Monday, 7 December 2015

कब तक दूषित इतिहास पढाया जाता रहेगा ?



संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडके ने जिस तरह आर्यों को बाहरी और खुद को भारतीय बताया ये बात समझ से परे आखिर किस आधार पर आर्यों को बाहरी कहा! करोडो सालो से भारतीय सभ्यता, संस्कृति भारत के नैतिक मूल्यों परम्पराओं की रक्षा करते हुए अपनी जान की परवाह ना कर इस मिटटी की रक्षा के लिए अपने प्राण मात्रभूमि के चरणों में अर्पित करने वाले लोग यदि मल्लिकार्जुन खडके की नजरों में बाहरी है तो सौभाग्यशाली है ये पावन भूमि कि आर्य इसकी रक्षा के लिए लड़े वरना मुगलों की तरह अस्मत रोंदकर भी जा सकते थे दरअसल ये गलती मल्लिकार्जुन खडके की भी नहीं इतिहास में जो पढाया जाता है वो ही लोग बोलते है और इतिहास किसने लिखा पहले मुगलों ने फिर वामपंथियों ने जो इस देश में अपनी पकड़ बनाना चाहते थे और हर बार उत्तर भारत में आकर फ़ैल हो जाते थे क्योंकि उत्तर भारत में इनका विदेशी इतिहास नहीं चल पाता था तो इन लोगों ने अपना गुस्सा इतिहास पर निकाल दिया और खुद को भगवान राम-कृष्ण की संतान मानने वालों को विदेशी लिखने लगे किन्तु दुर्भाग्य इस बात का की सत्ता में रहते हुए देश की आजादी के गीत गाने वाले लोग आज तक उस इतिहास को नहीं बदलवा सके!!
 अभी कुछ दिन पहले मैं  इतिहास की सामान्य ज्ञान की किताबों को खंगाल रहा था कि अचानक जो निकला वो वाकई मल्लिकार्जुन जैसे लोगों की बातों को सत्य करता दिखाई देता है जैसे लिखा है-  भारत में आर्यों ने आकर किस सभ्यता की नींव डाली थी?  वैदिक सभ्यता की, भारत में आने वाले आर्य क्या कहलाते हैं?  इंडो आर्य, आर्यों का मुख्य निवास स्थान कहां माना जाता है, आल्पस पर्वत के पूर्वी क्षेत्र और यूरेशिया, आर्य भारत में सबसे पहले कहाँ बसे थे? सप्त सिन्धु प्रदेश में, आर्य कब भारत आये 1500  . पूर्व के आस-पास  भारत में आर्य कहाँ से आये थे?मध्य एशिया से आर्यों के प्राचीन आदरणीय ग्रंथ कौन सा हैं,वेद आर्यों का सबसे प्रथम प्राचीन वेद कौन-सा है?ऋग्वेद|  किस ग्रंथ का संकलन ऋग्वेद पर आधारित हैं?सामवेद, वेद कितने हैं?चार-ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद तथा अथर्ववेद, ऋग्वेद के सूक्तों की रचना किस प्रदेश में हुई थी?पंजाब प्रदेश ऋग्वेद में सम्पत्ति का प्रमुख रूप क्या था?गौधन, आरमिभक आर्यों का मुख्य पेशा क्या था?पशुपालन,  आर्यों के समय की मुख्य पैदावार क्या थी?धान, गेहूँ, जौ आर्यों की भाषा क्या थी ? संस्कृत,  आर्य दार्शनिक क्या कहलाते थे?ऋषि
समाज में कैसा विवाह प्रथा प्रचलित था? जातीय, अंतर्जातीय तथा विधवा विवाह, आर्य शब्द का मूलत: क्या अर्थ हैं, उत्तम एक भी बात नहीं लिखी की आर्य भारत के नागरिक है और जब आर्य बाहरी है इनकी भाषा संस्कृत है तो ये भाषा बाहर कहाँ है?
अब जो इन पुस्तकों को पढ़ेगा वो तो यहीं कहेगा की आर्य बाहरी थे किन्तु मल्लिकार्जुन खडके जी एक बार यह भी बता देते कि बाबर कहाँ से आया था? अकबर, मोहमम्द बिन कासिम, नादिरशाह चेंगेज खान, खिलजी, शेरशाह शुरी कुत्बुब्दीन, गौरी गजनवी, बलबन, तुगलक, ओरंगजेब हिंदुस्तान की लाज लुटने वाले ये लोग कहाँ से आये थे? क्या ये यहीं पैदा हुए थे? लाज बचाने वालों को अपने रक्त से इस भूमि को सीचने वालों को तो यह कहकर अपमानित कर दिया की विदेशी है एक बार यह भी बता दो की मुग़ल कहाँ से आये थे? खेर आप क्या बताओगें आपका वोट बेंक हिल जायेगा इससे पहले सुमित्रा महाजन जी का आभार की उन्होंने मल्लिकार्जुन खडके के इस बयान को संसद की कारवाही से बाहर कर दिया लेकिन मल्लिकार्जुन के इस बयान ने हमको जरूर झकझोर दिया है कि कब तक हमे यह दूषित इतिहास पढाया जाता रहेगा?....
राजीव चौधरी

