Wednesday, 27 November 2024

वो मेरी भूल थी....पुस्तक

वो मेरी भूल थी एक ऐसी कहानी है जिसने चेतना की भावनात्मक यात्रा से मुझे गहराई से जोड़ा। इस कहानी में चेतना का कॉलेज के दिनों में अंचित से हुआ प्यार, शादी के बाद रिश्तों में आया बदलाव और उसका एक नए अफेयर में उलझना सामने आता है। इन उतार-चढ़ावों ने कई बार मुझे उसकी स्थिति पर गुस्सा दिलाया, तो कई बार उस पर तरस भी आया।
चेतना और अंचित का रिश्ता, जो कॉलेज के दिनों में प्यार से भरा था, शादी के बाद मुश्किल दौर में पहुँच जाता है। चेतना का एक अन्य व्यक्ति के साथ अफेयर और इसके कारण अंचित के साथ रिश्ते में आई खटास ने कहानी को और भी भावुक और जटिल बना दिया है। राजीव चौधरी ने चेतना के इस संघर्ष और उसके भावनात्मक उतार-चढ़ाव को बेहद संवेदनशीलता से उकेरा है, जो इसे एक सजीव और relatable कहानी बनाता है।
इस किताब में प्यार, गलती, अफसोस, और पछतावे के पहलुओं को बारीकी से दर्शाया गया है। चेतना की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे फैसले न केवल हमारे, बल्कि हमारे करीबी लोगों के जीवन पर भी गहरा असर डालते हैं। यह किताब रिश्तों की नाजुकता और भावनाओं की गहराई को छूते हुए हमें आत्मचिंतन का मौका देती है। वो मेरी भूल थी एक ऐसी कहानी है जो हमें खुद की गलतियों से सीखने और रिश्तों की अहमियत समझने का संदेश देती है। अगर आप एक ऐसी भावनात्मक और दिल को छू लेने वाली कहानी पढ़ना चाहते हैं, जो जीवन की सच्चाईयों को उजागर करे और आपको सोचने पर मजबूर करे, तो यह किताब आपके लिए एक शानदार विकल्प है। KOMAL AAHUJA

