जिस देश में निर्धन
व्यक्ति दाने-दाने को और निरक्षर बच्चे अक्षरों के लिए भटक रहे हो, जिस देश का
किसान भूखा आत्महत्या कर रहा हो, जिस देश का मजदूर बिना दवा के तड़फ-तड़फ कर मर रहा
हो, जिस देश में कुपोषण का शिकार बच्चे सबसे ज्यादा हो, उस देश में साहित्य अकादमी
हो न हो| पर उस देश को अनाज अकादमी, दवा
अकादमी, कृषि अकादमी की आवश्यकता है| आज खुले बाजार और उदारीकरण ने भारत के करोड़ों
किसान, मजदूरों को भुखमरी की दहलीज़ पर खड़ा कर दिया है| जबकि सब जानते हैं अगर किसान
और मजदूर नहीं हो तो दुनिया की त्रासदी कुछ दिन में हो जायेगी लेकिन फिर एक किसान
को उसके किसान होने का पुरस्कार नहीं मिलता एक मजदूर को उसके मजदूर होने का
पुरस्कार नहीं मिलता फिर एक लेखक को लेखक होने का पुरस्कार क्यों दिया जाता हैं ?
लेखक की रचना से देश
का पेट नहीं भरता देश का पेट अनाजों की बोरियों से भरता हैं| लेखक की रचना को पढना
पड़ता है| पुरस्कार की भारी भरकम राशी देनी पड़ती हैं| चाय पानी का खर्चा अलग से
होता हैं| तालियों के शोर के लिए बुद्धिजीवियों की फौज को निमन्त्रण देना पड़ता हैं
क्योंकि साहित्य पुरस्कार कोई राशन वितरण केंद्र तो नही हैं जो गरीबी की रेखा,
परिवार के सदस्य देखे तथा सामान थमा दिया| साहित्य समाज की चितवृति का दर्पण होता
है| मैं कई बार कवि सम्मेलनों में गया मंचो से हिंदी भाषा का अपमान देखा गद्य और
पद्य का अपमान देखा चालीस-पचास धूर्त लोग बैठ जाते हैं और एक दुसरे की अनर्थक तुकबंदी का महिमा मंडन करते रहते हैं| फिर मुझे लगता है
यदि आज कोई भ्रष्ट है तो हिंदी का लेखक है लालच, और आत्ममुग्धता से भरा हुआ
हमेशा मेरे कुछ
मित्र मुझे कहते है कि धर्म, राजनीती से ऊपर उठकर लिखो| अब में समझता हूँ धर्म
राजनीती से ऊपर साहित्य है और हिंदी साहित्य पर बौद्धिक नक्सलियों का कब्ज़ा है तो
उससे अच्छा तो मेरा अन्नदाता हैं क्योंकि काव्य से पेट की आग नहीं बुझती लेकिन
कभी-कभी लगता है हमारे देश के प्रधानमंत्री जी कहते तो ठीक है समस्या भी ठीक उठाते
पर हल नहीं बताते अभी पिछले दिनों ही तो कहा था की हिन्दू मुस्लिम धर्म की बजाय
भूख से लड़े अच्छी बात है हम भी यहीं चाहते है निवाला चाहें कल मिल जाये पर देश
सामाजिक, आर्थिक रूप से संपन्न हो पर उसके लिए सरकारों को समझना चाहिए कि भारत
कृषि प्रधान देश है और आज तक किसी किसान को भारत रत्न नहीं मिला इससे बड़ी शर्म की
बात कोई हो सकती है? खेल को दिया, कला को दिया, राजनीती, समाज, संगीत, विज्ञान आदि
सब को दिया किन्तु आज तक किसी किसी किसान को राष्ट्रीय मंच से सम्मानित नहीं किया
निजाम बदलते रहे पर किसान उपेक्षित का उपेक्षित रहा और अब सरकार को चाहिए हिंदी
अकादमी जैसी संस्था बंद कर देनी चाहिए कब तक सरकार इन लोगों के डर से मासूम कबूतर की तरह आँख बंद किये बैठी रहेगी
साम्प्रदायिक दंगे पहले भी होते थे आज भी हो रहे है और यह वैचारिक आतंकी आगे भी
कराते रहेंगे अत: सरकार और राष्ट्रवादी लेखको को चाहिए कि जनता को रंगा बिल्ला पर
लिखी कविता की बजाय आर्थिक संघर्ष और सामाजिक विकास के गीत सुना कर जाग्रत करे तभी
अच्छे दिन आ सकते हैं
राजीव चौधरी