डोनाल्ड ट्रम्प, बिसात बहुत पहले बिछ चुकी है|

पूरी दुनिया में मजहब के नाम पर गुटबाजी और मजबूत होती नजर आ रही है। मुसलमानों को बार-बार ये बयान देना पड़ता है कि इस्लाम का दहशतगर्दी से कोई लेना-देना नहीं है। क्या दहशतगर्दी और मजहब का कोई रिश्ता है? 2013 से लेखकों, ब्लागरो और विदेशी नागरिकों की बेरहम हत्याओं ने बांग्लादेश को खतरनाक देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया क्योंकि इन हत्याओं की जिम्मेदारी खुद आतंकी संगठन लेते है. और मजहब विशेष के नाम पर ये आतंकी संगठन दुनिया पर कौनसी विचारधारा थोपना चाहते है यह कोई नहीं जानता.  कई बार तो इनके धार्मिक मौलाना मौलवी ही इन मामलों पर मौन और निशब्द पाए जाते हैं. क्यों पाए जाते इस बात का कारण जानना इतना महत्व नहीं रखता, विरोध करना मतलब प्राण गवाना. कोई भले ही इसे इनकी मूक सहमति कहता हो! किन्तु मैं इसे सहमति की बजाय भय कह सकता हूँ!अमेरिका, भारत ऑस्ट्रेलिया, अब पेरिस सच तो यह है लोग प्रलय से ज्यादा आतंकवाद से डरे है! आज सभी धर्मो के अन्दर उदारवाद और कट्टरपंथ बीज पनप रहा है किन्तु यदि आज कोई उदारवादी इस कट्टरपंथ पर गर्व करता हो तो आगे शर्मिंदा भी इसी पर होना पड़ेगा क्योंकि दुनिया के आरम्भ में प्रेम था और अंत में भी प्रेम ही होगा.