Wednesday, 10 April 2019

आज मेरी पोस्ट पर कुंवारे लड़कों को दवा पिलाई जाएगी

कई बार जब आप अपना फेसबुक लॉग-इन करते होंगे तो फेसबुक वॉल को थोड़ा ऊपर-नीचे करते ही सामने एक दो लड़कियों की तस्वीरें आ ही जाती होंगी। आम तौर पर वे तस्वीरें एक साधारण सी लड़की की होती है और साथ में लिखा होता है, “मैं गरीब हूं, मेरी फोटो कोई शेयर नहीं करता” या फिर एक बेहद खूबसूरत लड़की की तस्वीर के साथ लिखा होता है, “क्या आपको मेरा व्हाट्सएप्प नंबर चाहिए”? कुछ तस्वीरों के साथ लिखा होता है, “मेरा कोई दोस्त या बॉयफ्रेंड नहीं है। क्या आप मुझसे दोस्ती करोगे?”
ध्यान से देखें तो इन सभी तस्वीरों पर हज़ारों और लाखों की संख्या में लाइक और शेयर मिलते हैं। पिछले दिनों मैंने कई फेसबुक पेजों पर ऐसे लोगों की संख्या देखी तो हैरान रह गया। फेसबुक पर “नेहा कुमारी” के नाम से एक पेज है। इस पेज को लाखों लोगों ने लाइक किया है। अब इस नेहा कुमारी के पेज पर एक फोटो पोस्ट होता है। फोटो एक लड़की की थी। उम्र यही कोई बीस-इक्कीस वर्ष के आस-पास होगी। फोटो के साथ अंग्रेज़ी में सिर्फ “हैलो” लिखा था। मैं यह देख कर दंग रह गया कि इस एक फोटो को 1 लाख 15 हज़ार लोगों ने पसंद किया, 14 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इस पर अपनी बेशर्मी भरी राय भी रखी और गज़ब यह भी था कि 5 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इसे अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर भी किया।
यह कुछ ऐसा ही है जैसे देश में किसी भी सरकारी पद के लिए रिक्तियां निकलती हैं तो पद अगर सौ या दो सौ भी है, तो आवेदन लाखों में जमा होते हैं और हर आवेदक यही सोच रहा होता है कि क्या पता उसका चयन हो जाए। यह बड़ी संख्या सिर्फ रोज़गार में ही नहीं है बल्कि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो आजकल प्रेम भी इसी श्रेणी में आ रहा है। इसके बाद “नेहा कुमारी” की पोस्ट पर एक कॉमेंट आता है, “आज मेरी पोस्ट पर कुंवारे लड़कों को दवा पिलाई जाएगी, जिससे उनको जल्दी से गर्लफ्रेंड मिल जाए।” इस कमेंट के आते ही दवा पीने वालों की भीड़ रोज़गार मांगने वालों से ज़्यादा हो गई। यही नहीं, इससे अगली पोस्ट पर एक लड़की के फोटो के साथ लिखा था, “मैं कैसी हूं।” यहां भी जिस्म की नुमाइश करने वाले आवेदक लाखों की संख्या में मौजूद थे। ऐसा ही हाल एक दूसरे पेज “पूजा कुमारी” का था। वहां भी एक लड़की के फोटो के साथ लिखा था,“मेरा कोई बॉयफ्रेंड नहीं है। क्या आपका व्हाट्सएप नम्बर मिलेगा दोस्ती करने के लिए?” बस फिर क्या था, सभी तन्हा और अकेले आवेदक भारी संख्या में अपने-अपने आवेदन लेकर उपस्थित हो गए। लाइक और शेयर के अलावा कमेंट बॉक्स में मोबाइल नम्बर की लाइन लग गई। फिर एक के बाद एक मैंने ऐसे बहुत सारे पेज खंगाले। कोई किसी लड़की तो कोई किसी भाभी के नाम से थे, जिन पर कथित देवरों की संख्या हज़ारों और लाखों में आवेदन लिए खड़ी थी। ये आवेदन प्रेम के थे या आलिंगन के यह आप सब भली-भांति समझते हैं। असल में सोशल मीडिया और खासकर फेसबुक पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा है जो किसी न्यूज़, ब्लॉग, समाज सेवा या लोक कल्याण की जागृति के पेज लाइक करने की बजाय इस तरह के पेजों को लाइक और शेयर करके अपने इंटरनेट डाटा का दुरुपयोग करते हैं।
फेसबुक का सही उपयोग किया जाए तो वहां आप किसी भी विषय की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। लोग अपने मुताबिक न्यूज़, ब्लॉग और आर्टिकल पढ़ सकते हैं और अन्य सामान्य जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा करने से इन पेजों को प्रोत्साहन भी मिलेगा ताकि वे देश, समाज, युवा एवं महिलाओं के जीवन की सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक आदि परेशानियों को ज़्यादा से ज़्यादा उठाकर सामाजिक उन्नति की ओर ले जाए। इसके विपरीत एक लड़की की फोटो पर लाखों की संख्या में लाइक, शेयर और कमेंट जिस तरीके से आ रहे हैं, उससे सोशल मीडिया का भला हो सकता है लेकिन समाज का क्या भला होगा? आपने कभी सोचा है कि इन पेजों पर लड़कियों की ये तस्वीरें कहां से आ रही हैं? पिछले दिनों खबर आई थी कि ऐसे पेजों को चलाने वाले लोग दरअसल फेसबुक से लड़कियों की तस्वीरें चुराते हैं और कई बार तो सार्वजनिक जगहों पर लड़कियों की तस्वीरें भी खींचते हैं और उन्हें पेज के प्रबंधकों को भेजते हैं। विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि भारत में फेसबुक पर 40% से ज़्यादा महिलाएं इस तरह के अपराध से परेशान हैं। केवल महिलाएं ही नहीं बल्कि जब इन पेजों की तस्वीरों पर व्हाट्सएप नंबर मांगे जाते हैं तो पुरुषषों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सुनने में आया है कि फेसबुक और व्हाट्सएप के ज़रिये राजनीतिक दल लोगों तक पहुंचने के लिए हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। इन लोगों के नंबर आसानी से इन राजनीतिक दलों को बेच दिए जाते हैं। कई कंपनियां भी अपना ग्राहक समूह बढ़ाने के लिए इन मोबाइल नम्बरों का इस्तेमाल करती हैं। महिलाओं और पुरुषों दोनों को यह समझना होगा कि इसमें नुकसान दोनों का है और दूसरे लोग उनका फायदा उठा रहे हैं। महिलाओं को यह ध्यान रखना होगा कि महिला होने के नाते वे अपनी सामाजिक बराबरी, शिक्षा और स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दें और उन महिलाओं की आवाज़ बने जो सोशल मीडिया की पहुंच से दूर हैं। पुरुष भी अपने राजनीतिक और सामाजिक विचारों के साथ उन महिलाओं और सामाजिक पेजों को प्राथमिकता दें, जो समाज को जगाने का कार्य कर रहे हैं। पुरुषों को उन पेजों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देना चाहिए जो कुंवारे लोगों को गर्लफ्रेंड मिलने की दवा पिला रहे हैं। Rajeev Choudhary

Thursday, 7 June 2018

स्वरा कभी नहीं चाहेंगी कि उनके बच्चें उनकी इस फिल्म का ये सीन देखे?


यूँ तो चरित्र और संस्कार की कोई स्थाई परिभाषा दक्षिण एशिया में नहीं हैं यदि लोगों के जेहन का फाटक खोलकर देखें तो न जाने क्या-क्या निकलेगा. अभी देखा  “वीरे दी वेडिंगको लेकर इस समय सोशल मीडिया और इंटरनेट पर बवाल मचा हुआ है. सबसे ज्यादा चर्चा फिल्म के विवादित सीन को लेकर है, जिसमें स्वरा भास्कर मास्टरबेशन अर्थात (हस्तमैथुन) करती दिख रही हैं.आलोचकों का कहना है कि पद्मावती के दौरान स्वरा ने औरत को मात्र योनि समझने और संस्कार पर भाषण क्यू पेला था और अब वो खुद क्या कर रही हैं.

