Friday, 26 February 2016

जीसस ईश्वर का बेटा नहीं था!!



        
कभी चरमपंथियों की आँख की किरकिरी रही अपनी बेबाक शेली के लिए मशहूर बंगलादेशी  मूल की लेखिका तसलीमा ने एक बार फिर एक नई बहस को जन्म दे दिया है| इस बार उन्होंने ईसाईयों के भगवान जीसस पर सवाल उठाया है| उन्होंने जीसस के कुंवारी माँ से पैदा होने वाले चमत्कारिक कथा पर कहा है कि ना जीसस की माँ कुंवारी थी और ना ही जीसस ईश्वर का बेटा था| मामला उस वक्त उछला जब जैकब मैथ्यू नाम के एक श ख्स ने तसलीमा से पूछा क्या क्रिसमस मनाने में कुछ गलत है? इस सवाल का जबाब देते हुए तसलीमा ने कहा- हाँ मैं झूठे जश्न नहीं मनाती जीसस ईश्वर का बेटा नहीं था|
दरअसल तसलीमा मनुर्भव (मानवताद्) में विश्वास करती है उन्होंने कई मौको पर कहा है कि अंधश्रद्धा  में कोई रूचि नहीं है। यहाँ एक बात अपनी जगह अपना विश्वास बनाती है हमारे शास्त्रों के अनुसार हम सब ईश्वर की संताने है। किन्तु इसका यह कतई मतलब नहीं हैं कि कोई इसे चमत्कारिक रूप से रखकर स्वंय को ईश्वर की संतान कहकर खुद को ईश्वर का बेटा बताकर अंधविष्वास को बढावा दे! बाइबिल के अनुसार ईश्वर ने 6  दिनों में सर्ष्टि का निर्माण किया और सातवें दिन आराम किया। कोई इस बात को 1  प्रतिशत मान भी ले किन्तु यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या वो आजतक आराम ही कर रहा है क्योंकि इसके आगे का काम बाइबिल में नहीं लिखा। जिसने 6  दिन में ब्रह्मांड की रचना की तो इसके बाद उसने क्या किया? बाइबिल के अनुसार ईसा की माता मरियम गलीलिया प्रांत के नाजरेथ गाँव की रहने वाली थीं। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ नामक बढ़ई से हुई थी। विवाह के पहले ही वह कुँवारी रहते हुए ही ईश्वरीय प्रभाव से गर्भवती हो गईं। ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ ने उन्हें पत्नी स्वरूप ग्रहण किया। इस प्रकार जनता ईसा की अलौकिक उत्पत्ति से अनभिज्ञ रही।
 संत ईसा की जीवनी (The Life of Saint Issa) है .पुस्तक में लिखा है ईसा अपना शहर  गलील छोडकर एक काफिले के साथ सिंध होते हुए स्वर्ग यानी कश्मीरगए,धर्म  का ज्ञान प्राप्त  किया और यहा संस्कृत और पाली भाषा भी सीखी यही नही ईसा मसीह ने संस्कृत में अपना  नाम ईसा रख लिया था जो यजुर्वेद  के चालीसवें अध्याय के पहले  मंत्र ईशावास्यमितयस्य से   लिया  गया  है नोतोविच ने अपनी  किताब  में ईसा  के बारे में जो महत्त्वपूर्ण जानकारी  दी  है  उसके कुछ अंश दिए  जा रहे  हैं 