यदि आज डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए मजबूत दावेदार माना जा रहा तो निसंदेह वो है क्योकि इसक बिसात बहुत पहले बिछ चुकी है. अमेरिका की जानी-मानी लेखिका और ब्लागर पामेला जैलर अपने देश में बढ़ रही मजहबी मानसिकता के आतंक को लेकर मुखर है| दुनिया भर की जिहादी गतिविधियों पर नजर रखते हुए वे आतंक की बारीकियों को समझने में जुटी है| वे कहती है यही लक्ष्य 1400 साल पहले था और यही लक्ष्य आज भी है. तब भी उदारवादी मुस्लिम जगत कट्टरपंथी मुस्लिम जगत से शिकस्त खा रहा था और आज भी वो ही हाल है. जब कोई आतंकी खुद को उड़ा लेता हैं तो लोग नासमझ बन यही कहते सुनते मिलते हैं कि वह तो बड़ा अच्छा लड़का था. उसका अडोस पडोस का व्यवहार भी बहुत अच्छा बताया जाता है आखिर किस तरह वो इस काम में लग जाता है? दरअसल होता यह हैं जब कोई मुस्लिम हद से ज्यादा मजहबी हो जाता है और वह फिदायीन बनने से गुरेज नहीं करता  और हिलेरी क्लिंटन कहती है कि हम इस्लाम से नहीं आतंक से लड़ रहे है, कुरान में ऐसा कुछ नहीं जो रूहानी जिहाद की बात करता हैं
 पामेला जैलर आगे लिखती 9/11 हमला करने वाले आतंकियों ने 90 बार अल्लाह हु अकबर के नारे लगाये थे कोई मुझे बताये यह आतंकवाद इस्लामिक क्यों नहीं हैं? और अमन शांति के पक्षधर मुस्लिमों को यह सच चुभता क्यूँ हैं?? जबकि कुरान की आयत 3:151 की वह आयत क्यूँ नहीं चुभती जिसमें कहा गया हैं कि हम जल्दी ही गेर मजहबी लोगों के दिल में खोफ बरपा देंगे? मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने कहा था हम उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ कट्टरपंथी लोगों ने पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है. पामेला आगे लिखती है क्या यह बात हजम हो सकती हैं 1.6 अरब मुस्लिम शेष दुनिया की 7 अरब आबादी को मार डाले ताकि सिर्फ मुस्लिम फल फूल सके


पामेला के अनुसार अगर आप मुस्लिम नहीं है तो इस्लामी कानून के तहत आपके सामने तीन रास्ते हैं या तो इस्लाम कबूल कर लो, इस्लामिक झंडा उठाकर लम्बे चौड़े टेक्स चुकाओं मोलवियों की गुलामी में रहो जहाँ आपके कोई बुनयादी अधिकार नहीं हैं या फिर मर जाओं वह लिखती है अमेरिकी नागरिको का कत्ल हो रहा है और अमेरिका के वाममार्गी इस उम्मीद से खून सनी जमीन को झाड़-पोंछ कर रहे है. कि अमेरिका की जनता को कुछ नहीं दिखेगा जिस तरह राष्ट्रपति ने यह भी कहा, 'इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम कितने ताकतवर हैं और हमारे पास कितनी मजबूत फौज है. अमेरिका अकेले दुनिया की समस्याओं को नहीं सुलझा सकता.' मुझे लगता है इसमें मुस्लिम जगत के विद्वानों, विचारको, और मानवता के पक्षधर लोगों को एक मंच पर आकर इस सच को स्वीकार करना होगा.  किसी भी मजहब की दीनी तालीम मानवता के लिए मुक्कमल रास्ते नहीं खोज सकती आज उसकी जरूरत शांति की हम सबने बहुत लड़ाइयों के बारे में सुना देखा जाना आओ अब आगे के इतिहास पर खून की छीटों की बजाय प्रेम और सदभाव के गीत लिखे क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि आप अपने विरोधी को जेल में कैद कर सकते हैं, लेकिन विचारों को बंधक बनाकर नहीं रख सकते.
लेख राजीव चौधरी














Friday, 4 December 2015

वो दिल्ली नहीं पेरिस है ?



