हो, लेकिन गोपालगंज के लोगों की खुसरफुसर बता रही है कि यह आँकडा उससे कहीं ज्यादा है| कारण अधिकतर लोगों को प्रशासनिक अमले ने कुछ इस तरह डराया कि उन्होंने बिना रिपोर्ट दर्ज किये ही अपने सगो को जला दफना दिया कि कहीं शराब पीने पर मामला उल्टा न पड़ जाएँ| अब जो लोग सोचते है कि इस मामले की जाँच होकर और सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा इसके बाद लोग शराब पीना छोड़ देंगे और ठेकेदार बेचना, तो उनका सोचना गलत होगा क्योकि सरकार ने शराब प्रतिबंधित की थी, शराबी और ठेकेदार नहीं| वो अब भी स्वतंत्र है, ठेकेदार बेचते रहेंगे, शराबी पीकर मरते रहेंगे, कारवाही होती रहेगी इसके बाद भी सरकारे बदलती रहेगी और लाशों पर सरकारी लीपापोती होती रहेगी| यदि कुछ नहीं होगा तो वो है नशे के प्रति सरकारी स्तर पर जागरूक अभियान| क्या मात्र बोतल और दीवार पर गंभीर चेतावनी लिख देने से देश नशा मुक्त हो जायेगा| यदि हाँ तो फिर नोटों पर लिख देना चाहिए कि रिश्वत लेना-देना क़ानूनी जुर्म है|Rajeev choudhary

कैसे रेप फ्री होगा इंडिया ?


कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रेणुका चौधरी से पत्रकारों ने बुलंदशहर गैंगरेप के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि रेप तो चलते ही रहते हैं। उनका कहना है कि हम इस स्थिति से परेशान हो गए हैं। हर रोज सुबह उठने के बाद कोई ना कोई कहीं ना कहीं बलात्कार के बारे में बात जरुर करता है। हमें अब आगे के बारे में सोचना चाहिए। भले ही कुछ लोगों ने उनके इस बयान की निंदा, भर्त्सना की हो परन्तु उनका ये बयान कहीं न कहीं सच्चाई के करीब है| किन्तु अच्छा होता यदि वे यह बयान संवेदनशीलता के दायरे में देती न कि इस सवेंदनशील मुद्दा का राजनैतिक स्वर में उपहास उड़ाती|
दरअसल रेप बीमारी नहीं है, ये तो लक्षण है| जो वर्तमान में दिन पर दिन समाज में देखे जा रहे है| अगर इन लक्षणों पर ठीक तरह से खोज की जाये तो इनके बहुत सारे रूप है| इसके लिए ज्यादा गहराई में जाने की भी जरूरत नहीं है ऊपर से ही साफ नजर आते है| मसलन एक रेप तो वो होता है जिसमें एक गरीब एक मजदुर की पत्नी या बेटी होती है| जिनकी रिपोर्ट भी थाने तक नहीं आ पाती| यह रेप शरीर और गरीबी दोनों के साथ होता है| दूसरा- पारिवारिक रिश्तों के अन्दर जहाँ अपराधी काम वासना के अधीन होकर सामाजिक व् नैतिक मर्यादाओं का उलन्घन कर रिश्तों को तार-तार करता है| इसमें भी अधिकतर मामले सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए दबा दिए जाते है| तीसरा- एक झुग्गी झोपडी में रहने वाला नशा कर 20 रूपये में मोबाइल पर पोर्न देखता है, पहले वासना उसकी थ्योरी में होता है इसके बाद उसे प्रक्टिकल में परवाह नहीं रहती चाहे उसका शिकार कोई भी हो कोई घरेलू महिला या फिर गली में खेलती कोई मासूम बच्ची ही क्यों ना हो!