 भारत के पंडितों ने उनका आदर से स्वागत किया, वेदों की शिक्षा देने के साथ संस्कृत भी सिखायी पंडितों ने बताया कि वैदिक ज्ञान से सभी दुर्गुणों को दूर करके आत्मशुद्धि कैसे हो सकती है फिर ईसा राजग्रह होते हुए बनारस चले गए और वहीँ पर छह साल रह कर ज्ञान  प्राप्त करते रहे और जब  ईसा मसीह वैदिक धर्म का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे तो उनकी  आयु  29 साल हो गयी थी इसलिए वह यह ज्ञान अपने लोगों तक देने के लिए वापिस येरुशलम लौट    गए जहाँ कुछ ही महीनों के बाद यहूदियों ने उनपर झूठे आरोप लगा लगा कर क्रूस पर चढवा    दिया  था  क्योंकि ईसा मनुष्य को  ईश्वर का पुत्र कहते थे इसके बाद ईसाईयों के भगवान जीसस का पुनर्जन्म होता है। परंतु प्रश्न यह है कि इस पुनर्जन्मत के बाद दोबारा वे कहां गायब हो गये। ईसाइयत इसके बारे में बिलकुल मौन है। कि इसके बाद वे कहां चले गए और उनकी स्वायभाविक मृत्यु कब हुई। यह प्रश्न आज भी दफ़न है क्योकि जीसस को यदि भगवान बनाना था तो उसे मरना ही होगा। नहीं तो ईसाइयत ही मर जाती। क्यों कि समस्तह ईसाइयत उनके पुनर्जन्म पर निर्भर करती है। जीसस पुन जीवित होते है और यही चमत्काकर बन जाता है। यही सोचकर यहूदियों ने सीधे साधे ईसा को भगवान बना दिया लेखक राजीव चौधरी
  

जाट आन्दोलन, हिंसा का सच!!



    
मरहम लगानी है तो घाव पर लगाओ मरीज के बिस्तर पर नहीं! सर्वविदित है लगातार पैदा हो रहे नेता, शांतिपूर्ण आंदोलन की ताकत बांटकर हमेशा से अपना राजनैतिक कद बढ़ाते आये है। पर्दे के पीछे से चल रहीं चाले आंदोलन की रीढ़ पर सतत वार कर रही हैं उसे जानबूझकर हिंसक बनाया जा रहा है। हरियाणा की सड़के जाम है जाट आरक्षण की मांग को लेकर हंगामा बढ़ता जा रहा है। दिल्ली-रोहतक  बाइपास के पास हालात काबू करने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी। इसमें 1 की मौत हो गई जबकि 9 लोग घायल हो गए। पुलिस की गाड़ियों में तोड़फोड़ की भी खबर है।सीएम खट्टर के लिए यह सब बहुत चुनौती भरा समय है| जाट प्रदर्शनकारियों ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए आरक्षण बढ़ाने से जुड़ी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की पेशकश खारिज कर दी है। प्रदर्शनकारी इबीसी श्रेणी के तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की मांग पर अड़े हैं। कल सुबह ही इसकी रूप रेखा उस समय तय हो गयी थी जब हरियाणा के नेता प्रतिपक्ष अभय सिंह चौटाला ने जाट आरक्षण पर सरकार की जमकर आलोचना की तो कांग्रेस पर भी शब्दबाण छोड़े। चौटाला ने कहा कि जाटों को आरक्षण दिलाने के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी दी जाएगी।

हरियाणा की सड़कों पर जो कुछ आज हो रहा है उसकी रुपरेखा 26 अक्टूबर से ही तैयार होने लगी थी| जब सीएम खट्टर ने शपथ ली थी मैंने उस दिन भी कहा था हरियाणा में मोदी द्वारा खट्टर का सीएम बनाया जाना एक भूल है इससे आरएसएस को तो खुश किया जा सकता है किन्तु वहां की जाट राजनीति इसे हरगिज स्वीकार नहीं करेगी और वो ही हुआ हुक्के से शुरू हुई राजनीति आज सड़कों पर आकर चिता में बदल गयी| किन्तु जो भी हो इस मामले की असली तह तक जाना होगा| मामला केवल आरक्षण का नहीं है मामला विचारधारा का भी है सब जानते है उत्तर भारत में आरएसएस यानि की दक्षिणपंथी विचार धारा और वामपंथी कभी पनप नहीं पाए कारण हरियाणा, पश्चिम उत्तरप्रदेश, राजस्थान दिल्ली और पंजाब आर्य समाज का गढ़ रहा यह लोग कभी भी आरएसएस पर भरोसा नहीं करते क्योकि यह लोग इस विचाधारा को सामन्तवादी, पूंजीवादी विचारधारा मानते है, और आर्य समाज को वैदिक राष्ट्रवादी विचारधारा मानते हालाँकि आर्य समाज गैर राजनैतिक दल है जिसका राजनीति में हस्तक्षेप न के बराबर है किन्तु फिर भी इनकी स्वामी दयानंद के प्रति गहरी आस्था है| जो संघ को नागवार गुजरती है|

