Wednesday, 25 November 2015

कृषि अकादमी क्यों नहीं ?




जिस देश में निर्धन व्यक्ति दाने-दाने को और निरक्षर बच्चे अक्षरों के लिए भटक रहे हो, जिस देश का किसान भूखा आत्महत्या कर रहा हो, जिस देश का मजदूर बिना दवा के तड़फ-तड़फ कर मर रहा हो, जिस देश में कुपोषण का शिकार बच्चे सबसे ज्यादा हो, उस देश में साहित्य अकादमी हो न हो|  पर उस देश को अनाज अकादमी, दवा अकादमी, कृषि अकादमी की आवश्यकता है| आज खुले बाजार और उदारीकरण ने भारत के करोड़ों किसान, मजदूरों को भुखमरी की दहलीज़ पर खड़ा कर दिया है| जबकि सब जानते हैं अगर किसान और मजदूर नहीं हो तो दुनिया की त्रासदी कुछ दिन में हो जायेगी लेकिन फिर एक किसान को उसके किसान होने का पुरस्कार नहीं मिलता एक मजदूर को उसके मजदूर होने का पुरस्कार नहीं मिलता फिर एक लेखक को लेखक होने का पुरस्कार क्यों दिया जाता हैं ?
लेखक की रचना से देश का पेट नहीं भरता देश का पेट अनाजों की बोरियों से भरता हैं| लेखक की रचना को पढना पड़ता है| पुरस्कार की भारी भरकम राशी देनी पड़ती हैं| चाय पानी का खर्चा अलग से होता हैं| तालियों के शोर के लिए बुद्धिजीवियों की फौज को निमन्त्रण देना पड़ता हैं क्योंकि साहित्य पुरस्कार कोई राशन वितरण केंद्र तो नही हैं जो गरीबी की रेखा, परिवार के सदस्य देखे तथा सामान थमा दिया| साहित्य समाज की चितवृति का दर्पण होता है| मैं कई बार कवि सम्मेलनों में गया मंचो से हिंदी भाषा का अपमान देखा गद्य और पद्य का अपमान देखा चालीस-पचास धूर्त लोग बैठ जाते हैं और एक दुसरे की अनर्थक तुकबंदी का महिमा मंडन करते रहते हैं| फिर मुझे लगता है यदि आज कोई भ्रष्ट है तो हिंदी का लेखक है लालच, और आत्ममुग्धता से भरा हुआ
हमेशा मेरे कुछ मित्र मुझे कहते है कि धर्म, राजनीती से ऊपर उठकर लिखो| अब में समझता हूँ धर्म राजनीती से ऊपर साहित्य है और हिंदी साहित्य पर बौद्धिक नक्सलियों का कब्ज़ा है तो उससे अच्छा तो मेरा अन्नदाता हैं क्योंकि काव्य से पेट की आग नहीं बुझती लेकिन कभी-कभी लगता है हमारे देश के प्रधानमंत्री जी कहते तो ठीक है समस्या भी ठीक उठाते पर हल नहीं बताते अभी पिछले दिनों ही तो कहा था की हिन्दू मुस्लिम धर्म की बजाय भूख से लड़े अच्छी बात है हम भी यहीं चाहते है निवाला चाहें कल मिल जाये पर देश सामाजिक, आर्थिक रूप से संपन्न हो पर उसके लिए सरकारों को समझना चाहिए कि भारत कृषि प्रधान देश है और आज तक किसी किसान को भारत रत्न नहीं मिला इससे बड़ी शर्म की बात कोई हो सकती है? खेल को दिया, कला को दिया, राजनीती, समाज, संगीत, विज्ञान आदि सब को दिया किन्तु आज तक किसी किसी किसान को राष्ट्रीय मंच से सम्मानित नहीं किया निजाम बदलते रहे पर किसान उपेक्षित का उपेक्षित रहा और अब सरकार को चाहिए हिंदी अकादमी जैसी संस्था बंद कर देनी चाहिए कब तक सरकार इन लोगों के डर से  मासूम कबूतर की तरह आँख बंद किये बैठी रहेगी साम्प्रदायिक दंगे पहले भी होते थे आज भी हो रहे है और यह वैचारिक आतंकी आगे भी कराते रहेंगे अत: सरकार और राष्ट्रवादी लेखको को चाहिए कि जनता को रंगा बिल्ला पर लिखी कविता की बजाय आर्थिक संघर्ष और सामाजिक विकास के गीत सुना कर जाग्रत करे तभी अच्छे दिन आ सकते हैं 
राजीव चौधरी

एक कटोरी धर्म उधार दे दो माई!!!!



