Tuesday, 29 March 2016

बस इस लिए कि विधवा हिन्दू है?


दिल्ली के विकासपुरी में मामूली कहासुनी के बाद एक डॉक्टर की पीट-पीट कर हत्या करने के आरोप में पुलिस ने पांच आरोपि‍यों को गिरफ्तार कर लिया है इस खबर पर चुप रहते – रहते राजनीति होना शुरू हो गयी है हर एक न्यूज़ चैनल अपने नजरिये से इस खबर को प्रसारित कर रहे है| खेर सांच को आंच नहीं,सच सामने आएगा! खुद में भी इस मामले को समझते समझते यहीं तक पहुंचा हूँ कि इन्सान के अन्दर हिंसा पनप रही है, वो दिन पर दिन हिंसक हो रहा है| आगे आने वाले समय में यह रोग घटने के बजाय बढ़ता ही जायेगा| अभी वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने 19 मार्च को दिल्ली के राजेन्द्र भवन में शुरू हुए दो दिवसीय सम्मेलन ”सिकुड़ता लोकतांत्रिक स्पेस और नव-उदारवादी कट्टरता” का पहला वक्तव्य देते हुए कहा था कि मीडिया वह सेज है जहाँ मज़हबी कट्टरता और बाज़ार की कट्टरता हमबिस्तर होंती है। करीब एक घंटे के अपने संबोधन में पी साईनाथ ने बहुत सी बातें कहीं, लेकिन केवल पौने दस मिनट, जो मीडिया की भूमिका पर खर्च किये, वे किसी के लिए भी दवा की खुराक का काम कर सकते हैं खासकर उनके लिए जिसके दिमाग में खासकर पिछले कुछ महीने में मीडिया ने ज़हर भर दिया है।

हमे पी साईनाथ की यह बात इसलिए अच्छी लगी कि उनकी यह बात दवा की तरह कडवी जरुर है लेकिन समाज और सिस्टम के लिए फायदेमंद है| पिछले दिनों अख़लाक़ की कुछ लोगों पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी थी| मसला गौमांस को लेकर विवाद था| हालाँकि यह प्रसंग मीडिया और राजनीति ने इतना चूसा की बिहार विधान सभा चुनाव असहिष्णुता की भेट चढ़ गया| नयनतारा सहगल, अशोक बाजपेयी, व् फिल्म निर्माता निर्देशक, गायक कलाकार अपने अवार्ड पुरस्कार लौटाने तक चल दिए थे| समाजवादी सरकार में वर्तमान मंत्री आजम खान ने तो यूएनओ को चिट्ठी तक लिख डाली थी कि देखिये साहब भारत में मुस्लिमों को पीट पीट कर मारा जा रहा है| आनन्  फानन में दादरी राजनीति का गढ़ बन गया| साध्वी, ओवेशी, केजरीवाल आदि नेता राजनीति करने पहुँचे थे या सवेदना व्यक्त करने यह हर कोई जानता है| किन्तु मामला इतना गूंजा कि ब्रिटेन पहुँचे प्रधानमंत्री मोदी को वहाँ प्रेस कांफ्रेंस में इस मामले पर सफाई देनी पड़ी| उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्काल सवेंदना प्रकट करते हुए अख़लाक़ की विधवा पत्नी को फ्लैट और नकद लाखों रूपये देने का आश्वासन दिया| 

किन्तु पंकज नारंग की कहानी दूसरी है, अभी तक उनकी लाश में राजनीति और मीडिया को दिलचस्पी नहीं है, ना ही उनकी विधवा पत्नी के  आंसू इतने मायने रखते जितने रोहित की माँ और अख़लाक़ की पत्नी के मायने थे| बस इस लिए की विधवा हिन्दू है दिल्ली के मुख्यमंत्री, रोहित वेमुला की आत्महत्या पर हैदराबाद पहुँच गये थे| किन्तु दिल्ली का विकासपुरी कांड अभी उनसे दूर है? देहरादून में घोड़े की टांग टूटना मीडिया के लिए बहुत बड़ी खबर बन जाती है घोडा मीडिया की मानवीय सवेंदना जगा सकता है किन्तु एक मासुस बच्चे के सामने उसके बाप को 15-20  लोगों द्वारा पीट कर मारना सवेदना की एक लाइन नहीं बन पाती यदि डॉक्टर की पत्नी अल्पसंख्यक समुदाय या दलित समाज से होती तो शायद अब तक वो हो जाता जो अभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है| हर मुद्दे को जाति धर्म के चश्मे से देखने की शुरुआत राजनीति के द्वारा की गयी जिसे बाद में मीडिया ने बखूबी बेचा आज यह चींजे हमारे लिए मनोरंजन या अन्य विषय का प्रसंग हो सकती है किन्तु इससे समाज में छोटे बच्चों पर तो विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वो सोचते हैं कि न्यूज़ चैनल का मतलब हैलूट, हत्या,देशद्रोह और बलात्कार की घटनाओं का अड्डा है। वे सोचते हैं कि समाज भी शायद इन्हीं विसंगतियों से बनता है।