इस आन्दोलन का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो अभी कहा नहीं जा सकता किन्तु सच यह है लोकसभा चुनाव में उसके बाद हरियाणा विधानसभा चुनाव में हारे जाट नेताओं के लिए यह आन्दोलन किसी संजीवनी से कम नहीं है| जो उनके लिए नवजीवन से कम नही होगा आन्दोलन जितना मुखर होगा सत्ता का जाम पीने वाले जाट नेताओं के लिए उतना ही नशीला होगा| अब यह हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार के ऊपर निर्भर करेगा वो इसे शक्ति से कुचलना चाहेगी या राजनैतिक सोच से सुलझाना चाहेगी| इस आंदोलन का एक पहलू है, कि पूर्ण आस्था से जुड़ा इसका कोई असली नेतृत्व न होना। जाट आरक्षण की मांग को लेकर ढेरों नेता मैदान में हैं। संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में ढेरों जाट संगठन उग आए हैं। दरअसल जाट आरक्षण आंदोलन की बासी-सी हो चली कढ़ी में एक बार फिर उबाल लाने की कोशिश की जा रही है। जाट आन्दोलन से जुड़े नेताओं ने कभी चाहा ही नही की आरक्षण मिले, इन्होनें तो बस इस भोली-भाली कौम को बहकाकर अपना उल्लू सीधा किया| हमेशा जाट आरक्षण की खाद से अपनी राजनीति की फसल को उगाया इसमें कोई शक नहीं कि जाट एक जुझारू कौम है। देश के लिए उनकी सेवाएं, बलिदान और शौर्य गाथाओं का जब-जब  जिकर होता है लेकिन जब बात हक-हिस्से की आती है, तो इन धरती पुत्रों को हाशिये पर डाल दिया जाता है। आजादी के बाद से लगातार ऐसा हो रहा है। सरकार को इस सिरे पर पुनर्विचार करना होगा| आरक्षण का आधार कुछ भी हो ये बात इतने मायने नहीं रखती मायने रखता है इस तरह के आन्दोलन कई बार हिंसक क्यों हो जाते है जो कई परिवारों को दुःख दर्द दे जाते है| इस मामले में विपक्ष और सत्ता पक्ष को राजनीति की बजाय ऐसे मुद्दों को सुलझाना चाहिए| आखिर मांग की आवाज़ क्यों उठी, मांग के पीछे राजनैतिक मंशा तो नहीं है? राजनीति में विपक्ष हमेशा हिंसा का पक्षधर रहा कारण हिंसा के गर्भ से अधिकतर लाशो का जन्म होता है और लाशे नेताओं का प्रिय राजनैतिक भोज रहा है लेखक राजीव चौधरी 
     

अब देते रहो सफाई?