इसके बाद थोडा ऊपर चले तो किसी मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत एक महिला जो अपनी महत्वकांक्षी जीवन के लिए अपने से बड़े अधिकारी से पद की लालसा में या फिर विवाह आदि की चाहत रख प्रेम जाल में फंसकर सम्बन्ध बना लेती है| किन्तु कई बार मनोरथ अधुरा रहने पर वो रेप बन जाता है| ऐसे अधिकांश मामले आप लिव इन रिलेशनशिप में भी देख सकते है| या फिर कई बार सहयोगी महिला को नशा आदि करा कर भी अंजाम दिया जाता है| पांचवा -ग्लेमरस की दुनिया का जिसे चकाचोंध फिल्मी सितारों, कलाकारों की दुनिया कहा जाता है, जहाँ से सारी आवाजे पर्दे के आगे से आती है उसके पीछे का सच कभी-कभी समाचार पत्रों चैनलों में देखने को मिलता है| जैसा अभी मई माह की घटना ही ले लो जब एक पीड़ित मॉडल ने आरोप लगाया था कि अल्ताफ मर्चेंट नाम के एक प्रोड्यूसर ने काम देने के बहाने पहले तो उसे ड्रग्स की लत डाली गई। फिर उसके साथ रेप किया । यही नहीं एक रेप होता है जो पुरे परिवार के सामने बुलंदशहर हाइवे पर हुआ| एक रेप होता है विदेश से भारत आई यहाँ की संस्कृति के दर्शन करने विदेशी युवती के साथ| एक रेप बापू आसाराम करता है, दूसरा रेप रामसिंह और कई लोग मिलकर दामिनी, निर्भया का करते है| एक रेप जिसमें कई बार अपराधी पकडे जाने के भय से पीडिता की हत्या तक कर जाता है| बलात्कार के अनगिनत रूप है, और हर एक बलात्कार में अंतर| बलात्कारियों की अनगिनत चेहरे है, तो कैसे किस आधार पर आशा की जा सकती है कि भारत रेप फ्री हो जायेगा? 
हाल ही में अमिताभ बच्चन अपनी अपकमिंग फिल्म पिंकके ट्रेलर रिलीज के मौके पर कहा कि भारत रेप से फ्री होना चाहिए। उन्होंने अपनी फिल्म के बारे में बताते हुए कहा कि शूजित सरकार की फिल्म पिंकरेप पीड़ित महिलाओं को लाचार कानून व्यवस्था के कारण होने वाली मानसिक पीड़ा को असरदार तरीक़े से सामने लाएगी। आमतौर पर हमेशा इसी तर्क को सामने रखकर बल दिया जा रहा है कि कड़े कानून लागू होने से देश रेप फ्री हो जायेगा| जबकि यह सब सुनने तक ही सही लगता है| हाँ यदि ऐसा हो जाये तो कुछ प्रतिशत मामलों गिरावट आ सकती है पर बिलकुल रेप फ्री हो जाना सिर के बाल से दीवार में छेद करने जैसा है| क्योकि इसी देश में दहेज के ऊपर कड़े कानून प्रभावी है, लेकिन क्या दहेज लेन-देन बंद हुआ? दहेज हत्या या विवाहित नारी का शोषण होना बंद हो गया? शायद नहीं! क्योकि महिला समाज के द्वारा ही दहेज के कानून का जो दुरपयोग हुआ वो भी किसी से छिपा नहीं है| बिन अपराध न जाने कितने परिवार जेलों में सजा भुगत रहे है| ठीक इसी तरह कहीं रेप के सख्त कानून का फायदा ना उठाया जाये शायद सरकार डरती है| अक्सर पड़ोसी के साथ झगड़ा चाहे गली में नाली को लेकर हो पर कपडे फाड़कर थाने में जाकर इसी देश की नारी रेप की धमकी देती नजर आती है| इस कारण भी समाज में रेप के प्रति संवेदनशीलता में कमी महसूस की गयी है|
कई बार हमारा समाज सच से भागता सा दिखाई देता है| रेप वासना का प्रयोगात्मक क्रम है| हमेशा से हमारे पास चरित्र मापने के सारे मापदंड यौनअंगो से जुड़े है| यदि उसने यौन सम्बन्ध स्थापित नही किये तो चरित्रवान वरना हमने चरित्र की असली परिभाषा मिटा दी और नकली परिभाषा स्त्री के अंगो से जोड़ दी| हमारे पास सती सावित्री जैसी महिलाओं के हजारों किस्से है| जिन महिलाओं को जलाकर मारा जाता है बलात्कार कर हत्या कर दी जाती है, जिनके चेहरे पर तेजाब डालकर झुलसा दिया जाता है उनकी कहानी हम किताबों तक नहीं आने देते| हमारे पास नारी के कुंवारेपन की बड़ी कीमत है, उसके लिए प्रेम गीत है, कविता है ना जाने कितने शब्दों से उसे अलंकृत करते आ रहे| उसके उन अंगो को जिनसे वो प्रकृति निर्माण में सहयोग करती है, अपने दैनिक क्रिया कर्म करती है उन्हें संगीत से सजा दिया| जिस कारण आज वह आकर्षक दिखना चाहती किन्तु आक्रमण नहीं चाहती| हमने अपनी कविताओं में उसे शब्दों के जाल से नंगा किया| हमने हजारों साल से दुष्यंत और शकुन्तला के मिलन के कामुक किस्से सुना-सुना कर समाज को क्या दिया? क्या वह रेप नहीं था? दुष्यंत ने शारारिक सम्बन्ध बना शकुंतला का त्याग किया वो विरह वेदना बताई गयी लेकिन आज की शकुन्तला विरह के गीत नहीं गाती वो दुष्यंत रेप का मुकदमा दायर करती है| Rajeev choudhary