यदि पंकज की हत्या का कारण तलाशा जाये तो कुछ भी नहीं किन्तु इसे “होनी बलवान है”  यह कहकर भी टालना उचित नहीं है क्योकि हत्या करने वालों में करने वालों में चार आरोपी नाबालिग हैं, जिन्हें हिरासत में लिया गया है| आखिर बच्चों की सोच और कृत्य इतने हिंसक भी हो सकते है? क्या युवा होता समाज आने वाले भविष्य को इस हिंसा से जला देगा? हर तरफ धर्मिक और जातीय उन्माद सुनाई देता है आज तो शायद नेता चुप हो किन्तु हो सकता है कल जब वो बाल सुधार ग्रह से वापिस आये तब तक जाति मजहब  राजनीति इतनी मजबूत हो चुकी हो कि उनके सम्मान पर पलक पांवड़े बिछाये जाये?  डॉ. पंकज नारंग की पत्नी को मीडियाई और राजनैतिक लिहाज से मै बदकिस्मत कह सकता हूँ, कि अब तक राज्य के मुख्यमंत्री आम आदमी के संयोजक केजरीवाल को उनके आंसू दिखाई नहीं दिए जो अख़लाक़ की विधवा बीबी को 15 लाख का चेक सौप आये थे| हो सकता है ये मुख्यमंत्रियों की ये बंदिशे हो? कि वो तभी किसी मृतक के घर जाएं जब वो दलित या अल्पसंख्यक रहा हो, या सांप्रदायिक हिंसा में मारा गया मुसलमान हो? में यह नहीं चाहता की इस मुद्दे पर भी धर्म की राजनीति हो पर प्रश्न उन मजहबी मानसिक रोग ग्रस्त  राजनीति करने वालों है उन लेखकों पर है, उन कलाकारों पर है जो अपनी सवेदना में भी अंतर रखते है|
लेखक
राजीव चौधरी

आत्महत्या रास्ता नहीं है !!


पिछले दिनों रोहित वेमुला की आत्महत्या से जहाँ देश के राजनैतिक दल स्तब्ध होकर रोहित की आत्महत्या को लोकतंत्र की हत्या बता रहे थे| वही 25 मार्च को दिल्ली में डिफेन्स कॉलोनी के अन्दर इवेंट मैनेजर प्रियंका कपूर की आत्महत्या पर सब चुप है| महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल भी इस आत्महत्या पर प्रतिक्रिया देने के बजाय इस मामले में उलझी है कि दिल्ली के स्कूलों में पढ़ रही सात लाख लड़कियों को सेनेटरी पेक दिए जाये या नहीं! जबकि प्रियंका के सुसाइड नोट चीख-चीखकर ये गवाही दे रहे हैं कि उसे खुदकुशी के लिए उसके पति ने ही मजबूर किया था| पुलिस को कमरे से प्रियंका के दो सुसाइड नोट मिले| जिनके जरिए पुलिस के लिए मामले के तह तक पहुंचना काफी हद तक आसान हो गया| उसने मन की पीड़ा को बयान करते हुए लिखा है कि पति और सास उसके साथ मारपीट करते थे| उसका पति काफी शक्की इंसान है| वह उसको किसी से मिलने जुलने और बातचीत तक करने नहीं देता था| बीती 30 जनवरी को उसने उसकी बुरी तरह पिटाई की थी|
प्रियंका शायद अब सभ्य कहें जाने वाले समाज में नहीं रही| मैं उसकी मौत का कोई विश्लेषण नहीं करना चाहता पति द्वारा उसके सपनों की हत्या होना उसकी आत्महत्या का सच हो सकता है| किन्तु प्रियंका  राजनीति से लेकर समाज की मानसिकता पर सवाल खड़े कर गयी, कि जब एक छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से लोकतंत्र की हत्या हो जाती है तो पुरुषवादी विचारधारा से त्रस्त होकर जब कोई महिला आत्महत्या करती है तो क्या तब लोकतंत्र का जन्मदिन होता है? तब सभ्य समाज की हत्या क्यों नहीं होती? हम सबके लिए यह दुखद घटना है किन्तु सवाल यह नहीं है आत्महत्या क्यों की? चाहे वो रोहित वेमुला हो या प्रियंका कपूर या वो लोग जिनका अखबारों में नाम भी नहीं आता| सवाल यह है कि एक लोकतांत्रिक उदारवादी समाज के अन्दर एक नारी का लोकहित उसकी सवेंदना उसका मर्म उसके अन्तस् की वेदना कोई क्यों नहीं समझता? और एक छात्र की आत्महत्या से उसकी जाति या सामाजिकता राजनेताओं से बचती है की नहीं? इन दोनों आत्महत्या में तुलना करना आवश्यक है रोहित पर राजनेताओं की राजनीति चमकाने का कोई उत्तरदायित्व नहीं था| उसका उत्तरदायित्व था पढ़ लिखकर अपने माँ-बाप के सपने पुरे करना, राष्ट्रहित में अपना सहयोग देना उसकी आत्महत्या को बलिदान बताना मुर्खता है| मेरा नतमस्तक होता यदि यह लोग मौत की बजाय जीवन संघर्ष करते|