कुछ प्रश्न है जो कई दिन से मन में चींख रहे, हरियाणा में जाट आन्दोलन हुआ कुछ लोगों ने इसे गुस्सा कहा तो कुछ ने इसे अपनी जायज मांग बताया| जो भी हो पर यह जाट समुदाय के लिए बदनामी का एक ठप्पा भी है| किसके लिए किया यह सब कुछ आरक्षण के लिए? नहीं हुक्का हाथ में थामकर चोराहो पर सुनी बातो से गुस्सा किया, सत्ता से बेदखल नेताओं की बात पर भरोसा किया और अपना सब कुछ फूंक लिया, 28 घर में मातम मनवा दिया अपना मान, अभिमान, स्वाभिमान, अपना गौरव, धुल में मिला लिया बलात्कार का झूठा आरोप और लगवा लिया किसके लिए आरक्षण के लिए? पर एक बात बताओ< ताऊ देवीलाल को आरक्षण मिला था या चौधरी चरणसिंह को आरक्षण मिला था? जो वे दो बार मुख्यमंत्री बने, विदेशमंत्री बने, वितमंत्री और प्रधानमंत्री बने! नहीं ना बस हिम्मत थी हौसला था लोकतांत्रिक प्रकिया से सब कुछ हासिल किया| सर छोटूराम जी को सर का ख़िताब आरक्षण से मिला? नहीं ना, बस इतनी खूबी थी की अंग्रेजो को ख़िताब देना पड़ा| दारासिंह जी को आरक्षण मिलता था क्या कुश्ती में? कि इसके साथ एससी एसटी लड़ाओ नहीं ना, पर शरीर में जान थी की किंग कोंग को भी दे मारा था|
25 साल की सानिया नेहवाल उसे आरक्षण मिल रहा है? नहीं पर पूरा विश्व जानता है उस गरीब परिवार की जाट बेटी को! राष्ट्रमंडल खेलों में 61 मैडल जीते थे जिनमे 36 जाटों ने जीते थे क्या वो आरक्षण में जीते थे? नही ना माँ का दूध पीया था जाट पूतों ने जीत लिए? आरक्षण का पाउडर का ना पिया था| 70% अर्जुन अवार्ड हमारे पास है बिना आरक्षण के! पहलवान सुशील को आरक्षण ना मिला पर सामने वाले को उठा के दे मारा जीत लिया ओलम्पिक का पदक| थल सेना अध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग को आरक्षण ना मिला पर 13 लाख फौज की कमान संभाल रखी नौसेना प्रमुख एडमिरल आरके धवन को कौन सा आरक्षण मिला? कितने नाम लू सहवाग, युवराज शूटर सीमा या दादी प्रकाशो कबड्डी में 105 टॉप खिलाडियों में 75 जाट बताओ कौन सा आरक्षण मिल रहा है, मुक्केबाजी में बिजेंद्र ने लोहा लिया, हम कहाँ नी है अपनी लगन मेहनत से सब जगह है| कमजोर तबका ताकतवर से जलन करता है करने दो कुछ होगा ना हमारे अन्दर जो कोई जलन करता है| मेरे भाइयों राजा हिम्मत और लगन मेहनत से बनता है आरक्षण से तो बस चपरासी बनते है|  भारत की सबसे संघगटित कौम हमारी थी राजनीति ने बिखरा दी अब भी लगे पड़े अपनी कौम के फायदे के लिए नहीं बस अपने राजनैतिक आकाओ के लिए इसे वोट मत दो उसे वोट मत दो यू म्हारा नेता है फलाना म्हारा नेता है| पर हमे क्या मिले? कुछ नहीं बस सामाजिक भेदभाव और कुछ नहीं! देश अपना है इसकी सीमा पर हम बैठे ताकतवर है जो हमे बागडोर मिल रही है दुश्मन नाम से डरे| पर हमने के करा 9 दिन में सारी इज्ज़त मिट्टी में मिला ली| अब चाहे आरक्षण मिल जाओं या ना मिलो पर याद रखना हमने इन 9 दिनों में बहुत कुछ खो दिया| अब और आग ना लगाओ बस अपने बच्चों को काबिल बनाओ नहीं तो आरक्षण के चक्कर में वो पढना लिखना खेलना कूदना छोड़ देंगे उन की तरह हो जागें जिन्हें 50 साल से आरक्षण मिल रहा है पर उनके गात की खुशबू नी बदली ...राम राम  

Friday, 12 February 2016

पुराणों का सार!!



