Sunday, 22 April 2018

ऑनलाइन नफरत को रोकने के लिए भारत को भी लाना होगा जर्मनी जैसा कानून

जर्मनी में 2017 में बना एक कानून नेट्जडीजी (NetzDG), 1 जनवरी से लागू कर दिया गया है। इस कानून का उद्देश्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स, फेसबुक, ट्विटर आदि से नफरत फैलाने वाले भाषण, फेक न्यूज़ और अश्लील अवैध सामग्री को दूर करना है। बताया जा रहा है कि इस कानून के अनुसार 1 जनवरी से कोई भी ऐसा कंटेंट जो नफरत या डर फैलाने वाला होगा, उसे हटा दिया जाएगा।
अधिकांश लोग असल वास्तविकता और इतिहास से दूर उन्हीं विचारों या समाचारों पर विश्वास करने लगते हैं जो उनमें गर्व की भावना भरते हैं।
जैसे- जिसे हिन्दू होने पर गर्व हो वही इस पेज को लाइक करें, अभी-अभी शोभायात्रा निकली जामा मस्जिद के सामने, युवा बजरंगियों का जन सैलाब, नार्मद दूर रहें, कट्टर हिन्दू शेयर करें और पेज लाइक करना ना भूलें आदि।
ये कुछ और उदहारण हैं- मेरे ख्वाजा का सिक्का चलेगा क्या आपका एक शेयर मिलेगा, सच्चे मुस्लिम इस पेज को लाइक करें। येरूशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित किए जाने पर फिलिस्तीनी भाइयों ने मस्जिदे अक्सा के लिए सड़कों पर उतर कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया, इससे भी बड़ा हुज़ूम अब हिंदुस्तान के कोने-कोने से निकलना चाहिए अल्लाह मदद करे। हर जगह हरा छाएगा, मीम राज्य फिर आएगा वगैरह-वगैरह।
कुछ इसी तरह के पोस्ट हर दिन सोशल मीडिया पर सबके सामने से गुज़रते हैं। ये नफरत का वो तेल है जिसे तमाम धार्मिक-मज़हबी संस्थान पिंडलियों पर रगड़-रगड़कर सड़कों पर हिंसा तक करने को उतर आते हैं। अब चाहे धर्म के नाम पर लोगों के भड़काना हो या नफरत का कोई झूठ फैलाना हो या फिर किसी सेलीब्रिटी को निशाना बनाना हो। सोशल मीडिया पर यह काम धड़ल्ले से जारी हैं। दो मिनट में ये लोग आपको धर्म का पाठ पढ़ा जाते हैं कि कौन सा त्यौहार मनाना है और कौन सा नहीं। हवन की फोटो डालने वालों को ये लोग कलश और दीपक का उचित स्थान समझाते है, क्या धर्म के विरुद्ध है और क्या नहीं या फिर किन चीजों से मज़हब को खतरा होता है और किन से नहीं।
मुस्लिम महिलाएं क्या पहने, हिन्दू क्या पहने, इनके पास उचित मात्रा कॉपी पेस्ट की गयी सामग्री है। इसके बाद नफरत और समाज में ज़हर भरने वाले फोटोशॉप हुए रक्तरंजित चित्र आप इनकी फेसबुक वाल से मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं। इनका कोई स्थाई पता नहीं होता ये अक्सर दिल के बीच अपने फोटो सजाकर हर रोज़ दिमाग से लेकर सामाजिक समरसता पर हमला करते रहते हैं।
ये लोग करवाचौथ की शुभकामनाएं देने पर हरभजन सिंह को सिख धर्म का पाठ पढ़ा जाते हैं। सूर्य नमस्कार करने पर क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मज़हबी आयतें सिखा जाते है। देश की बैडमिंटन प्लेयर सायना नेहवाल को अपने स्मार्टफोन की पिक अपलोड करने पर देशद्रोही कहकर स्वदेशी का झंडा थमा जाते हैं। किसी बड़े पत्रकार या अभिनेता को कितना बोलना है, क्या बोलना है उसकी मात्रा ये लोग तय करते दिख जाते हैं। किसी की मौत पर रोने वालों को पिल्ले, किसी को कुतिया या वेश्या तक कहना या देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों को अपशब्द कहना ये अपना पहला हक समझते हैं।
पिछले महीने ही ट्विटर पर ट्रोल किए जाने से आहत होकर पॉर्न फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अॉगस्ट एम्स ने आत्महत्या कर ली थी। क्रिकेटर हो या अभिनेता, पत्रकार हो या अन्य कोई सामाजिक, राजनीतिक चेहरा उनको ट्रोल करने का ये चलन एक तरह से दैनिक नियम बन गया है। आखिर कौन हैं ये लोग जो कमज़ोर आस्था और कट्टर सोच लिए उसे थोपने को सोशल मीडिया पर ग्रुप, पेज और कमेन्ट बॉक्स टटोल रहे हैं?
कुछ वर्ष पहले तक कट्टर, नफरत या हिंसा की विचाधारा से ग्रस्त लोग दूर-दूर थे, लेकिन आज के दौर के संचार माध्यमों ने उन्हें निकट ला खड़ा किया है। संचार के तमाम तरीकों से एक तरह की विचारधारा वाले लोग एक-दूसरे से प्रभावित हो रहे हैं। एक दूसरे के हद से ज़्यादा प्रोत्साहन की वजह से उनकी अपनी राय भी कट्टर होती जाती है। मैं अपनी जगह सही हूं, इस विचारधारा पर भरोसा बढ़ने के साथ ही लोग दूसरे से नफरत करने लगते हैं।