कुछ भी हो मन में अब टीस यह कि कोई भी समाज नारी शक्ति को उपेक्षित कर प्रगति नहीं कर सकता है। आज  महिलाओं के लिए वो स्थान बयान नहीं कर सकता  जहाँ वो सुरक्षित हो, घर के बाहर और घर के अंदर अपने संगे संबधियों के बीच, कार्यस्थल, में भी सुरक्षित नहीं है इसके कारण उन्हें घर से लेकर बाहर तक विरोध के ऐसे बवंडर का सामना करना पड़ता है, जिसका सामना अकेले करना उनके लिए कठिन हो जाता है और कई बार उसे मौत को गले तक लगाना पड़ता है| सामाजिक तौर पर महिलाओं को त्याग, सहनशीलता एवं शर्मीलेपन का प्रतिरूप बताया गया है| इसके भार से दबी महिलाएं चाहते हुए भी अपने लिए बने क़ानूनों का उपयोग नहीं कर पातीं| बहुत सारे मामलों में महिलाओं को पता ही नहीं होता कि उनके साथ जो घटनाएं हो रही हैं, उससे बचाव का कोई क़ानून भी है| अभी पिछले दिनों मेट्रो ट्रेन में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति भीड़ में एक लड़की को जबरन स्पर्श कर रहा था जिसका लड़की ने नजरों से उसका विरोध किया लड़की को देखकर कुछ लोगों ने भी मौखिक विरोध किया वो तो अगले स्टेशन पर उतर गया किन्तु लड़की ने इस छेड़छाड़ को उसका बड़ा अपराध ना मानते हुए कहा कि इस प्रकार की घटना हमारे जीवन में आम हो गयी है जिसे हमने जीवन का हिस्सा समझ स्वीकार कर लिया है| हालाँकि यह सब उस देश के दुर्भाग्यपूर्ण है जिसमें नारी को देवी का दर्जा दिया जाता रहा हो।

आमतौर पर देखा जाये तो शारीरिक प्रताड़ना यानी मारपीट, जान से मारना आदि को ही हिंसा माना जाता है और इसके लिए रिपोर्ट भी दर्ज कराई जाती है. लेकिन महिलाओं और लड़कियों को यह नहीं पता कि मनपसंद कपड़े न पहनने देना, मनपसंद नौकरी या काम न करने देना, अपनी पसंद से खाना न खाने देना, बालिग़ व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह न करने देना या ताने देना, मनहूस आदि कहना, शक करना, मायके न जाने देना, किसी खास व्यक्ति से मिलने पर रोक लगाना, पढ़ने न देना, काम छोड़ने का दबाव डालना, कहीं आने-जाने पर रोक लगाना आदि भी हिंसा है, मानसिक प्रताड़ना है| सरकार ने महिलाओं को पुरुषों के अत्याचार, हिंसा और अन्याय से बचाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन तो किया, पर वह अपने मक़सद में ज़्यादा सफल नहीं हो पा रहा है| यह सिर्फ उन महिलाओं की सोसाईटी बनकर रह गया जिन्हें अपने हकों के बारे में ज्ञान है| लेकिन गांवों की अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी और दबी-कुचली महिलाओं की आवाज़ इस आयोग में नहीं सुनी जाती अभी तीन रोज पहले ही झारखण्ड के अन्दर एक महिला को डायन बताकर उसका सिर काट लिया गया शायद महिला आयोग में बैठी महिलाओं को इस खबर का ज्ञान भी ना हो? अब कुछ भी हो, टी. एस. एलियट की एक कविता है जिसमे वे कहते है जीने की व्यवस्था में जीवन खो गया है| विवेक में ज्ञान खो गया और ज्ञान जानकारी में| अंत में वो कहते है कि लगातार बदलते दौर में जो एक चीज नहीं बदली वह है भलाई बुराई, आत्महत्या संघर्ष का हल नही होता ना दुःख का अंत जो दुनिया और कुरूतियों से लड़ते है वो ही विजेता कहें जाते है...लेखक राजीव चौधरी

Friday, 25 March 2016

असमंजस कौन राष्ट्रभक्त, कौन देशद्रोही?