आजकल सहनशीलता के प्रमाणपत्र बांटे जा रहे जिसको नही मिलता वो परेशान होकर मीडिया के पास आ जाता है फिर मीडिया चिल्लाता है इसके पास सहनशीलता का प्रमाणपत्र नहीं है इसको भी दिया जाये उसके बाद न्यूज़ रूम में चाय के कप हाथ में लेकर लम्बी –लम्बी बहस होती है, एक दुसरे को देश का इतिहास भूगोल पढाया जाता है तब उससे पूछा जाता है कुछ दिन पहले आपके पास जो सहनशीलता प्रमाण पत्र था वो कहाँ गया? दो राजनैतिक कम्पनी इस देश को चला रही है एक 60 साल अपना माल बेचती रही अब दूसरी आ गयी उसका प्रोडक्ट नया है लोग हजम नहीं कर रहे है कुछ को राजनैतिक अपच है तो कुछ को धार्मिक हालाँकि माल खोलकर देखो तो बस रेपर बदला है माल पुराना ही है वैसे बाकि राजनैतिक कंपनियां भी है पर झोला छाप है गलियों में अपना माल बेचती है आज कल उनका माल लोग कम पकड़ रहे है इस वजह से देश के अन्दर एक अजीब किस्म का ड्रामा चल रहा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया का हाल कुछ ऐसा हो गया कि एक बार कोई बुढ़िया अपनी देहलीज़ पर बैठी रो रही थी किसी राहगीर ने पूछा ताई क्यों रो रही हो? बुढ़िया ने भीगी पलके उठाकर कर कहा- बेटे खाली समय था कुछ काम नही था तो सोचा थोड़ी देर रो ही लेती हूँ!!!
 बिलकुल आज यही हाल आज देश के न्यूज़ चैनलों का हो रहा है कुछ काम नहीं चलो सहनशीलता पर ही बहस करा लेते है और देखो कई बार जब अपने मनमाफिक जबाब नहीं मिलता तो एंकर ही असहनशील हो जाता है फिर इसी बीच नई बहस चालू हो जाती है कि आतंक का धर्म बताओ? फिर धमाल हो जाता हो जाता है, अचानक ब्रेक ले लिया जाता है| इससे मुझे याद आया की जब मैं कक्षा 5 में था, तब स्कूल में सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिता चल रही थी  दुसरे स्कूल के भी विद्यार्थी आये थे, प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहे थे, हमारी टीम हारने वाली थी कि अचानक मेरे बाजू में बैठे एक लड़के ने प्रश्न किया कि बताओ पिस्तो कौन थी? इस पर दुसरे विद्यालय के बच्चों में कानाफूसी शुरू हो गयी और अंत में उन्होंने हार मान ली अध्यापक महोदय ने पूछा बेटा अब तुम बताओ “पिस्तो” कोण थी!! लड़के ने सहज भाव से जबाब दिया मास्टर जी पिस्तो हमारी गली में एक कुतिया थी जो अब मर गयी!
अब मेरी इस कहानी को आतंक से जोड़कर नई बहस को जन्म मत देना ये बस एक कहानी थी कभी मेरा भी मोदी और वीके सिंह वाला हाल कर दो बस एक बात थी जो ख़तम हो गयी हाँ में कह रहा था आतंक का धर्म क्या है तो बता दूँ आतंक के कई धर्म है, एक तो बेरोजगारी, दूसरा गरीबी, तीसरा संकोच, चोथा अल्पज्ञान, पांचवा बढती आबादी, छटा, धार्मिक प्रलोभन, सातवाँ मरनोपरांत समस्त सुख सुविधा का काल्पनिक आनंद, आठवां उपेक्षा, नोवाँ जबरन अपनी मानसिकता थोपना, दसवां इन सब में इन लोगों का साथ देना वो भी आतंक का धर्म ही होता है| अब इसमें  कुछ धर्म बचे हो आप जोड़ देना क्योंकि धर्म एक ऐसी चीज है जो दिखाई नहीं देता पर खतरे में आ जाता है कई रोज पहले पडोस के कई घरों में कटोरी लेकर गया था कि थोडा धर्म उधार ले लू बाद में लौटा दूंगा मन थोडा दुविधा में था पर किसी के घर नही मिला फिर मस्जिद गया मंदिर गया कहीं तो मिल जाये कटोरी लेकर खाली हाथ लौट कर आना पड़ा अब पता चला ताई क्यों रो रही थी शायद यूँही रो रही होगी कि अरबों रूपये का मालिक धार्मिक बयान देता है पर भुगतना गरीब को पड़ता है तो क्यूँ न उनके लिए रो लिया जाये जो धर्म बेचते है पर वो कटोरी में नहीं मस्तिक्ष में भरकर भेजते है पीडीएफ फाइल बनाकर फिर कोई कुछ भी करे इसके बाद मिडिया, राजनेताओ और धर्मगुरुओं का काम रह जाता है एक मुहावरा हैं ना आसमान सर उठा लेना उसका अर्थ अब मीडिया और नेताओ को देखकर समझा किसी को देश के बाहर नहीं करना चाहिए एक हिंदुस्तान ही तो ऐसा मुल्क है जो सांप और शिव दोनों को दूध पिलाता है मैं यह कहूँगा जिसमें परोपकार हो वह धर्म है। निःस्वार्थ भाव से त्याग निष्ठा से परिपूर्ण देश-सेवा सबसे बड़ा परोपकार और धरम है||||
राजीव चौधरी