बस यही से हंगामा खड़ा हो गया कि अपने हाथों से कैसे और सबके सामने क्यों? कुछ इसे सॉफ्ट पोर्न कह रहे है तो कुछ स्वरा के पिछले कुछ बयानों को लेकर पहले से ही नाराज थे. क्या ऐसा हो सकता है सब एक जैसा सोचे? शायद नहीं! बस यही से विवाद खड़ा होता है. सबसे पहले हमें ये सोचना होगा कि स्वरा कोई आध्यत्मिक गुरु नहीं है ना ही उसके पास सांस्कृतिक गतिविधियों पर नजर रखने का कोई मंत्रालय. वो एक सिने अदाकारा है जिसे अपनी कलाकारी, निर्माता निर्देशक का नजरिया और एक कहानी पर्दे पर बेचनी होती है. अब लोग क्या सोचते है शायद ये परवाह उसको नहीं होगी वह सिर्फ इतना सोचती है कि आगे कैसे बढ़ा जाये.

कल यदि कोई निर्माता निर्देशक स्वरा से कहेंगा कि बड़े बजट और बड़े सितारों के साथ उसे सत्यवान-सावित्री फिल्म में सावित्री का रोल अदा करना है तो जरुर करेगी! क्योंकि वो उसका काम हैं. फिर याद दिला दूँ वो सिर्फ एक अदाकारा है. आप ट्रोल का लठ लेकर खड़ें हो जाइये या गलियों के गट्ठर या फिर कोई संस्कार चालीसा उसकी सोशल मीडिया की वाल पर फेंक आईये उसे कुछ फर्क पढने वाला नहीं है. बस इतना होगा आपकी कॉन्ट्रोवर्सी से उसकी फिल्म का प्रचार अच्छा होगा यही स्वरा क्या सभी कलाकार चाहते भी है. यदि आपका मानना है कि मास्टरबेशन  एक सामान्य प्रक्रिया है तो स्वीकार कीजिये ट्रोल भी एक सामान्य प्रक्रिया है.

हाँ जो लोग आज मास्टरबेशन को नारी सशक्तिकरण या नारी की आजादी से जोड़ रहे है शायद वो गलतफहमी या आत्ममुग्धता में जी रहे है क्योंकि ये किसी इन्सान के निजी पल होते है उनको सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने परोसना कोई सशक्तिकरण नहीं है. यदि है तो फिर महिला अधिकारों, उनके आरक्षण उनकी सामाजिक समानता की बात करना बेमानी है. करने दो हस्तमैथुन देखते है इससे कितना सशक्तिकरण होता है.

एक सवाल ये भी है कि मास्टरबेशन पर खुलकर बात होनी चाहिए या नहीं? मेरे ख्याल से हर किसी के निजी जीवन और सामाजिक जीवन के बीच एक बहुत पतला सा महीन जिसे संस्कार कह सकते है उसका पर्दा होता है जिसे उठाकर सार्वजनिक करना सही नहीं होगा. फिल्म के निर्माता निर्देशक तो पैसा कमा लेंगे पर आम समाज को इससे क्या मिलेगा? कौन चाहेगा किसी की बहन बेटी या भाई पुरे परिवार के सामने ये कहे की वो मास्टरबेशन कर रहा है या करने जा रहा है?

चलो ये फिल्म है ये क्या सन्देश देती है और समाज इससे क्या सीख लेता है, यह तो लोगों के ऊपर निर्भर करता है. लेकिन फिल्म के माध्यम से महिला समाज को सन्देश देने वाली इस फिल्म की सभी अदाकारा में कुछ विवाहित है और उनकी कोशिश यही होगी कि उनका रिश्ता भारतीय परम्पराओं के अनुसार ही निभे, उनके निजी पल सार्वजनिक न हो. किन्तु इसके विपरीत मीडिया और कथित नारीवादी लोग ये दिखाने की कोशिश में लगे हुए है कि शादी-विवाह, बच्चें, रिश्ते-नाते हमारी सामाजिक परम्पराए सब बकवास चीज है. एक महिला को इन सबसे बचना चाहिए. पर कब तक ये उन्हें भी नहीं पता!

कुछ इसी माध्यम से  नारी स्वतन्त्रता के नाम पर उसके असली आन्दोलन को भटकाया जा रहा है जैसे गाली, शराब और सेक्स आज के नारीवाद के अहम बिंदु बना दिये गए हैं जिनके बिना आज की नारी मॉडर्न और आजाद हो ही नहीं सकती. जहाँ आज एक महिला को जो अभी भी शिक्षा, समाज में अपने अधिकारों के लिए जंग कर रही है उसे ये सिखाया जा रहा है कि सोशल मीडिया पे आकर बताएं कि उसे मासिक धर्म कब आता है. क्या ये जागरूकता है.?

निजता, समाज और जीवन का अभिन्न हिस्सा होती है! मुझे नहीं लगता हमारे देश के गाँव देहात या शहरी मध्यम वर्ग की लड़कियों और महिलाओं को इस नारीवाद से कुछ लेना देना होगा? वो सिर्फ इतना सोचती है कि आवारा लड़कों की वजह से उसकी शिक्षा प्रभावित न हो, बिना दहेज दिए ससुराल ठीक मिल जाये, उसका पति उसे अपने बराबर अधिकार दे और दुःख सुख में आत्मयिता से उसका साथ दे. वो अपने कार्यालय या कार्य स्थल में किसी भी प्रकार के शोषण का शिकार न हो. क्या नारीवाद की परिभाषा यह नहीं हो सकती कि मैं जितना समर्पण भाव अपनी  मां और बहन के प्रति रखता हूं, उतना ही अन्य महिलाओं के प्रति रख सकूं. क्या नारीवादका पैमाना सिर्फ यह हो सकता है कि आप किसी लड़की को खुले में सेक्स की स्थिति पहुंचने या मास्टरबेशन करने में अपना सहयोग करें?