आज देश के अन्दर राष्ट्रभक्ति और देशद्रोह नाम की दो दुकान बड़ी धडल्ले से चल रही दोनों को थोक में सस्ता माल मिल रहा और दोनों के पास ग्राहकों की भी कमी नहीं है| ये गद्दार, वो गद्दार, ये राष्ट्रभक्त वो राष्ट्रभक्त की आवाज़े चाय की दुकान से लेकर संसद तक सुनी जा सकती है| कल जाने माने शायर लेखक , प्रगतिशील बुद्धिजीवी एवं राज्य सभा सदस्य जनाब जावेद अख्तर साहब ने संसद में असदउद्दीन ओवैसी को मानों धोकर निचोड़ डाला  जावेद अख्तर के इस राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष  भाषण  से पूरा सदन गदगदायमान होता रहा। जावेद अख्तर साहब न केवल स्वयंभू राष्ट्रवादी लोगों को आइना दिखाया| बल्कि एक साँस में तीन-तीन बार भारत माता की जय बोलकर जावेद अख्तर ने कटटरपंथी हिन्दुत्ववादियों को भी करारा जबाब दिया है।
ओवेसी और आजम भारतीय मुस्लिम जगत के दो राजनैतिक चेहरे है| भारत का एक बड़ा मुस्लिम धडा इन्हें अपना मसीहा तक समझता है| उन बेचारों को नहीं पता यह क्या कह रहे है बस इतना पता है मुस्लिम नेता है तो जो कहा सही ही कहा होगा| अनपढ़ अशिक्षित मुस्लिम अभी तक नहीं समझ पा रहा कि यह लोग अपनी राजनीति के लिए भारत के समस्त मुस्लिम जगत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है| कुछ साल पहले आजम खान ने भारत माता को डायन कहकर संबोधित किया था| जिसको लेकर मीडिया में काफी आलोचना हुई थी| कल परसों आजम खान ने साध्वी प्राची से प्यार करने की बात कही| दोनों बयान सही मायने में निंदनीय है| क्योकि राष्ट्र को डायन और साध्वी से प्यार यह सिर्फ एक साम्प्रदायिक सोच दर्शाकर एक विशेष वर्ग का बड़ा नेता बनने की चाह रखने जैसा है|
कुछ दिन पहले ही संसद में पीएम मोदी जी ने निदा फाजली जी का जिकर किया था मुझे उम्मीद है कि वे जावेद अख्तर को इग्नोर नहीं करेंगे। और संघ वालों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ जावेद अख्तर, निदा फाजली ही नहीं भारत के करोड़ों मुसलमान भी इसी तरह के विचार रखते हैं। अपनी सोच का दायरा घटा कर हर मुसलमान को आतंकी न समझें ! और भारत माता की जयका नारा लगाने वाले हर शख्स को देशभक्तसमझने की भूल भी न करें!
हम सबके लिए यह देश हमारी मातृभूमि है, माँ है, इसलिए हम भारत माता की जय बोलते हैं। मुझे साहित्यकार राम तिवारी के यह बात बिलकुल सही लगी कि दरअसल ओवेसी को भारत माता की जय से कोई समस्या नहीं है। देश से भी उन्हें कोई समस्या नहीं है। हिन्दुओं से भी उन्हें कोई समस्या नहीं है। वास्तव में ओवैसी की समस्या ये है कि वे महज एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचारधाराहैं। यह विचारधाराघोर साम्प्रदायिक है और यह सिर्फ ओवैसी की ही नहीं है। बल्कि यह विचारधारा सिमी की भी है। यह विचारधारा हरकत-उल अंसार की भी है ,यह कश्मीर में दुख्तराने हिन्द की भी है। कश्मीर में पत्थरबाजी करने वालों की भी है, केरल में मुस्लिम लीग की है। आंध्र, तेलांगना में आईएम और ओवैसी की है। वही विचारधारा कभी सैयद शाहबुद्दीन की भी रही है। ऐ आर अंतुले, गनीखान चौधरी, इमाम बुखारी, आजम ख़ाँ ने इस विचारधारा का जमकर भोग किया है। ममता, मुलायम, लालू और नीतीश ने भी इसका स्वाद चखा है। देश विभाजन के बाद -पाकिस्तान बन जाने के बाद इस विचार धारा से ही पाकिस्तान बना था। लेकिन भारत को अपना वतन मानने वाले जावेद अख्तर, निदा फाजली, अमजद अली खान जैसे करोड़ों मुसलमानों को जब कुछ स्वार्थी लोग दारुल हरबका ज्ञान बाँटने की जुर्रत करते हैं तो उन्हें औकात बता दी जाती है। जैसे कि जावेद अख्तर ने राज्य सभा में ओवैसी के नकारात्मक बयान पर उसे आइना ही नहीं दिखाया बल्कि जावेद साहब ने ओवैसी को गली मोहल्ले का नेता बताकर उसकी असल औकात दिखा दी है।
जापान के बारे में एक कथा प्रचलित है कि जापान की स्कूलों में बच्चों को तीन प्रश्नोत्तर पढ़ाये जाते है|  प्रथम प्रश्न है कि आप सबसे ज्यादा किसे मानते है उत्तर  भगवान बुद्ध को| दूसरा प्रश्न- अगर कोई भगवान बुद्ध पर हमला कर दे तो आप क्या करेंगे! उत्तर  हमला करने वाले का सिर उड़ा देंगे तीसरा प्रश्न अगर भगवान बुद्ध ही जापान पर हमला कर दे तो क्या
करोगे उत्तर    हम भगवान बुद्ध का ही सिर उड़ा देंगे| अर्थात जापान देश में सिखाया जाता है कि देश, धर्म से भी बढ़कर है और कोई भी धर्म और भगवान देश से बड़ा नही होता। अगर भगवान भी देशद्रोह करने को बोले तो भी मत करो और हमारे यहाँ भारत माता की जय बोलने से लोगो का धर्म खतरे में पड़ रहा है और हंगामा हो रहा है।
लेखक राजीव चौधरी

साम्प्रदायिक दंगे कुछ यूँ होते है!!