मै कहता हूँ राजनीती करो शासन करो या मत करो पर मानवीय मूल्यों का शोषण मत करो बाटला हाउस  19 सिsssतंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ की गयी मुठभेड़ थी, जिसमें दो संदिग्ध आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए, दो अन्य संदिग्ध सैफ मोहम्मद और आरिज़ खान भागने में कामयाब हो गए, जबकि एक और आरोपी ज़ीशान को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मुठभेड़ का नेतृत्व कर रहे एनकाउंटर विशेषज्ञ और दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा इस घटना में मारे गए। मुठभेड़ के दौरान स्थानीय लोगों की गिरफ्तारी हुई, जिसके खिलाफ अनेक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं] और विशेष रूप से जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने व्यापक रूप से विरोध प्रदर्शन किया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे कई राजनीतिक संगठनों ने संसद में मुठभेड़ की न्यायिक जांच करने की मांग उठाई, जिस पर सलमान खुर्शीद जी ने दुःख जताया और राजनेतिक गलियारों से यहाँ तक खबर आई कि सुनकर सोनिया गाँधी जी काफी देर रोई अब ये आंसू आतंकवाद के प्रति हमदर्दी के थे या वोटों के लिए| यह तो उनकी पार्टी जाने या वो खुद लेकिन इतना जरूर है की इन राजनैतिक दलों के आतंकवाद के प्रति  उदार रवैये से भारत का हिन्दू और मुस्लिम अपने –अपने धर्म के प्रति हद से ज्यादा उदारता दिखाने को मजबूर हुआ| 
अन्याय विद्रोह का जन्मदाता है, उपेक्षा, क्रोध और कोप से बदले की भावना उत्पन्न होती है उचित समय पर न्याय ही राष्ट्र की समस्याओं के समाधान का कारक होता है| लेकिन एक विशेष वर्ग की वोट पाने का जो हथकंडा इन धर्मनिरपेक्ष दलों ने अपनाया वो देश के लिए खतरनाक साबित होता दिख रहा है जिसका नतीजा याकूब मेमन के जनाज़े के पीछे चलने वाली भीड़ से अंदाजा लगाया जा सकता है दरअसल इनकी सहानुभूति वोट पाने तक सिमित थी लेकिन कुछ विशेष सम्प्रदाय लोग इसे आतंक के प्रति लगाव समझ बैठे और बढ़ चढ़ कर आतंकियों के जनाज़े में शामिल होने लगे अब इसके लिए न हिन्दू दोषी न मुस्लिम यदि दोषी है तो कहीं न कहीं वो लोग जो खुले मंच से राष्ट्रद्रोह  के बयान  रहे है| कुछ नेता पाकिस्तान जाकर देश विरोधी बयान दे रहे है, हो सकता है उनके लिए यह राजनैतिक एजेंडा हो लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि फिर राष्ट्रद्रोह किसे कहते है? जबकि अन्य देशों में ऐसा नहीं है | साप्ताहिक पत्रिका शार्ली हेबदो के कार्यालय पर घातक हमला कर 12  लोगों की हत्या के कुछ महीनों बाद 13 नवंबर को पेरिस में आतंकवादी हमला कर करीब 130 लोगों की हत्या कर  दी गयी जिससे फ्रांस समेत वो देश जो  मानवीय मूल्यों की रक्षा करने का दंभ भरते है सकते में आ गये और आतंक के समूल नाश को एकजुट हो आतंक के खिलाफ हमला कर दिया एक के बाद फ्रांस में कट्टरपंथी मोलानाओ की गिरफ्तारी शुरू कर उन लोगों को पकड़ लिया गया जो धर्म के नाम पर धार्मिक उन्माद फैला रहे थे| लेकिन फिर भी अपने देश के मणिशंकर अय्यर और आजम खान जैसे नेता इस हमले को भी जायज ठहराने में लग गये जबकि भारत के बाद किसी धर्मनिरपेक्ष देश में मुसलमानों की आबादी फ्रांस में सर्वाधिक है लेकिन वहां के किसी राजनैतिक दल ने इसे फर्जी मुठभेड़ नहीं कहा और हमले के बाद आज तक कारवाही चालू है सभी जानते है की स्थानीय लोगों की मदद के बिना कभी किसी देश में हमला नहीं होता अत: सभी राजनैतिक दलों को इस बात को गोर करना होगा की अपने आस-पास भी यह आतंक की प्रयोगशाला न  बन पाए जो मानवता के लिए खतरा पैदा करे भारत तो पहले से ही आतंकवाद का शिकार देश है अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ो में शिकार 162 देशों में भारत छ्टे नंबर पर आता है फिर भी हमारा देश आतंक को लेकर गंभीर नही है राजीव चौधरी