पुराण में क्या सच है क्या झूठ, यह प्रश्न सिर्फ स्वीकारने और नकारने के लिए नहीं विषय आत्ममंथन का भी है और अब में कहता इनकी समीक्षा जरूरी है खेर एक कहानी सुना रहा हूँ कहानी २००० वर्ष पुरानी है” हजारों वर्ष पहले उज्जयिनी नगरी में एक बगीचा था, जिसमे इलाके के नामी झूठे,धूर्त रोज बैठकर गप्पे लड़ाते थे| उनके मुख्य कथाकार चार थे, शश,एलाषाढ, मुलदेव और महा धुर्तनी खंडपाणा| एक बार जब बारिश के लगातार सात दिन तक छाए रहे तो सभी को कसकर भूख लगी थी| सवाल उठा खाने की व्यवस्था कौन करे? मूलदेव ने कहा कि एक-एक कर सभी धूर्त समागम में अपने साथ घटी घटना का अविश्वसनीय लगने वाला किस्सा सुनाएंगे चूँकि पुराणों की कथाओं की प्रमाणिकता सर्वमान्य है इसलिए अगर उनके हवाले से कही कथा सही साबित कर दी गयी तो अविश्वासी जन चारों को खाना खिलाएंगे| हाँ, यदि कथा इन महाकाव्यों की कसौटी पर सच साबित नहीं हुई तो कथावाचक खाने का भुगतान करेंगे|
पहली कथा कही एलाषाढ ने- “एक बार में गाये चराने जा रहा था तो सामने डाकू आते दिखे| मैंने तुरंत अपना कंबल उतारकर गायों को उसमे लपेटा और गठरी पीठ पर रख गाँव वापस आ गया| वही डाकू गाँव में आ पहुंचे| तुरंत में, मेरी गायें, ग्रामवासी सब एक ककड़ी में घुस गये जो एक बकरी ने खा ली| बकरी को एक अजगर निगल गया और उस अजगर को एक बगुला खाकर एक पेड़ पर जा बैठा, जहाँ से उसकी एक टांग नीचे लटकती रही| पेड़ तले एक राजा उसका हाथी और सेना विश्राम कर रहे थे| राजा का हाथी बगुले की टांग में उलझ गया बगुला उसे लेकर उड़ने लगा तो राजा ने शोर मचाया तीरंदाज़ आये बगुले को मार गिराया| जब बगुले का पेट फटा तो उसमे से हम सब बाहर निकले बाकि लोग तो गाँव चले गए मै गायें बाँध कर इधर चला आया| अब आप लोग कहे कहानी सच्ची है?” बाकि धूर्तो ने कहा एकदम सच्ची, हमारे पुराण बताते है कि प्रकृति के आरम्भ में बस समुन्द्र था जिसमें तैरते एक सुनहरे अंडे के भीतर यह सारी दुनिया चराचर जीव जंतु, पेड़पहाड़ समाये हुए थे तो फिर कंबल और ककड़ी में तुम सब समा गये तो अचरज कैसा? बगुले के पेट में अजगर उसके पेट में बकरी उसके अन्दर ककड़ी और तुम सब का होना पुराणों के अनुसार सही है| उनका कहना है कि यह सारी चराचर स्रष्टि विष्णु के भीतर विष्णु कृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ में और देवकी कारावास में नन्ही सी खाट पर समाई हुई है|