Rajeev Choudhary
दुनिया को एक दुसरे से जोड़ना वाला सोशल मीडिया का मंच आज निर्बाध, अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति का मंच बन गया है। ये आसान भी है! क्योंकि गलत नाम और परिचय के साथ सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाया जा सकता है और आपके ख़िलाफ कौन बोल रहा है आपको पता तक नहीं चल पाता।
कुछ लोग सोचते होंगे कि इनकी नफरत से हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है तो सच ये कि इनकी नफरत की विचारधारा से पूरा समाज और देश हिस्सों में बंट जाता है, पिछले कुछ वर्षों में कई हत्याओं का मूल कारण सोशल मीडिया पर फैलती विचारधारा भी रही। दरअसल ये कोई रूहानी आत्मा नहीं है। आपको इन्हें सोशल मीडिया पर रिपोर्ट करना होता है, ब्लॉक करना भी अच्छा विकल्प है या फिर सरकार ही जर्मनी की तरह कोई कानून ले आये, क्योंकि इन्हें समझाना और हज़ार साल पुरानी खोपड़ी खुजाना एक ही बात है।....राजीव चौधरी

ज़ैनब तुम उस पार भी हो, ज़ैनब तुम इस पार भी हो

प्यारी मरहूम ज़ैनब,
सुना है किसी दरिन्दे ने तुम्हें अगवा कर तुम्हारे साथ बलात्कार करने के बाद तुम्हारी लाश को कचरे के ढेर में फेंक दिया। तुम्हारी हत्या के बाद पाकिस्तान में उबाल उठा, सड़कों पर लोग निकले, विरोध प्रदर्शन हुआ। बाद में सरकार से आश्वाशन लेकर लोग लौटे। ज़ैनब कभी हमारे यहां भी ऐसा ही हुआ था। जब तुम मुश्किल से दो साल की रही होगी तब हमारे देश में भी निर्भया कांड को लेकर दिल्ली की सड़कों पर लोग ऐसे ही उतरे थे। एक ऐसा ही आश्वाशन लेकर लौटे थे, इसके बाद हमारे यहां कानून बदले पर हालात आज तक नहीं बदले।
ज़ैनब! जब मैंने देखा तुम्हारी मौत पर एक न्यूज़ एंकर किरन नाज़ ने अपनी छोटी सी बेटी को गोद में लेकर विरोध करते हुए कहा, “जनाज़ा जितना छोटा होता है, उतना ही भारी होता है।” यह सुनकर अचानक मेरा भी मन भर आया था, फिर तुम्हारे देश की एक अभिनेत्री सबा कमर तुम्हारे लिए न्याय मांगते हुए एक कार्यक्रम में फूट-फूटकर रोने लगी।
तुम्हें कैसे बताऊं ज़ैनब! कभी हमारे यहां भी ऐसे ही लोग भावुक होते थे, दु:खी होकर रोते थे। हमारे यहां भी मीडिया के एंकरों की आंखे भर आती थी। अब हमारे दिल पत्थर हो गए हैं, अब यहां किसी बच्ची या महिला के साथ ऐसी घटना होती है तो कोई उबाल या बवाल नहीं उठता।
यहां अब सब कुछ बदल गया है। मीडिया की गोद में नेता और धर्मगुरु बैठे होते हैं, बहस होती है, बात धर्म और जाति और राजनीति तक ले जाई जाती है और इसके बाद शो खत्म हो जाता है। नारीवादी लोग पुरुषों को कोसते हैं और पुरुषवादी महिलाओं के कपड़ों को, तो कुछ बेचारे कानून व्यवस्था को दोषी ठहराकर शर्म से गर्दन झुकाए बैठे होते हैं।
ज़ैनब! मैंने पढ़ा कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 10 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रेप के 128 मामले दर्ज हुए और इन मामलों में एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई। इस मामले में हमारा रिकॉर्ड तुम्हारे देश से अच्छा है, यहां गिरफ्तारी तो तुरंत हो जाती है, बस बात सज़ा तक नहीं बढ़ पाती।