Monday, 16 November 2015

यूरोप के खाली चर्च बिकाऊ है


पहले मैं सुनता था कि विदेशियों के एक दो बार पहने हुए कपडे भारत आते है और फिर उन्हें धोकर रेहड़ी पटरियों पर भारत व अन्य एशियाई देशों में बेचा जाता है, दरअसल आज इसाईयत भी पश्चिमी देशों के लिए एक ऐसी ही चीज बन गयी है जिसका उनके अपने निजी जीवन में कोई अर्थ नहीं रह गया है, और उसका उपयोग केवल बाहरी मुल्को में निर्यात के लिए रह गया है जैसे वो अपने पुराने कपडे पुरानी दवाई बाहरी मुल्को में बेचते हैं | ऐसे ही अब वो इसाईयत को बेच रहे है |
यदि आपको मेरी यह बात जरा भी विचलित करे  तो आप गूगल पर “यूरोप एम्प्टी चर्च ऑन सेल” यानि के यूरोप के खाली चर्च बिकाऊ है लिख कर भी देख सकते हैं इसका कारण है कि आज पश्चिमी देशों का अधिकतर नागरिक चर्च में जाना पसंद ही नहीं करता वो लोग अब इसे बेकार और समय बरबाद करने जैसी बाते मानने लगे हैं अब ईसाईयत को खुद खतरा अपने लोगों से हो गया हैं और वो लोग इस पंथ को बचाने के लिए  गरीब, व विकासशील देशों में फैला रहे हैं| इसाई पंथ को भले ही पुरुषों ने ईजाद किया हो पर आज यूरोप के चर्चघरों में अधिकतर महिला पादरी मिलेंगी या फिर ये कहो कि वो चर्च अब महिलाओं के क्ल्ब  बनते जा रहे हैं या फिर उन्हें अन्य धर्मो के लोगों को बेच दिया जाते हैं | नीदरलैंड के अनरहम शहर में कभी सेंट् जोसफ चर्च हुआ करती थी आज वहां बच्चे स्केटिंग करते दिख जायेंगे तो इंग्लेंड के सेंट् वाल चर्च में सर्कस के कलाकार प्रशिक्षण लेते मिल जायेंगे यह अकेली   चर्च नहीं  है जो श्रद्धालुओं के अभाव से जूझ रहे है   बल्कि कुछ जगह तो श्रद्धालुओं की अत्यधिक कमी के कारण चर्च या तो वीरान पड़े हैं या फिर शराबखानों  में बदल चुके है कुछ जगह चर्चघरों में दुकाने खुली हैं या फिर वो माल का रूप धारण कर चुके हैं| इंग्लेंड और स्कॉटलैंड की चर्च तो आपको ऑनलाइन बिक्री के लिए इन्टरनेट पर मिल जाएँगी एक ऐसी ही चर्च वह आठ महीने के लिए बाजार पर पड़ा है, जो उत्तर-पूर्व मिनीपोलिस में ब्रॉडवे और मध्य रास्ते के चौराहे के पास एक प्रेस्बिटेरियन चर्च है। जिसकी  कीमत  375,000 डॉलर है।