मुझे स्वरा के मास्टरबेशन कोई दिक्कत नहीं है. न ही इससे कि वो अपनी निजी जिन्दगी क्या करती हैं और ना मैं इससे उसके चरित्र प्रश्न उठाता. क्योंकि मास्टरबेशन से चरित्र का क्या लेना देना? ये उसके निजी पल है. लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि स्वरा कभी नहीं चाहेंगी कि उनके बच्चें उनकी इस फिल्म का ये सीन देखे?..राजीव चौधरी

Sunday, 22 April 2018

ऑनलाइन नफरत को रोकने के लिए भारत को भी लाना होगा जर्मनी जैसा कानून

जर्मनी में 2017 में बना एक कानून नेट्जडीजी (NetzDG), 1 जनवरी से लागू कर दिया गया है। इस कानून का उद्देश्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स, फेसबुक, ट्विटर आदि से नफरत फैलाने वाले भाषण, फेक न्यूज़ और अश्लील अवैध सामग्री को दूर करना है। बताया जा रहा है कि इस कानून के अनुसार 1 जनवरी से कोई भी ऐसा कंटेंट जो नफरत या डर फैलाने वाला होगा, उसे हटा दिया जाएगा।
अधिकांश लोग असल वास्तविकता और इतिहास से दूर उन्हीं विचारों या समाचारों पर विश्वास करने लगते हैं जो उनमें गर्व की भावना भरते हैं।
जैसे- जिसे हिन्दू होने पर गर्व हो वही इस पेज को लाइक करें, अभी-अभी शोभायात्रा निकली जामा मस्जिद के सामने, युवा बजरंगियों का जन सैलाब, नार्मद दूर रहें, कट्टर हिन्दू शेयर करें और पेज लाइक करना ना भूलें आदि।
ये कुछ और उदहारण हैं- मेरे ख्वाजा का सिक्का चलेगा क्या आपका एक शेयर मिलेगा, सच्चे मुस्लिम इस पेज को लाइक करें। येरूशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित किए जाने पर फिलिस्तीनी भाइयों ने मस्जिदे अक्सा के लिए सड़कों पर उतर कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया, इससे भी बड़ा हुज़ूम अब हिंदुस्तान के कोने-कोने से निकलना चाहिए अल्लाह मदद करे। हर जगह हरा छाएगा, मीम राज्य फिर आएगा वगैरह-वगैरह।
कुछ इसी तरह के पोस्ट हर दिन सोशल मीडिया पर सबके सामने से गुज़रते हैं। ये नफरत का वो तेल है जिसे तमाम धार्मिक-मज़हबी संस्थान पिंडलियों पर रगड़-रगड़कर सड़कों पर हिंसा तक करने को उतर आते हैं। अब चाहे धर्म के नाम पर लोगों के भड़काना हो या नफरत का कोई झूठ फैलाना हो या फिर किसी सेलीब्रिटी को निशाना बनाना हो। सोशल मीडिया पर यह काम धड़ल्ले से जारी हैं। दो मिनट में ये लोग आपको धर्म का पाठ पढ़ा जाते हैं कि कौन सा त्यौहार मनाना है और कौन सा नहीं। हवन की फोटो डालने वालों को ये लोग कलश और दीपक का उचित स्थान समझाते है, क्या धर्म के विरुद्ध है और क्या नहीं या फिर किन चीजों से मज़हब को खतरा होता है और किन से नहीं।
मुस्लिम महिलाएं क्या पहने, हिन्दू क्या पहने, इनके पास उचित मात्रा कॉपी पेस्ट की गयी सामग्री है। इसके बाद नफरत और समाज में ज़हर भरने वाले फोटोशॉप हुए रक्तरंजित चित्र आप इनकी फेसबुक वाल से मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं। इनका कोई स्थाई पता नहीं होता ये अक्सर दिल के बीच अपने फोटो सजाकर हर रोज़ दिमाग से लेकर सामाजिक समरसता पर हमला करते रहते हैं।
ये लोग करवाचौथ की शुभकामनाएं देने पर हरभजन सिंह को सिख धर्म का पाठ पढ़ा जाते हैं। सूर्य नमस्कार करने पर क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मज़हबी आयतें सिखा जाते है। देश की बैडमिंटन प्लेयर सायना नेहवाल को अपने स्मार्टफोन की पिक अपलोड करने पर देशद्रोही कहकर स्वदेशी का झंडा थमा जाते हैं। किसी बड़े पत्रकार या अभिनेता को कितना बोलना है, क्या बोलना है उसकी मात्रा ये लोग तय करते दिख जाते हैं। किसी की मौत पर रोने वालों को पिल्ले, किसी को कुतिया या वेश्या तक कहना या देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों को अपशब्द कहना ये अपना पहला हक समझते हैं।
पिछले महीने ही ट्विटर पर ट्रोल किए जाने से आहत होकर पॉर्न फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अॉगस्ट एम्स ने आत्महत्या कर ली थी। क्रिकेटर हो या अभिनेता, पत्रकार हो या अन्य कोई सामाजिक, राजनीतिक चेहरा उनको ट्रोल करने का ये चलन एक तरह से दैनिक नियम बन गया है। आखिर कौन हैं ये लोग जो कमज़ोर आस्था और कट्टर सोच लिए उसे थोपने को सोशल मीडिया पर ग्रुप, पेज और कमेन्ट बॉक्स टटोल रहे हैं?
कुछ वर्ष पहले तक कट्टर, नफरत या हिंसा की विचाधारा से ग्रस्त लोग दूर-दूर थे, लेकिन आज के दौर के संचार माध्यमों ने उन्हें निकट ला खड़ा किया है। संचार के तमाम तरीकों से एक तरह की विचारधारा वाले लोग एक-दूसरे से प्रभावित हो रहे हैं। एक दूसरे के हद से ज़्यादा प्रोत्साहन की वजह से उनकी अपनी राय भी कट्टर होती जाती है। मैं अपनी जगह सही हूं, इस विचारधारा पर भरोसा बढ़ने के साथ ही लोग दूसरे से नफरत करने लगते हैं।