सरहदें इंसानों को ही तो रोक सकती हैं, लेकिन वो सोच और घटियापन को कैसे रोके? शायद तुम नहीं जानती होगी कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हुआ? तुम्हारी हत्या तो सरहद के उस पार हुई पर लेकिन दिल इस पार तक भी पसीजे।
तुम्हारे देश के कर्णधार हाफिज़ जैसे आतंकियों को और हमारे देश के कर्णधार सात सौ साल पहले की पद्मावती की इज्ज़त बचाने के लिए ज़्यादा चिंतित हैं। राज्यों की जीती-जागती लड़कियों के बलात्कार और हत्या पर ये कतई चिंता करते नहीं दिखते।
RAJEEV CHOUDHARY 

पता है ज़ैनब! हमारे देश के हमीरपुर ज़िले की 17 वर्षीय लड़की एक लड़की के पड़ोस में रहने वाले दो भाइयों ने पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसके ऊपर केरोसीन डालकर उसे जला दिया। हरियाणा के जींद ज़िले के बूढ़ाखेड़ा गांव की एक लड़की के साथ गैंगरेप कर उसकी हत्या कर दी गई। पानीपत में घर से कूड़ा डालने गई एक एक 11 साल की किशोरी को अगवा कर हत्या करने के बाद उसका गैंगरेप किया गया। एक सिंगर की हत्या हुई और इसके बाद भी बलात्कार की खबरें जारी हैं।
ज़ैनब! कभी हमारे यहां भी रेप की खबर को अखबार की सुर्खियों में रखा जाता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं इन ख़बरों को पांचवे छठे पेज पर भी कोने में जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। ज़ैनब तुम्हारा देश हो या हमारा, यहां अब इंसानियत और बचपने का मोल नहीं रहा, लोग बस धर्म या मज़हब बचा रहे हैं।
ज़ैनब! सरहद के दोनों ओर महिलाओं के चिन्तक बैठे हैं, एक तरफ हलाला को मज़हब का हिस्सा बता रहे हैं और दूसरी तरफ रेप को अधार्मिक कृत्य। अब बताओं किस की और कौन सी बात माने? महिला सम्मान यहां शिलालेखों पर तो अंकित हैं पर ज़ैनब खबरें तो महिला अपमान और उनके खून से सनी हैं!
ज़ैनब! तुम्हारे देश में दो साल पहले इसी शहर में जिसकी मिट्टी में तुम दफ़न हो एक सेक्स स्कैंडल का पता चला था जिसमें हुसैन खान वाला गांव में सैकड़ों बच्चों का यौन शोषण किया जाता और फ़िर मोबाइल फोन से उनकी फिल्म बनाई जाती थी। हमारे यहां भी कुछ ऐसा ही है, कभी मदरसों से बच्चियों को बचाया जाता है तो कभी बाबाओं की गुफा से। ज़ैनब तुम्हें अफसोस होगा कि हम फिर भी धर्म और मज़हब के नाम पर इनको बराबर बचा रहे हैं।
ज़ैनब! तुम्हें पता है सरहद के इस पार हो या उस पार जितनी संख्या में लोग युद्धों में मारे जाते हैं, उससे अधिक तो इन दोनों देशों में महिलाएं और बच्चियां रेप, प्रेम और इज्जत के नाम मार दी जाती हैं। फिर भी दोनों तरफ के लोग महिलाओं के सम्मान की गौरव गाथा का नाद करते नहीं थकते।
उम्मीद है ज़ैनब तुम खुदा के घर में महफूज़ रहोगी, यहां इंसान की दुनिया में तो तुम्हारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रही। अबकी बार जब वापिस आओ तो एक सवाल उस ऊपर वाले से ज़रूर पूछना कि मैं इंसानों की उस दुनिया में किसलिए जाऊं?
राजीव चौधरी