जब सूफी समारोह में प्रधानमन्त्री जी इस्लाम का अर्थ शांति बता रहे थे उस समय मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक सोहार्द आग की भट्टी में सुलग रहा था| केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री संजीव बालियान जी उत्तर प्रदेश सरकार को चेतावनी दे रहे थे कि यदि लड़की के साथ छेड़छाड़ के आरोपियों और तमंचो से फायर करने वाले लोग नहीं पकडे गये तो अपनी माँ बहनों की सुरक्षा के लिए हमारे नौजवान तैयार है|साम्प्रदायिक दंगे करना करवाना कोई बड़ी बात नहीं है, माथे पर तीन तिलक और सिर पर दो जालीदार टोपी यदि चाहे तो एक दिन में सेकड़ों मासूमों को धर्म के बहाने अपना मनोरथ सिद्ध करने के लिए दंगे का निवाला बना सकते है| मुजफ्फरनगर का कवाल कांड हो या गौधरा, भागलपुर दंगा हर किसी में एक छोटा कारण होता है| जो बाद में गहरा जख्म दे जाता है| खेर अतीत का क्या रोना वो काम तो धर्म के ठेकेदारों और राजनेताओं का होता है! हम तो सिर्फ इतना चाहते है कि हर एक अपराधिक घटना को धर्म से जोड़कर न अशांति का माहौल बनाया जाये और ना कानून का मजाक बनाया जाये|

हर रोज अखबारों के माध्यम से देखा जाये तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश धर्म के आग में जलता सा दिखाई दे जाता है| हर रोज मनचले युवक, जगह जगह युवतियों को अपनी कामुक प्रवृति के बल पर बाजारों स्कूलों में छेड़छाड़ कर रहे है| यदि कोई उल्टा विरोध करता है तो वो युवक धर्म के अपमान को लेकर धर्म के खतरे का बहाना बनाकर जगह-जगह हिंसा तोड़फोड़ लूटपाट करना शुरू कर देते है| पिछले कई दिनों के अखबारों के पन्नों में कुछ ऐसी खबरे लिपटी पड़ी है| मुजफ्फरनगर के शहर कोतवाली क्षेत्र में हनुमान चौक के निकट स्थित मौहल्ला नयाबांस में एक हिन्दू युवती के साथ छेडछाड के मामले को लेकर दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ  गए, जिसके बाद जमकर बवाल हुआ। दोनों पक्षों के बीच जबरदस्त पथराव हुआ, जिसमें कई लोगों के घायल होने का समाचार है। युवती का धर्म भी बताना इस लेख की मज़बूरी है और क्यों केन्द्रीय मंत्री इस घटना पर इतना तीखा क्यों बोले|  ताकि मामला साफ हो की ये सब होता क्यों है!!

अब यह हुआ क्यों? बिलकुल साफ स्पस्ट दिखाई दे रहा है कि या तो वो युवती उस मुस्लिम युवक का कहना मान कर बंद मकान में अपने सम्मान समर्पण करती तो शायद यह धर्मिक टकराव ना होता!! अब उस युवती ने अपने परिवार को अपनी प्रताड़ना की अपनी रोजाना की छेड़छाड़ की बात बताई परिवारजनों ने इसका विरोध किया तो उक्त विशेष सम्प्रदाय का युवक धर्म के नाम पर करीब दस बजे वह 30 - 40 साथियों को लेकर पहुंचा| यकीनन धर्म के नाम पर ही इक्कठे किये होंगे! और लड़की के भाई को पीटना शुरू कर दिया। उसे बचाने आए युवक से भी मारपीट की। इसके बाद दोनों ओर से पथराव और फायरिंग शुरू हो गई। जिसे बाद अखबारों और पुलिस ने इस घटना को साम्प्रदायिक दंगा तनाव लिखा| कोई बताये तो सही इसमें सम्प्रदाय बीच में कहाँ से आया क्या उक्त युवक की कामुक वासनाओं को विराम देना भी क्या समस्त मुस्लिम सम्प्रदाय की जिम्मेदारी है? जो लोग इन अपराधियों के पक्ष में खड़े होकर धार्मिक नारे लगाते है क्या वो कभी इनसे पूछते है कि आखिर शुरुवात किस बात से हुई| क्यों नहीं लोग इन अपराधियों का तिरस्कार कर देते|

यह एक घटना नही बल्कि वेस्ट यूपी में रोजाना ऐसी घटना होना एक आम बात हो गयी 12 फरवरी मेरठ जिले के मवाना कस्बे में संप्रदाय विशेष के युवक के एक छात्रा से छेड़छाड़ करने व जबरन हाथ पकडऩे पर सांप्रदायिक तनाव के हालात बन गये। देखते ही देखते वहां पर मारपीट होने लगी। आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर हिंदू संगठन के लोगों ने जाम लगा दिया। 28 जनवरी मेरठ में देहली गेट क्षेत्र के सराय लालदास में सोमवार रात नौ बजे दो बहनों से छेड़छाड़ का विरोध करने पर सांप्रदायिक बवाल हो गया। दोनों पक्षों में जमकर हुई मारपीट और पथराव के बाद फायरिंग भी हुई। इसमें दोनों बहनों समेत आठ लोग घायल हो गए थे|