 अब यदि हम चर्च में जाने वाले लोगों के पिछले कुछ समय के आंकड़े देखे तो 1953 में जहाँ 53 प्रतिशत लोग प्रार्थना के लिए चर्च में जाते थे वहीं 1993 आते-आते  यह संख्या घटकर 40 प्रतिशत रह गयी थी जो अब और भी कम हो गयी है कहने को तो इसाई समुदाय में सामूहिक प्रार्थना में विश्वास किया जाता रहा है और सप्ताह में एक बार चर्च जाना जरुरी समझा जाता है लेकिन यूरोप के लोग आज इस सार्वजनिक प्रार्थना पद्धति से ऊब चुके हैं जिस कारण आयरलेंड में 48% इटली में 39% यूके में 12% और डेनमार्क में 5% लोग ही चर्च जाना पसंद करते हैं वैसे देखा जाये तो प्रार्थना कभी भीड़ में नहीं होती क्योंकि उपासना ध्यान एकांत का विषय रहा है पर फिर भी  कुछ पंथो में इसे ही उपासना का जरूरी अंग समझा जाता रहा है चाहें वो शुकवार की नमाज हो या रविवार की चर्च में प्रार्थना|  पर आज के आधुनिक जमाने में लोग विचारशील हो गये है जिस कारण वो भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहते इसी वजह से आज पश्चिमी देशों के पादरी उपेक्षित है हर साल बंद होने वाले गिरजाघरों की संख्या 40 हजार के करीब पहुँच गयी है और नये खुलने वाले चर्चो की संख्या 1000 है हालाँकि इसाई लोगो का चर्च में जाना उनकी आस्था का प्रतीक नहीं हैं क्योंकि वो लोग चर्च के बहाने अपना दिल बहलाने जाते थे पर आज बदलते परिवेश में भौतिक संसाधनों से मनोरंजन करता इसाई समुदाय गिरजा घरों से अपना मुख मोड़ चुका है और कभी अत्याधिक लागत से खड़े किये चर्च आप बिकने के विज्ञापनों की कतार में खड़े है| दरअसल झूट, फरेब और मानवता की हत्या के बल पर खड़े किये संगठन जिन्हें बाद में धर्म का नाम तक दे दिया आज खुद के जाल में फंस रहे हैं जहाँ इसाई प्रोटेस्टैंटों और केथोलिको के  बीच खड़ा है  कैथोलिकों और प्रोटेस्टैंटों की धार्मिक मान्यताओं में बड़े अंतर हैं। उसी तरह शिया सुन्नी के बीच फंसा इस्लाम दिखाई दे जायेगा लेकिन इनसे अलग यदि आज हिन्दू अपने धर्म से व्याप्त कुरीतियाँ और उसमे फैला अन्धविश्वास निकाल दे तो वैदिक धर्म की पताका पुरे विश्व पर फिर लहरा उठेगी इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है अमेरिका में आज सब भारतीय भाषाओँ में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है वहां की महिलाये भारतीय पहनावे को ज्यादा पसंद करने लगी हैं अब धर्म आपके हाथ में है उसे आप किस तरीके से जग के सामने रखोंगे !
राजीव चौधरी