ब्रेकिंग न्यूज़ के बैनर में आम आदमी की खबर कहां है?

जब दिल्ली में संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आधी रात को जूतम पैजार हो रहे हों, बिहार में एक पूर्व स्वास्थ मंत्री अपने घर वर्तमान मुख्यमंत्री पर भूत प्रेत भेजने का आरोप जड़ता हो, जब उत्तर प्रदेश में एक विधायक धर्म के आधार पर अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने का ज्ञान झाड़ रहा हो, ठीक उस समय बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िले में एक अनियंत्रित कार की चपेट में आने से 9 बच्चों की मौत पर भला कौन दुःख मना रहा होगा?
RAJEEV CHOUDHARY 
ये सब उस भारतीय को सोचना पड़ेगा जिसका सुख दुःख आज मीडिया से लेकर उद्योगपति, नेता से लेकर अभिनेता, धर्म के नाम पर धर्मगुरु और जाति के नाम पर जातिवादी नेता चट कर गये।
देश में न जाने कितने न्यूज़ चैनल हैं जो पल-पल की खबर लोगों तक पहुंचाने का दावा कर रहे हैं। किसी के पास सबसे बड़ी खबर है तो किसी के पास सच्ची खबर है। लेकिन इसमें एक आम भारतीय की खबर कहां है? सजे हुए न्यूज़रूम हैं, मेकअप किये एंकर बैठे हैं और हर रोज वही वक्ता हैं वही प्रवक्ता हैं। भूकम्प के केंद्र बिंदु तक जाने वाले संवाददाता, जब आत्महत्या करते किसान और आधारकार्ड न होने पर भूख से मरने वाली बच्ची के घर तक न पहुंच पाए तो सोचिये ये न्यूज़ किसके लिए चल रही है?
सद्भावना, समरसता, समानता, लोकतंत्र की बात हर रोज़ होती है, पर 1150 करोड़ रूपये का गबन कर सरकार और बैंक को आंख दिखाने वाला तथा केरल में थोड़ा सा खाना चुराने के आरोप में एक आदिवासी युवक की पीट-पीटकर हुई हत्या और लाचारी में जिस्म तक बेचने वाली किसी गरीब के बीच कैसी समानता, कैसा सद्भाव?
पूंजीवादी समाज में मुनाफे का पहिया खूब घूम रहा है, किसान से 2 रूपये किलो का आलू खरीदकर चिप्स बनाकर 900 रूपये किलो बेचने वाले, चटकारे लेकर खाने वाले, किसानों के लिए योजना बना रहे हैं भला किस मुंह से मेहनत और पूंजीवाद के बीच समानता का बेसुरा राग अलापा जा रहा है?
न जाने कितने दिन बीत गये देश के किसी गरीब नागरिक की ज़रूरतों की खबर न्यूज़ चैनल पर देखे हुए, बस हर रोज़ कुछ गिने-चुने चेहरों पर ही कैमरे घूमते हैं। स्टूडियों में शाम को दंगल होता है, कहीं ताल ठुकती है, कोई कह रहा है हम तो पूछेंगे और किसी को प्राइम टाइम में सरकार को कोसते हुए देखना हर रोज़ का किस्सा है।