Tuesday, 9 August 2016

पहले पीडिता के प्रति सोच बदले समाज!



बुलंदशहर रेप केस के सभी आरोपी पकडे गये वाकई मीडिया और पुलिस इस मामले में प्रसंशा की पात्र है| अब आगे का काम न्याय पालिका के जिम्मे है देखते है इस मामले में उसकी भूमिका क्या रहेगी! लेकिन बुलंदशहर से थोड़ी दूर जिला गौतमबुद्धनगर में आठवी क्लास की छात्रा के साथ सरेबाजार अपहरण कर यमुना एक्सप्रेस वे पर सामूहिक दुष्कर्म हो जाना इस बात को भी दर्शाता है कि अपराधी बेखोफ है| उनके अन्दर समाज और कानून का भय समाप्त हो चूका है| शायद ये खबर मीडिया में बुलंदशहर जितना ना उछले और उछले भी क्यों रेप जैसे केस भारत में हर मिनट में हो रहे है| इन पर कहाँ तक लिखे कहाँ तक उस पर प्रोग्राम चलाये? सच्चाई भी यही है कि यदि लिखने से रेप जैसे कृत्य रुकते तो हमारे पास आदिकाल से इतने धार्मिक सामाजिक ग्रन्थ है उनसे ही रुक जाते! में दावे के साथ कह सकता हूँ रेप नहीं रुकेंगे| यदि समाज इस भ्रम में जी रहा है तो अपना भ्रम खत्म करे| क्योंकि बलात्कारी कोई दुसरे गृह से नहीं आते बलात्कारी इसी समाज का हिस्सा है| एक पकड़ा जाता है दूसरा खड़ा हो जाता है| पहले में सोचता था कि यह घिनोना कृत्य वासना के क्षणिक आवेश का हिस्सा भर होता होगा, जिसकी जद में आकर कोई भी अपराध को अंजाम दे देता होगा| किन्तु जब कोई सामूहिक दुष्कर्म होता है जिसमें कई बार पीडित युवती कोई नाबालिग या बच्ची भी होती है तो मै सोचता हूँ, कि आखिर सब के सब एक साथ हैवान कैसे हो जाते है! क्या उन कई लोगों में से एक की भी आत्मा उसे अन्दर से नहीं कचोटती कि यह गलत है, यह पाप है? ऐसा नही करना चाहिए| आखिर क्यों उस समय पीडिता के प्रति एक भी दुष्कर्मी सवेंदनशील नहीं रहता?