Rajeev Choudhary
दुनिया को एक दुसरे से जोड़ना वाला सोशल मीडिया का मंच आज निर्बाध, अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति का मंच बन गया है। ये आसान भी है! क्योंकि गलत नाम और परिचय के साथ सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाया जा सकता है और आपके ख़िलाफ कौन बोल रहा है आपको पता तक नहीं चल पाता।
कुछ लोग सोचते होंगे कि इनकी नफरत से हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है तो सच ये कि इनकी नफरत की विचारधारा से पूरा समाज और देश हिस्सों में बंट जाता है, पिछले कुछ वर्षों में कई हत्याओं का मूल कारण सोशल मीडिया पर फैलती विचारधारा भी रही। दरअसल ये कोई रूहानी आत्मा नहीं है। आपको इन्हें सोशल मीडिया पर रिपोर्ट करना होता है, ब्लॉक करना भी अच्छा विकल्प है या फिर सरकार ही जर्मनी की तरह कोई कानून ले आये, क्योंकि इन्हें समझाना और हज़ार साल पुरानी खोपड़ी खुजाना एक ही बात है।....राजीव चौधरी

ज़ैनब तुम उस पार भी हो, ज़ैनब तुम इस पार भी हो

प्यारी मरहूम ज़ैनब,
सुना है किसी दरिन्दे ने तुम्हें अगवा कर तुम्हारे साथ बलात्कार करने के बाद तुम्हारी लाश को कचरे के ढेर में फेंक दिया। तुम्हारी हत्या के बाद पाकिस्तान में उबाल उठा, सड़कों पर लोग निकले, विरोध प्रदर्शन हुआ। बाद में सरकार से आश्वाशन लेकर लोग लौटे। ज़ैनब कभी हमारे यहां भी ऐसा ही हुआ था। जब तुम मुश्किल से दो साल की रही होगी तब हमारे देश में भी निर्भया कांड को लेकर दिल्ली की सड़कों पर लोग ऐसे ही उतरे थे। एक ऐसा ही आश्वाशन लेकर लौटे थे, इसके बाद हमारे यहां कानून बदले पर हालात आज तक नहीं बदले।
ज़ैनब! जब मैंने देखा तुम्हारी मौत पर एक न्यूज़ एंकर किरन नाज़ ने अपनी छोटी सी बेटी को गोद में लेकर विरोध करते हुए कहा, “जनाज़ा जितना छोटा होता है, उतना ही भारी होता है।” यह सुनकर अचानक मेरा भी मन भर आया था, फिर तुम्हारे देश की एक अभिनेत्री सबा कमर तुम्हारे लिए न्याय मांगते हुए एक कार्यक्रम में फूट-फूटकर रोने लगी।
तुम्हें कैसे बताऊं ज़ैनब! कभी हमारे यहां भी ऐसे ही लोग भावुक होते थे, दु:खी होकर रोते थे। हमारे यहां भी मीडिया के एंकरों की आंखे भर आती थी। अब हमारे दिल पत्थर हो गए हैं, अब यहां किसी बच्ची या महिला के साथ ऐसी घटना होती है तो कोई उबाल या बवाल नहीं उठता।
यहां अब सब कुछ बदल गया है। मीडिया की गोद में नेता और धर्मगुरु बैठे होते हैं, बहस होती है, बात धर्म और जाति और राजनीति तक ले जाई जाती है और इसके बाद शो खत्म हो जाता है। नारीवादी लोग पुरुषों को कोसते हैं और पुरुषवादी महिलाओं के कपड़ों को, तो कुछ बेचारे कानून व्यवस्था को दोषी ठहराकर शर्म से गर्दन झुकाए बैठे होते हैं।
ज़ैनब! मैंने पढ़ा कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 10 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रेप के 128 मामले दर्ज हुए और इन मामलों में एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई। इस मामले में हमारा रिकॉर्ड तुम्हारे देश से अच्छा है, यहां गिरफ्तारी तो तुरंत हो जाती है, बस बात सज़ा तक नहीं बढ़ पाती।
सरहदें इंसानों को ही तो रोक सकती हैं, लेकिन वो सोच और घटियापन को कैसे रोके? शायद तुम नहीं जानती होगी कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हुआ? तुम्हारी हत्या तो सरहद के उस पार हुई पर लेकिन दिल इस पार तक भी पसीजे।
तुम्हारे देश के कर्णधार हाफिज़ जैसे आतंकियों को और हमारे देश के कर्णधार सात सौ साल पहले की पद्मावती की इज्ज़त बचाने के लिए ज़्यादा चिंतित हैं। राज्यों की जीती-जागती लड़कियों के बलात्कार और हत्या पर ये कतई चिंता करते नहीं दिखते।
RAJEEV CHOUDHARY 