गुरुवार 17 मार्च मेरठ कोचिंग से घर लौट रही एक छात्रा के साथ शनिवार शाम बाइक सवार तीन मनचलों ने छेड़छाड़ की। वह नजरअंदाज कर आगे बढ़ गई तो भी पीछा नहीं छोड़ा। लगातार फब्तियां कसते रहे। कई बार उसका दुपट्टा खींचा और विरोध करने पर छात्रा को थप्पड़ जड़े गये  क्या आप लोग इन खबरों को साम्प्रदायिक घटना कह सकते है? नहीं ना! क्योकि ये वासना के कीड़े धर्म की आड़ में अपना खेल खेलते है और वोटो के लिए राजनेता इनका समर्थन करते है कानून राजनीति के कुरते की जेब में रखा है तो यह सब कैसे रुकेगा? अभी भी समय है इन वासना के कीड़ों का दमन आवश्यक है वरना यह लोग धर्म की आड़ में समाज और देश को खा जायेंगे|

लड़ने के बहाने पहले से तय हैं अब एक अच्छा नागरिक होने के लिये मेरा  कुछ को दुश्मन मानना और एक अनचाहे गर्व से भरे रहना आवश्यक है  यह घृणा और यह गर्व  मेरे पुरखों ने जमा किया है पिछले 1400 सालों से मैं अभिशप्त हूँ एक  हज़ार साल के बोझ को अपने सिर पर ढोने के लिये अब मैं सौंपूंगा यह बोझ अपने  मासूम और भोले बच्चों को क्योकि जन्म लेते ही मुझे हिन्दू, मुसलमान , या फलाना या ढिकाना बना दिया गया जन्म लेने से पहले ही मेरे दुश्मन भी तय कर दिए गये| मेरा दीन मुझे किस किस चीज की इजाजत देता है मुझे समझा दिया गया जन्म से पहले ही मेरी ज़ात भी तय कर दी गयी>

महाभारत न तो कभी शुरू होता और न कभी अंत, वह मनुष्य के अज्ञान के साथ चलता ही रहता है। कृष्ण ने गीता कही, उसके पहले भी वह चल रहा था; कृष्ण ने गीता पूरी की, तब भी वह चल रहा है। आदमी जैसा है, वैसा तो लड़ता ही रहेगा। कितना ही बचाओ, कितना ही समझाओ, अहिंसा का पाठ पढ़ाओ, कोई फर्क न पड़ेगा। वह अहिंसा के लिए लड़ेगा। कोई फर्क नहीं पड़ता। तलवारें उठ जाएंगी, अहिंसा की रक्षा करनी है। कितना ही धर्म सिखाओ, वह धर्म के लिए लड़ेगा, इस्लाम खतरे में है, हिंदू धर्म खतरे में है। वासना का खेल खेलना हो किसी की इज्जत आबरू लूटना हो, इस्लाम धर्म खतरे में है, हिन्दू खतरे में है| फिर कोई नहीं  पूछता कि तेरा धर्म है कहां? जो खतरे में है| कहीं धर्म भी खतरे में होते हैं? लेकिन लड़ने के लिए बहाने हैं। कोई भी बहाने काम दे जाते हैं। लोग इन्हें साम्प्रदायिक दंगे कहते है| लेखक राजीव चौधरी
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/likha-ret-par/entry/%E0%A4%B8-%E0%A4%AE-%E0%A4%AA-%E0%A4%B0%E0%A4%A6-%E0%A4%AF-%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%97-%E0%A4%95-%E0%A4%9B-%E0%A4%AF-%E0%A4%B9-%E0%A4%A4-%E0%A4%B91

मीडिया के लिए दुधारू बने बयानवीर?