प्राणी जगत में मनुष्य समाज अकेला ऐसा जीव  है जो अपनी मादा के प्रति हिंसक व्यवहार अपनाता आया है| जब कोई बलात्कार जैसे घिनोने कृत्य को पशुवत व्यवहार से तोलता है, तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि ऐसा कौन सा पशु है, जो इस तरह के घिनोने कार्य करता है? पहले तो हमे यह बात समझ लेनी होगी कि मनुष्य समाज को छोड़ दे तो हर एक जीव सम्भोग केवल प्रजनन के लिए करता है, मौज, मस्ती या किसी को शर्मशार करने के लिए नहीं| और उससे पहले उसका नर समूह चाहें वो एक हो या गिनती में एक से ज्यादा, अपनी मादा को रिझाते है| उसके बाद मादा जिससे चाहे चुनाव कर शारारिक और भावनात्मक रूप से कुछ पल बंध जाये या नहीं यह भी मादा पर निर्भर करता है| किन्तु पशु दुष्कर्म नहीं करते| लेकिन मनुष्य समाज में अधिकतर मादा के शरीर का शोषण ही किया जाता है जिनमें कई भावनात्मक तत्व बिलकुल नहीं होता|
हर एक रेप के बाद समाज निंदा कर उठता है| कहता है कि पतन हो गया, कलियुग आ गया, धर्मभ्रष्ट हो गया। साथ में पीडिता को भी यह अहसास कराया जाता है कि अब वो इस समाज में सम्मान का जीवन जीने के लायक नहीं रही| उसका सब सतीत्व नष्ट हो गया| उसे इस मोड़ पर खड़ा कर देते है कि वो आत्महत्या तक कर लेती है|
अगर वो बेचारी जिंदा रह जाती तो इसको जीवन भर लांछन सहना पड़ता। जो उसको लांछन देते, वे सब के सब भी कहीं न कहीं इस पाप में भागीदार होते है। जो दुष्कर्मी ने किया वो इतना बड़ा बलात्कार नहीं था बड़ा बलात्कार तो उसके बाद लांछन लगा कर समाज करता है| क्योंकि अगर पीडिता जिंदा रह जाती तो उसका परिवार भी उसको नीची नजर से देखता, बच्चे भी उसको वो सम्मान नहीं दे पाते, यहाँ तक है कि समाज जो नारी है, उनका भी नजरिया बदला मिलता है| लेकिन जब पीडिता आत्महत्या कर लेती है सब के सब उसे एक सुर में उसे स्वाभिमानी और सती बताने लगते है! जैसे उसने बड़ा गजब का या बड़ा महान कार्य किया हो! लेकिन वो असल विरोध कोई नहीं करता जो होना चाहिए|

हर एक परिवार इसी देश और समाज का हिस्सा है आखिर क्यों वो परिवार अपने बच्चों का तिरस्कार नहीं करते जिनके बच्चें इस तरह के कार्यों में बतौर अपराधी पकडे जाते है? क्यों उनका पारिवारिक और सामाजिक बहिस्कार नहीं होता? इसके बाद प्रशासन और न्याय व्यवस्था भी कई बार पीडिता के प्रति उतना सवेंदना न रखते हुए अपराधी के पाले में ज्यादा झुकती दिखाई देती है| लगता है कहीं न कहीं आज हमारा समाज गुरु चेला सुपारी के पैकट की तरह हो गया जिसे ऊपर से देखो तो गुरु नजर और घुमाकर देखने से चेला नजर आता है| हमेशा पीडिता के प्रति समाज जो सवेंदना व्यक्त करता है, उससे उसका नजरिया साफ नजर झलकता है कि अब बलात्कार पीडिता इस समाज का हिस्सा नहीं रही| जबकि अपराधी जेल से निकलकर बाकायदा इस समाज में घुल-मिल जाता है तो इससे लगता है अभी हम पूर्ण जिम्मेदारी से बलात्कार के विरोध में नहीं खड़े हुए है| हम सिर्फ पीडिता के विरोध में है| हम सिर्फ मौखिक विरोध जता समाज में अपनी चरित्रवान होने की उपस्थिति दर्शा रहे है|

बलात्कार की नहीं निंदा बलात्कारियों की होनी चाहिए| साथ में कड़े कानून की मांग भी जरूर की जानी चाहिए।  बल्कि बलात्कारियों के परिवार का सामाजिक बहिस्कार भी होना चाहिए ताकि दुष्कर्म करने से पहले अपराधी के मन में सामाजिक और कानून का खोफ हो| लेकिन साथ में इसी समाज की भी निंदा की जानी चाहिए जो पीडिता के प्रति अपनी सोच नहीं बदलता उसे भ्रष्ट समझ लेता है| हमारे समाज ने नारी के चरित्र को हमेशा से महानता से पेश किया उसके योंन अंगो को पवित्रता के और धार्मिकता के ऐसे आभूषण पहना दिये हैं, कि मुश्किल खड़ी हो गई है। कहीं इसी की वजह से कुछ लोग पागल तो नहीं है कि जिसे नारी का प्रेम नहीं मिलता वो प्रेम जबरन छीनना चाहता हो? नारी की निकटता पाने का यही सरल सुगम मार्ग समझ लिया हो? या मोबाइल में पोर्न मूवी देखकर, दोअर्थी संगीत सुनकर, सस्ते गंदे नशे कर इस पवित्रता के श्रंगार को लूटना चाहता हो? अपनी काम वासना में जलते हुए नारी को शर्मशार करना चाहता हो? यदि ऐसा है तो अपराधी की सजा भी कुछ ऐसी ही हो कि जो मौत से भी बदतर हो और साथ में उसे परिवार और समाज में शर्मशार भी करे|...................Rajeev choudhary