पता है ज़ैनब! हमारे देश के हमीरपुर ज़िले की 17 वर्षीय लड़की एक लड़की के पड़ोस में रहने वाले दो भाइयों ने पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसके ऊपर केरोसीन डालकर उसे जला दिया। हरियाणा के जींद ज़िले के बूढ़ाखेड़ा गांव की एक लड़की के साथ गैंगरेप कर उसकी हत्या कर दी गई। पानीपत में घर से कूड़ा डालने गई एक एक 11 साल की किशोरी को अगवा कर हत्या करने के बाद उसका गैंगरेप किया गया। एक सिंगर की हत्या हुई और इसके बाद भी बलात्कार की खबरें जारी हैं।
ज़ैनब! कभी हमारे यहां भी रेप की खबर को अखबार की सुर्खियों में रखा जाता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं इन ख़बरों को पांचवे छठे पेज पर भी कोने में जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। ज़ैनब तुम्हारा देश हो या हमारा, यहां अब इंसानियत और बचपने का मोल नहीं रहा, लोग बस धर्म या मज़हब बचा रहे हैं।
ज़ैनब! सरहद के दोनों ओर महिलाओं के चिन्तक बैठे हैं, एक तरफ हलाला को मज़हब का हिस्सा बता रहे हैं और दूसरी तरफ रेप को अधार्मिक कृत्य। अब बताओं किस की और कौन सी बात माने? महिला सम्मान यहां शिलालेखों पर तो अंकित हैं पर ज़ैनब खबरें तो महिला अपमान और उनके खून से सनी हैं!
ज़ैनब! तुम्हारे देश में दो साल पहले इसी शहर में जिसकी मिट्टी में तुम दफ़न हो एक सेक्स स्कैंडल का पता चला था जिसमें हुसैन खान वाला गांव में सैकड़ों बच्चों का यौन शोषण किया जाता और फ़िर मोबाइल फोन से उनकी फिल्म बनाई जाती थी। हमारे यहां भी कुछ ऐसा ही है, कभी मदरसों से बच्चियों को बचाया जाता है तो कभी बाबाओं की गुफा से। ज़ैनब तुम्हें अफसोस होगा कि हम फिर भी धर्म और मज़हब के नाम पर इनको बराबर बचा रहे हैं।
ज़ैनब! तुम्हें पता है सरहद के इस पार हो या उस पार जितनी संख्या में लोग युद्धों में मारे जाते हैं, उससे अधिक तो इन दोनों देशों में महिलाएं और बच्चियां रेप, प्रेम और इज्जत के नाम मार दी जाती हैं। फिर भी दोनों तरफ के लोग महिलाओं के सम्मान की गौरव गाथा का नाद करते नहीं थकते।
उम्मीद है ज़ैनब तुम खुदा के घर में महफूज़ रहोगी, यहां इंसान की दुनिया में तो तुम्हारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रही। अबकी बार जब वापिस आओ तो एक सवाल उस ऊपर वाले से ज़रूर पूछना कि मैं इंसानों की उस दुनिया में किसलिए जाऊं?
राजीव चौधरी

ब्रेकिंग न्यूज़ के बैनर में आम आदमी की खबर कहां है?