पिछले कुछ दिनों से कन्हैया को लेकर मीडियाकर्मी और नेता एक अजीब शोर मचाये हुए है| जानी मानी लेखिका साहित्यकार अवार्ड वापसी करने वालो की मुखिया, नयनतारा सहगल ने तो कन्हैया का कद मोदी के बराबर माप दिया वो तो भला हो सीना नहीं मापा वरना छप्पन की जगह सत्तावन इंच कर देती| तभी अचानक शशी थरूर ने कन्हैया को अमर बलिदानी सरदार भगतसिंह के बराबर का क्रन्तिकारी बता डाला| सत्ता के साथ राज सुख चला जाता है| ऐसा सुना था, किन्तु सत्ता के साथ बुद्धि भी चली जाती है यह कल थरूर के बयान के बाद साबित हो गया|
पिछले कुछ दिनों से मीडियाकर्मियों के पास मुद्दे नहीं है मुद्दे है भी तो उनसे उनका सरोकार नहीं है| ना तो मीडिया को किसान की परवाह है ना गरीब की| उसे तो परवाह है बस अपनी टीआरपी की| न उसकी खबरे राष्ट्र के चरित्र को सही ढंग से पेश करने की रही है| कई बार तो लगता है जैसे मीडिया बस यह साबित करना चाहती है कि भारत चरित्रहीन देश है| यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है| साध्वी, योगी, ओवैसी, लालू आजम, केजरीवाल, साक्षी महाराज, और कन्हैया कहीं यह सब वो चेहरे तो नहीं है जो मीडिया के खेत में खड़ी फसल या दुधारू गाय भेंस जैसे हो? जब टीआरपी की भूख हो इन लोगों के मौखिक बयान राजनीति का पेट भरते से दिखाई दे जाते है| मुझे नहीं लगता कन्हैया के अन्दर कोई बड़ा परिवर्तनकारी राजनेता, समाज सुधारक या परिवर्तनशील युवा हो| उसके पास बस देशद्रोही भाषण है या अराजकतावादी नजरिया| किन्तु इन सब चीजों से देश का किसान मजदूर व्यापारी तो खुश होने से रहा? आखिर मीडिया और विपक्षी नेताओं को ऐसी खूबी नजर आई की उसे देश के अन्दर एक हीरो की तरह पेश किया जा रहा है ? राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता के पास कन्हैया से मिलने का समय तो है किन्तु अपनी पार्टी के विधायक हरकसिंह रावत से नहीं?

कहते है छोटी छोटी चीजें समाज के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। मसलन एक छात्र देश के प्रति यहाँ के लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था नहीं रखता और यह घटना किसी एक गांव की कस्बे या शहर की है, लेकिन बार बार टीवी पर दिखाने से प्रभाव क्या डाला? कि जैसे देश में छात्र आतंक का पर्याय बन चुके हैं। जबकि समाज में हजारों छात्रों ने देश की सेवा की भावना से समाज के प्रति अपना अच्छा नजरिया रखा, तिरंगे के सम्मान में कार्यक्रम रखे, किन्तु वह समाचार नहीं बन पाता क्या इस देश में नकारात्मक खबर ही अपनी जगह बना सकती है| कन्हेया ने देश विरोधी नारे लगाये कन्हैया प्रसिद्ध कन्हैया को थप्पड़ मारने वाला विकास प्रसिद्ध अब सुना है किसी ने जूता मार दिया| राजनीति के अन्दर केजरीवाल का जन्म भी कुछ इसी तरह होता है| हो सकता है आज यह चींजे हमारे लिए मनोरंजन या व्यंग का प्रसंग हो किन्तु इससे समाज में छोटे बच्चों पर तो विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वो सोचते हैं कि न्यूज़ चैनल का मतलब है- लूट हत्या,देशद्रोह और बलात्कार की घटनाओं का अड्डा है। वे सोचते हैं कि समाज भी शायद इन्हीं विसंगतियों से बनता है। समाज के पास सिवाय गंदगी के और क्या हैं? इसलिए समाज के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल गया है| अभी में पिछले दिनों एक खबर पढ़ रहा था जिसमे मीडिया का बहुत अच्छा विश्लेषण किया था कि मौजूदा वक्त में मीडिया हाउस में कारपोरेट की रुची क्या सिर्फ इसलिये है कि मीडिया से मुनाफा बनाया कमाया जा सकता है? या फिर मीडिया को दूसरे धंधो के लिये ढाल बनाया जा सकता है, तो सच तो यही है कि मीडिया कभी अपने आप में बहुत लाभ कमाने का धंधा रहा ही नहीं है। यानी मीडिया के जरीये सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दूसरे धंधो से लाभ कमाने के हालात देखे जा सकते है। पिछले कई सालों में मीडिया और पत्रकारिता का स्वरूप गिरने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि हर किसी की आगे जाने की चाह रही है और झूठी सच्ची मसालेदार खबरों का आदि बने भारतीय समाज ने सच्ची पत्रकारिता को अलग रख इसे ही सच मान लिया और दूरदर्शन जैसे चैनल को हाशिये पर डाल दिया| लेखक राजीव चौधरी