अब शश ने कहानी शुरू की- “मै अपने तिल की खेती को देखने रात को खेत पर गया तिल के पोधे इतने बड़े हो गये थे कि मै उनको कुल्हाड़ी से काटने लगा| तभी एक हाथी आया और में तिल के पेड़ पर चढ़ गया| हाथी पेड़ की परिक्रमा करते हुए पेड़ को झकझोरता रहा| जमीन तिलों से ढक गयी हाथी के पैरो से कुचले तिलों से कुछ समय बाद तेल की ऐसी वेगवान नदी निकली की हाथी फंसकर मर गया में नीचे उतरा, उसकी खाल उतारी और मशक बनाकर उसमे तेल भर लिया फिर मैने कोई दस घड़े तेल पिया और गाँव आकर मशक को पेड़ पर टांग दिया कुछ देर बाद मैंने अपने पुत्र को मशक लाने भेजा जब उसे ना दिखी तो वो समूचा पेड़ ही फाड़ उखाड़ लाया फिर में घुमने निकला और यहाँ आ पहुंचा| कहिये सच है या नही?” एक दम सत्य है सभी धूर्तो ने एक स्वर में कहा| महाभारत रामायण और अनेक श्रुतियों में भी उल्लेख है कि हाथियों के मद बिन्दुओं से वनोवन भा ले जाने वाली नदियाँ निकल सकती है जड़ी लाने के आदेश पर रामायण में हनुमान भी तुम्हारे पेड़ उखाड़ बेटे की तरह पर्वत उखाड़ लाये थे|
इसके बाद मुलदेव ने अपना किस्सा सुनाया- “एक बार मैने गंगा को शिरोधार्य करने की सोची| छत्र कमंडल लेकर अपने स्वामी के घर जाने लगा तो एक हाथी पीछा करने लगा| में कमंडल की टोंटी से उसके अन्दर प्रवेश कर गया पर उसकी के अन्दर हाथी भी घुस आया 6 माह तक मुझे परेशान करता रहा अंतत में फिर टोंटी से निकल भागा हाथी की दुम टोंटी में उलझी रह गयी फिर में गंगा के अथाह जल को चीरता पार हुआ 6 माह तक बिना खाये पिए उसके किनारे रहा फिर यहाँ आ गया| कहिये सच कि झूठ?” सौ फीसदी सच जब शास्त्र प्रमाण है कि किस तरह ब्रह्मा के नाना अंगो में समाए बैठे सारी जातियों के लोग बाहर निकले थे सो आप और हाथी एक कमंडल में समायें होंगे इसमें कैसा शक? विष्णु जगत के कर्ता हुए ब्रह्मा उनके उदर से निकले और आज तक तप कर रहे है पर उनके कमल की नाल विष्णु की नाभि में अटकी रही बेचारा हाथी भी पूंछ से अटक गया होगा और तुम्हारा गंगा को पर करना हनुमान के समुंद्र को पार करने जैसा है|
अब खंडपाणा की बारी आई- “मै राजा के धोबी की बेटी के साथ अपने एक हजार नौकरों और पिता सहित एक भैसगाडी में धुलाई लेकर गंगा तट पर गयी कपडे सुखाते हुए भारी आंधी आई मेरे पिता, कपडे, नौकर सब गायब हो गये राजकोप के डर से मै गिरगिट बन जंगल में छिप गयी कुछ समय बाद मुनादी सुनी की राजा ने सबको माफ़ कर दिया बाहर आई तो पिता मिले गाड़ी तो नहीं मिली पर भेंसे की पूंछ और उसमे लिपटी मीलो लम्बी रस्सी मिल गयी कहो सच कि झूठ?” सच है सभी धूर्त हँसे जब ब्रह्मा विष्णु को शिवलिंग की गहराई ना मिली तो तब तुमको अंधड़ में अपने साथी कैसे मिलते रही बात पूछ की तो हनुमान की पूछ याद करो| रुको अभी कथा बाकि है मित्रो खंडपाणा बोली| मेरे अनुसार तुम सब मेरे खोये नौकर हो तुम्हारे वस्त्र वही राजसी वस्त्र है अब कहो कथा सच है कि झूठ? अब यदि कथा सच है तो मेरे नौकर बनो वरना जाकर खाना लाओ| सभी धूर्त लाजवाब हो गए|  writer rajeev choudhary