जब दिल्ली में संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आधी रात को जूतम पैजार हो रहे हों, बिहार में एक पूर्व स्वास्थ मंत्री अपने घर वर्तमान मुख्यमंत्री पर भूत प्रेत भेजने का आरोप जड़ता हो, जब उत्तर प्रदेश में एक विधायक धर्म के आधार पर अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने का ज्ञान झाड़ रहा हो, ठीक उस समय बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िले में एक अनियंत्रित कार की चपेट में आने से 9 बच्चों की मौत पर भला कौन दुःख मना रहा होगा?
RAJEEV CHOUDHARY 
ये सब उस भारतीय को सोचना पड़ेगा जिसका सुख दुःख आज मीडिया से लेकर उद्योगपति, नेता से लेकर अभिनेता, धर्म के नाम पर धर्मगुरु और जाति के नाम पर जातिवादी नेता चट कर गये।
देश में न जाने कितने न्यूज़ चैनल हैं जो पल-पल की खबर लोगों तक पहुंचाने का दावा कर रहे हैं। किसी के पास सबसे बड़ी खबर है तो किसी के पास सच्ची खबर है। लेकिन इसमें एक आम भारतीय की खबर कहां है? सजे हुए न्यूज़रूम हैं, मेकअप किये एंकर बैठे हैं और हर रोज वही वक्ता हैं वही प्रवक्ता हैं। भूकम्प के केंद्र बिंदु तक जाने वाले संवाददाता, जब आत्महत्या करते किसान और आधारकार्ड न होने पर भूख से मरने वाली बच्ची के घर तक न पहुंच पाए तो सोचिये ये न्यूज़ किसके लिए चल रही है?
सद्भावना, समरसता, समानता, लोकतंत्र की बात हर रोज़ होती है, पर 1150 करोड़ रूपये का गबन कर सरकार और बैंक को आंख दिखाने वाला तथा केरल में थोड़ा सा खाना चुराने के आरोप में एक आदिवासी युवक की पीट-पीटकर हुई हत्या और लाचारी में जिस्म तक बेचने वाली किसी गरीब के बीच कैसी समानता, कैसा सद्भाव?
पूंजीवादी समाज में मुनाफे का पहिया खूब घूम रहा है, किसान से 2 रूपये किलो का आलू खरीदकर चिप्स बनाकर 900 रूपये किलो बेचने वाले, चटकारे लेकर खाने वाले, किसानों के लिए योजना बना रहे हैं भला किस मुंह से मेहनत और पूंजीवाद के बीच समानता का बेसुरा राग अलापा जा रहा है?
न जाने कितने दिन बीत गये देश के किसी गरीब नागरिक की ज़रूरतों की खबर न्यूज़ चैनल पर देखे हुए, बस हर रोज़ कुछ गिने-चुने चेहरों पर ही कैमरे घूमते हैं। स्टूडियों में शाम को दंगल होता है, कहीं ताल ठुकती है, कोई कह रहा है हम तो पूछेंगे और किसी को प्राइम टाइम में सरकार को कोसते हुए देखना हर रोज़ का किस्सा है।
चेहरे वही हैं, वही अभिनेता है, वही नेता है कोई चुनाव जीत गया कोई हार गया। हर रोज़ खबरों में बने रहने वाले इन्हीं निर्धारित चेहरों को देखते हैं। ज़्यादा दुखी होने और खुश होने की बात नहीं बस सोचना इसमें आम आदमी और उसकी ज़रूरते कहां है?
पत्रकारिता के बारे में आडवाणी जी ने कभी कहा था कि इनसे झुकने को कहा गया, ये तो रेंगने लगे, अब तो समय बीत गया लेकिन अब भी दरबारों में चारण की तरह विरद बखान हो रहा है। किसी ने सही कहा है कि यह पत्रकारिता का भक्तिकाल है- लगता है कि पत्रकारों के पास कलम की जगह घंटी आ गई है जिसे वो हर समय बजाते रहते हैं और अपने इष्टदेव की आरती उतारते रहते हैं।
समाजवाद लाने वाले परिवार को ढो रहे हैं, बहुजन हिताय वाले अपने हित तलाश रहे है, रामराज की बात करने वाले उल्टा अपनी पार्टी के दशरथों को वनवास या मार्गदर्शन मण्डली में भेजकर राम की बात कर रहे हैं, जिसको इस बात पर आपत्ति या सवाल है वो देश का दुश्मन है या फिर उसे राजनीति की समझ नहीं है।
ये ही गंभीर और सोचनीय बात है कि आज के भारत में भी एक दलित व्यक्ति को अपनी बारात निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ रही है। दलितों के घर खाना-खाने सामाजिक समरसता की बात करने वाले इस मुद्दे से बचकर कुछ तो राष्ट्र रक्षा यज्ञ के लिए मिट्टी ढो रहे हैं।बचे-खुचे नेता अपने जनेऊ दिखा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि भेदभाव पहले भी था और अब भी है। अगर इस देश के बड़े नेता देश निर्माण की बात कर रहे हैं तो देश का निर्माण सिर्फ सड़कें और अस्पताल बनाने से नहीं होता, बल्कि समाज बनाने से होता है। सभी नागरिकों को बराबरी का हक मिलेगा तब ही देश बनेगा। भले ही भारत का संविधान अपनी प्रस्तावना में ही समता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित समाज के निर्माण की बात करता है, लेकिन ये हो नहीं पा रहा है। जिन्हें इस बात पर दंगल और ताल ठोकनी चाहिए वह अपने राजनितिक इष्टदेवों के साथ सेल्फी ले रहे हैं।


कथित अछूत लोग धर्म के लिए बलिदान करे तो वाह-वाह पर यदि वह अपनी खुशी के लिए घोड़ी चढ़ जाएं तो ये बर्दाश्त नहीं किया जा रहा है। उसे डांट डपटकर उसकी औकात याद दिलाई जा रही है। ध्यान रहे ये खबरें इतनी छोटी होती है कि न्यूज़ चैनल पर विज्ञापन के वक्त जब लोग चैनल बदल लेते है तब नीचे पतली पट्टी पर चलती दिखती है। मतलब देश का आम नागरिक आज हिंसा, दंगे और राजनितिक रैलियों का सिर्फ चेहरा बनकर रह गया है।....राजीव चौधरी

Thursday, 26 October 2017

नई अफगान नीति में पाकिस्तान



हम भारतीय भी ना उलझे-उलझे से रहते है. इधर उधर इतना कुछ घट जाता है लेकिन हम इतने भोले है कि राजनैतिक पार्टियों के एजेंडे को अपनी अस्मिता का सवाल बना-बनाकर हेशटेग कर पुश करने में लगे रहते है. अभी पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नई अफगान नीति को लेकर सामने आये थे. इस नई नीति में जहां पाकिस्तान को अमेरिका से फटकार मिली थी तो वहीं अमेरिका ने अफगानिस्तान में भारत से और मदद की मांग की थी. भारत की ओर से ट्रंप की नई अफगान नीति का स्वागत किया गया था.