Tuesday, 1 March 2016

अखबारों में नाचता किसान



सरकार द्वारा पेश बजट में किसान अमीर हो गया, लगता है देश समर्द्ध हो गया! गरीबी गयी अब बस अमीरी रह गयी| अखबार के पन्नों में किसान अपने लिए इतनी रकम देखकर एक बार हँसा और फिर रोया! हँसा तो यू, कि फिर सरकारी कागजों में किसान अमीर हो गया और रोया इस वजह से कि आज तक कोई सरकार आखिर क्यों नहीं समझ पाई कि किसान को क्या चाहिए? दरअसल किसान को सिंचाई के लिए पानी, बीज, खाद, उसकी फसल का वाजिब दाम और उसका नकद भुगतान| जिसे कोई भी सरकार नहीं देना चाहती| मै पिछले दिनों मोदी सरकार द्वारा जारी कुछ किसान के लिए योजना देख रहा था, पर मुझे बड़ा घनघोर आश्चर्य ये देखकर हुआ कि मोदी सरकार के विज्ञापन में किसान लेपटोप लिए बैठे थे हालाँकि लेपटोप की स्क्रीन विज्ञापन में दिखाई नहीं दे रही थी मुझे नहीं पता वो अपने लिए योजना सर्च कर रहे थे! या आत्महत्या के तरीके? किन्तु आज जिस किसान के पास खाने को जहर के पैसे नहीं वो किसान लेपटोप लेकर बैठा दिया गया हो शायद यह भी गरीबी के साथ मजाक माना जायेगा|
मेरा अधिकांश जीवन गाँवो में बीता आज भी में उस किसान मजदूर की पीड़ा समझ सकता हूँ, मैंने अभी तक कोई इक्का दुक्का किसान ही देखे होंगे जिनके पेट सीने से बाहर निकले है मैंने हमेशा किसान के पेट पर पड़ी सलवटे देखी और उसकी आँखों में कभी मौसम से तो कभी सरकार से अपने लिए धुंधली आशा की चमक देखी, मैंने 8 रूपये किलो आलू बेचते किसान को देखा और उस आलू के चिप्प्स बनाकर 800 रूपये किलो बेचते व्यापारी देखे फिर दोनों के लिए सरकार का स्नेह्लेप देखा तो पाया कि आखिर भारत में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है, आखिर क्यों? इस सवाल के तह तक जाने के बजाए जो सरकारें कर रही हैं वे मर्ज़ का इलाज नहीं बल्कि उसको टालने की कोशिश भर है| जेटली ने किसानों और कृषि पर बजट को फोकस करते हुए अपने बजट भाषण में कहा कि 'कृषि एवं किसानों के कल्‍याण के लिए 35,984 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। जिससे किसान की आय दुगुनी होगी सरकार का मकसद कृषि से बाजार तक संपर्क मुहैया कराने का है। किन्तु खेती और किसानी के लिए सरकार द्वारा बजट में की गई बातों से समझ में नहीं आया कि पांच साल में किसानों की आय दोगुनी कैसे हो जाएगी। ये तो बस कृषि क्षेत्र को आवंटित बजट राशि है जिसमे यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार कितना रुपया कहाँ खर्च होना है उसका ब्योरा बताया गया है। इस बजट राशि से सीधे तौर पर किसानों का कोई भला नहीं हो सकता। हां! खेती और किसानी क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए धीरे-धीरे एक ढांचा जरूर खड़ा होगा जिसका फायदा एक वक्त के बाद बड़ी जोत वाले किसानों को मिल सकता है। देश का किसान इस वक्त जिन हालातों से गुजर रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। दो दिन पहले आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया कि औसतन एक किसान की सालाना आमदनी 20 से 30 हजार रुपये है। चलो अब सरकार की बात मान ले कि किसान की आमदनी आने वाले समय में दुगनी होगी मतलब पांच साल बाद इस किसान की सालाना आमदनी 40 हजार से 60 हजार रुपए हो जाएगी। अगर हो भी गई तो क्या इस बात का दावा किया जा सकता है कि महंगाई का आंकड़ा दोगुना या उससे अधिक नहीं होगा? हो सकता है तब तक १०० रूपये का कफ़न पांच गुणा मंहगा होकर 500 रूपये का हो जाये?
दूसरी मुख्य बात यह कि जब मोदी सरकार आई और सरकार का मेक इन इंडिया का नारा लगा तो मुझे लगा जरुर यह सरकार कृषि जैसे मजबूत ढांचे को इस प्रोजेक्ट से जोड़ेगी किन्तु अब समय के साथ लग रहा है कि कहीं मेक इन इंडिया का वो मशीनी शेर छोटे किसान के जिन्दा बैल ना खा जाये? क्योकि खेती-किसानी पर लगातार आपदा की वजह से किसान भीषण कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक घाटे का सौदा होने की वजह से हर दिन 50 के करीब किसान मौत को गले लगा रहे हैं। बजट सत्र शुरू होने से पहले किसान हितों से जुड़े लोग उम्मीद जता रहे थे कि आम बजट में गांव, खेती और किसान के अस्तित्व को बचाने के लिए सकारात्मक तौर पर तुरंत राहत देने वाली कोई घोषणा या पहल होगी। क्योकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है हालांकि जानकार इस सरकारी आकंडे को काफी कम कर आंका गया समझते हैं, जबकि इससे कहीं अधिक किसानों ने खेती-बाड़ी से जुड़ी तमाम कठिनाइयों समेत अन्य कारणों से आत्महत्या की राह चुन ली। यह उस देश के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात है जहां की 60 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी से गुजारा करते हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए था कि जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उबारने के लिए एक लाख करोड़ से अधिक की राशि का बजट में प्रावधान किया गया, उसी तरह से किसानों का कर्जा माफ करने के लिए बजट में यथोचित धनराशि का प्रावधान किया जाता। सब-कुछ अगर किसान के लिए किया जा रहा है तो उस किसान को बचाने का काम तो पहले किया जाना चाहिए। जो भुखमरी लाचारी के कारण मर रहा है| किसान आज मर रहा है दवा भी आज ही दी जानी चाहिए!! लेखक राजीव चौधरी