चेहरे वही हैं, वही अभिनेता है, वही नेता है कोई चुनाव जीत गया कोई हार गया। हर रोज़ खबरों में बने रहने वाले इन्हीं निर्धारित चेहरों को देखते हैं। ज़्यादा दुखी होने और खुश होने की बात नहीं बस सोचना इसमें आम आदमी और उसकी ज़रूरते कहां है?
पत्रकारिता के बारे में आडवाणी जी ने कभी कहा था कि इनसे झुकने को कहा गया, ये तो रेंगने लगे, अब तो समय बीत गया लेकिन अब भी दरबारों में चारण की तरह विरद बखान हो रहा है। किसी ने सही कहा है कि यह पत्रकारिता का भक्तिकाल है- लगता है कि पत्रकारों के पास कलम की जगह घंटी आ गई है जिसे वो हर समय बजाते रहते हैं और अपने इष्टदेव की आरती उतारते रहते हैं।
समाजवाद लाने वाले परिवार को ढो रहे हैं, बहुजन हिताय वाले अपने हित तलाश रहे है, रामराज की बात करने वाले उल्टा अपनी पार्टी के दशरथों को वनवास या मार्गदर्शन मण्डली में भेजकर राम की बात कर रहे हैं, जिसको इस बात पर आपत्ति या सवाल है वो देश का दुश्मन है या फिर उसे राजनीति की समझ नहीं है।
ये ही गंभीर और सोचनीय बात है कि आज के भारत में भी एक दलित व्यक्ति को अपनी बारात निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ रही है। दलितों के घर खाना-खाने सामाजिक समरसता की बात करने वाले इस मुद्दे से बचकर कुछ तो राष्ट्र रक्षा यज्ञ के लिए मिट्टी ढो रहे हैं।बचे-खुचे नेता अपने जनेऊ दिखा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि भेदभाव पहले भी था और अब भी है। अगर इस देश के बड़े नेता देश निर्माण की बात कर रहे हैं तो देश का निर्माण सिर्फ सड़कें और अस्पताल बनाने से नहीं होता, बल्कि समाज बनाने से होता है। सभी नागरिकों को बराबरी का हक मिलेगा तब ही देश बनेगा। भले ही भारत का संविधान अपनी प्रस्तावना में ही समता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित समाज के निर्माण की बात करता है, लेकिन ये हो नहीं पा रहा है। जिन्हें इस बात पर दंगल और ताल ठोकनी चाहिए वह अपने राजनितिक इष्टदेवों के साथ सेल्फी ले रहे हैं।


कथित अछूत लोग धर्म के लिए बलिदान करे तो वाह-वाह पर यदि वह अपनी खुशी के लिए घोड़ी चढ़ जाएं तो ये बर्दाश्त नहीं किया जा रहा है। उसे डांट डपटकर उसकी औकात याद दिलाई जा रही है। ध्यान रहे ये खबरें इतनी छोटी होती है कि न्यूज़ चैनल पर विज्ञापन के वक्त जब लोग चैनल बदल लेते है तब नीचे पतली पट्टी पर चलती दिखती है। मतलब देश का आम नागरिक आज हिंसा, दंगे और राजनितिक रैलियों का सिर्फ चेहरा बनकर रह गया है।....राजीव चौधरी