अमेरिका ने अपनी इस नई अफगान नीति में पाकिस्तान को मिलने वाली इमदाद (सहायता राशि) भी बंद करने की धमकी देते हुए कहा था कि पाकिस्तान अपनी आतंक की सुरक्षित पनाहगाह बंद करें. जिसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने दबी जबान से ही सही लेकिन कहा था कि इमदाद सिमदाद तो अब आप वैसे भी नहीं देते तो हम क्यों कार्रवाही करें? उनके इस जवाब का स्वागत वहां सदन में मौजूद सभी संसद सदस्यों ने मेज थप-थपाकर किया हालाँकि उनकी करीब 269 सदस्यों वाली नेशनल असेम्बली में से उस वक्त वहां सिर्फ 52 ही मौजूद थे.
इस बयान के बाद ख्वाजा आसिफ मानों पूरे पाकिस्तान की आँख का तारा बन गया और सत्ता-विपक्ष दोनों अमेरिका से कह रहे हो कि पाकिस्तान का 37 बिलियन डॉलर कर्जा उतार दो तालिबान को हम ही कूट-काट देंगे.

मुख्य विपक्षी दल का नेता होने के नाते इमरान खान ने भी अमेरिका को आइना दिखाते हुए सरकारी और फौजी सुर में सुर में मिलाते हुए कहा हम किसी दुसरे की लड़ाई अपने घर में नहीं लड़ेंगे.दरअसल अभी इमरान खान सत्ता में नहीं है जब तक इन्सान पावर में नहीं आता तब वो कुछ भी बोल लेता है. राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रम्प को ले लो या अपने देश में देखे तो एक नेता सत्ता में आने से पहले लोकपाल और व्यवस्था परिवर्तन पता नहीं क्या-क्या कर रहा था.

खैर देखा जाये अभी तक पाकिस्तान ने अमेरिका से आतंकवाद से लड़ने के लिए ही साढ़े चौदह बिलियन डॉलर लिए है उनमें से साढ़े चार बिलियन डॉलर उसने फौज को दिए बाकि 10 बिलियन का हिसाब-किताब जितना मेरे पास है उतना ही पाकिस्तान के पास है. मतलब खाया पिया मुकर गया. अब अमेरिका को किस मुंह से समझाएं कि उसकी इमदाद से अच्छा और बुरा तालिबान दोनों पलते है. अच्छे तालिबान को वो भारत और अफगानिस्तान से लड़ने के लिए खुद देते है और बुरा तालिबान खुद ले लेता हैं. सीधे सरकारी ठेकेदार के पास चिट्ठी आती है बोला जनाब खैबरपख्तूनवा में बन रहा पुल उडाऊ या इमदाद दोंगे? वजीरिस्तान में स्कूल उडाऊ या इमदाद दोंगे? मतलब पाकिस्तान के अन्दर जब अमेरिकी इमदाद का कददू कटता है तो सब में बंटता है.

अमेरिका ने कहा है पाकिस्तान हमसे इतने पैसे लेता है पर बदले में कुछ नहीं करता और भारत हमसे इतने पैसे कमाता है लेकिन अफगनिस्तान में कम निवेश करता है. मसलन ट्रंप प्रशासन अपनी नई नीति के तहत चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत की भागीदारी और बढ़े और यह भागीदारी आर्थिक के साथ-साथ सैन्य भागीदारी भी हो. इसका मतलब कुछ इस तरह लिया जाये कि ये अधमरा सांप भारत के गले में डालकर चुपके से वहां से खिसक लिया जाये. पर उनकी आशाओं पर थोडा सा पानी उस वक्त फिर जब भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत युद्ध प्रभावित अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास कार्यों में मदद करना जारी रखेगा लेकिन हम वहां कोई सैन्य सहयोग नहीं दे पाएंगे. भला बिना बात भारत क्यों फंसे कि लुगाई किसी ओर कि लड़ाई किसी ओर की सिर फूडायें हम.
भारत के इस अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकराने के बाद पाकिस्तान की मानों बांछे खिल गयी. वहां के विदेश मंत्री को कतर, रूस और चाइना का दौरा करना था पर विमान को अमेरिका की तरफ मोड़ दिया और वहां जाकर स्वीकार करते हुए कहा कि हाँ पाकिस्तान में आतंकी हैं पर वह हमारे नहीं है वो जनरल जियाहुल हक और मुशर्रफ का लाधा हुआ बोझ है यदि कुछ इमदाद मदद मिल जाये हम ये बोझ आपके हवाले कर देंगे वो क्या हैं कि (आई. एम. एफ.) के कर्जों और आतंकी दोनों का बोझ अब सहन नहीं होता. 

अब इत्ती सी बात से हाफिज सईद भड़क उठा और फटाफट विदेश-ए-खारजा, ख्वाजा आसिफपर 10 करोड़ रूपये का मान हानि का मुकदमा ठोक दिया. मुझे भी ताज्जुब हुआ कि पाकिस्तान में आतंकियों का भी मान होता है? पर हाफिज को कौन समझाए कि उसके ऊपर 50 करोड़ का इनाम है पाक सरकार उसे 50 करोड़ में बेचकर उसके मान हनन का 10 करोड़ चुकाकर भी 40 करोड़ कमा लेगी. और उन पैसों से पता नही कितने हाफिज खड़े हो जायेंगे?
अब जहाँ अमेरिका ने अपनी नई अफगान नीति में पाकिस्तान को एकबार फिर साझीदार बनाया है तो पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आश्वस्त किया है कि आप हमारे साथ हेलीकॉप्टरों में बैठकर चले जहाँ-जहाँ तालिबानी और हक्कानी नजर आये मारों पर जनाब ये (आई. एम. एफ.) के रोज-रोज के तकादो से पिच्छा छुड़ा दो...राजीव चौधरी