Friday, 4 December 2015

वो दिल्ली नहीं पेरिस है ?



मै कहता हूँ राजनीती करो शासन करो या मत करो पर मानवीय मूल्यों का शोषण मत करो बाटला हाउस  19 सिsssतंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ की गयी मुठभेड़ थी, जिसमें दो संदिग्ध आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए, दो अन्य संदिग्ध सैफ मोहम्मद और आरिज़ खान भागने में कामयाब हो गए, जबकि एक और आरोपी ज़ीशान को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मुठभेड़ का नेतृत्व कर रहे एनकाउंटर विशेषज्ञ और दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा इस घटना में मारे गए। मुठभेड़ के दौरान स्थानीय लोगों की गिरफ्तारी हुई, जिसके खिलाफ अनेक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं] और विशेष रूप से जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने व्यापक रूप से विरोध प्रदर्शन किया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे कई राजनीतिक संगठनों ने संसद में मुठभेड़ की न्यायिक जांच करने की मांग उठाई, जिस पर सलमान खुर्शीद जी ने दुःख जताया और राजनेतिक गलियारों से यहाँ तक खबर आई कि सुनकर सोनिया गाँधी जी काफी देर रोई अब ये आंसू आतंकवाद के प्रति हमदर्दी के थे या वोटों के लिए| यह तो उनकी पार्टी जाने या वो खुद लेकिन इतना जरूर है की इन राजनैतिक दलों के आतंकवाद के प्रति  उदार रवैये से भारत का हिन्दू और मुस्लिम अपने –अपने धर्म के प्रति हद से ज्यादा उदारता दिखाने को मजबूर हुआ| 
अन्याय विद्रोह का जन्मदाता है, उपेक्षा, क्रोध और कोप से बदले की भावना उत्पन्न होती है उचित समय पर न्याय ही राष्ट्र की समस्याओं के समाधान का कारक होता है| लेकिन एक विशेष वर्ग की वोट पाने का जो हथकंडा इन धर्मनिरपेक्ष दलों ने अपनाया वो देश के लिए खतरनाक साबित होता दिख रहा है जिसका नतीजा याकूब मेमन के जनाज़े के पीछे चलने वाली भीड़ से अंदाजा लगाया जा सकता है दरअसल इनकी सहानुभूति वोट पाने तक सिमित थी लेकिन कुछ विशेष सम्प्रदाय लोग इसे आतंक के प्रति लगाव समझ बैठे और बढ़ चढ़ कर आतंकियों के जनाज़े में शामिल होने लगे अब इसके लिए न हिन्दू दोषी न मुस्लिम यदि दोषी है तो कहीं न कहीं वो लोग जो खुले मंच से राष्ट्रद्रोह  के बयान  रहे है| कुछ नेता पाकिस्तान जाकर देश विरोधी बयान दे रहे है, हो सकता है उनके लिए यह राजनैतिक एजेंडा हो लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि फिर राष्ट्रद्रोह किसे कहते है? जबकि अन्य देशों में ऐसा नहीं है | साप्ताहिक पत्रिका शार्ली हेबदो के कार्यालय पर घातक हमला कर 12  लोगों की हत्या के कुछ महीनों बाद 13 नवंबर को पेरिस में आतंकवादी हमला कर करीब 130 लोगों की हत्या कर  दी गयी जिससे फ्रांस समेत वो देश जो  मानवीय मूल्यों की रक्षा करने का दंभ भरते है सकते में आ गये और आतंक के समूल नाश को एकजुट हो आतंक के खिलाफ हमला कर दिया एक के बाद फ्रांस में कट्टरपंथी मोलानाओ की गिरफ्तारी शुरू कर उन लोगों को पकड़ लिया गया जो धर्म के नाम पर धार्मिक उन्माद फैला रहे थे| लेकिन फिर भी अपने देश के मणिशंकर अय्यर और आजम खान जैसे नेता इस हमले को भी जायज ठहराने में लग गये जबकि भारत के बाद किसी धर्मनिरपेक्ष देश में मुसलमानों की आबादी फ्रांस में सर्वाधिक है लेकिन वहां के किसी राजनैतिक दल ने इसे फर्जी मुठभेड़ नहीं कहा और हमले के बाद आज तक कारवाही चालू है सभी जानते है की स्थानीय लोगों की मदद के बिना कभी किसी देश में हमला नहीं होता अत: सभी राजनैतिक दलों को इस बात को गोर करना होगा की अपने आस-पास भी यह आतंक की प्रयोगशाला न  बन पाए जो मानवता के लिए खतरा पैदा करे भारत तो पहले से ही आतंकवाद का शिकार देश है अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ो में शिकार 162 देशों में भारत छ्टे नंबर पर आता है फिर भी हमारा देश आतंक को लेकर गंभीर नही है राजीव चौधरी


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