Tuesday, 19 January 2016

छात्र नहीं, दलित मरा है!!



एक बार फिर हैदराबाद को दादरी बनाया जा रहा है| अरविन्द केजरीवाल जी ने इस आत्महत्या को लोकतंत्र की हत्या बता डाला और इस आत्महत्या का ठीकरा भी मोदी जी के सर फोड़ने में समय न लगाते हुए देश से माफ़ी मांगने को कहा है| किन्तु इस मामले में मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि देश से तो ना सही पर मोदी जी को केजरीवाल जी से जरुर माफ़ी मांग लेनी चाहिए दूसरा वैसे देखा जाये तो देश में लोकतंत्र भी रोज मरने लगा है रोज इसकी हत्या हो जाती है किन्तु लोकतंत्र फिर जिन्दा हो जाता है क्या लोकतंत्र को भीष्म पितामह की तरह इच्छा मृत्यु का वरदान है? या फिर लोकतंत्र अमर है? या फिर बेशर्म?
दरअसल हुआ ये है कि हैदराबाद में छात्र नहीं मरा, ना लोकतंत्र मरा, यदि कोई मर गया गया या किसी ने आत्महत्या की वो एक दलित था| तभी तो राहुल गाँधी व् अन्य लोग हेदराबाद रवाना हो गये वरना छात्र तो इस देश में रोजाना सेकड़ो की तादात में मरते है| इन लोगों को छात्र की मौत से क्या लेना देना बस इन्हें तो लोगों को जाति-पाती में बाँटकर वोट चाहिए!! हरियाणा का सुनपेड़ हादसा सबको याद होगा तब भी यहीं हाल था ये ही मीडिया ये ही नेता तब भी लोकतंत्र की लाश गिरी थी फिर जब उसके सच की तेहरवी हुई ना वहां मीडिया गयी ना नेता आखिर क्यों? इस देश में ये मीडिया ये नेता हर एक मामले को जाति धर्म के ही चश्मे से देखते है? क्यों यहाँ कोई नागरिक नहीं मरता हर कोई मरने वाला दलित, मुस्लिम हिन्दू क्यों होता है?
मुझे नहीं लगता यह देश अतुल्य भारत या इसमें अब गर्व करने लायक कुछ बचा है,यहाँ तो बेशर्मी का राग है, जो जितने आरोप लगा दे जो जितने झूट बोल सकता है वो इतना ही बड़ा नेता माना जाता है| अभी हो सकता है? अवार्ड लौटाने वाले फिर से कूद पड़े क्योंकि पंजाब चुनाव नजदीक है और भी मीडिया इस मामले पर रोजाना बहस करा सकती है!
अरविन्द केजरीवाल जी ने अपने ट्वीट में इसे हत्या है हत्या है लोकतंत्र की हत्या है बताया कल परसों जब किसी महिला ने केजरी पर स्याही फेंकी तब भी इसे आम आदमी पार्टी ने लोकतंत्र की हत्या कहा था यदि लोकतंत्र की हत्या परसों हो गयी थी तो फिर आज कैसे लोकतंत्र मर सकता है? या फिर इस देश का लोकतंत्र भी राजनेताओं की बपोती हो गया जब चाहो तब मार डालो और जब चुनाव हो अपनी जीत को लोकतंत्र की खुसबू बता डाले क्या तब इस लोकतंत्र की लाश से इन्हें बदबू नही आती? चुनाव जीतकर गले में माला लटका कर सम्मान भी इन्हीं नेताओं को चाहिए और जब कोई मतदाता थप्पड़ मार दे या स्याही फेंक दे तो इनका अपमान हो जाता है| जब सम्मान इन्हें चाहिए तो अपमान से क्यों डरते है नेता शासक नही सेवक होता है आखिर क्यों इस देश के लोकतंत्र का तमाशा बनाया जाता है?  rराजीव चौधरी

किसान नेता नहीं खुद का नेता है



राष्ट्रीय लोक दल अजीत हर कोई इस नाम से वाकिफ है, किसान नेता, हमारा नेता, जाट नेता और न जाने कितने नामों से अलंकृत है सुशोभित है| 12 फरवरी, 1939 को मेरठ, उत्तर प्रदेश में जन्मे अजीत सिंह राजनीति के सबसे बड़े दल बदलू भी कहे जाते है| हालाँकि कुछ लोग कहते है कि ये नाम उन्हें उनके विरोधियों ने दिया पर आश्चर्य इस बात का है कि राजनीति के सारे बगीचों के सारे फल खाने वाले अजीत सिंह का विरोधी कौन है? आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं. सत्रह वर्ष अमरीका में काम करने के बाद चौधरी अजीत सिंह वर्ष 1980 में अपने पिता द्वारा स्थापित लोक दल को एक बार फिर सक्रिय करने के उद्देश्य से भारत लौटे थे. इनके परिवार में पत्नी राधिका सिंह जो अब इस दुनिया में नहीं है  और दो बच्चे हैं. जो अब बच्चे ना होकर बड़े हो गये है|
वर्ष 1986 में राज्य सभा सदस्य के तौर पर संसद में प्रवेश करने वाले चौधरी अजीत सिंह सात बार लोकसभा सदस्य भी रह चुके हैं| 1987 में अजीत सिंह ने लोक दल (अजीत) नाम से लोक दल के अलग गुट का निर्माण किया. एक वर्ष बाद ही लोक दल (अजीत) का जनता पार्टी के साथ विलय कर दिया गया| चौधरी अजीत सिंह इस नव निर्मित दल के अध्यक्ष बनाए गए| जब जनता पार्टी, लोक दल और जन मोर्चा के विलय के साथ जनता दल का निर्माण किया गया तब चौधरी अजीत सिंह ही इसके महासचिव चुने गए. विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में चौधरी अजीत सिंह 1989-90 तक केन्द्रीय उद्योग मंत्री रहे. नब्बे के दशक में अजीत सिंह कांग्रेस के सदस्य बन गए| पी.वी. नरसिंह राव के काल में वर्ष 1995-1996 तक वह खाद्य मंत्री भी रहे. 1996 में कांग्रेस के टिकट पर जीतने के बाद वह लोकसभा सदस्य बने. लेकिन एक वर्ष के भीतर ही उन्होंने लोकसभा और कांग्रेस से इस्तीफा देकर भारतीय किसान कामगार पार्टी का निर्माण किया. अगले उपचुनावों में वह इसी दल के प्रत्याशी के तौर पर बागपत निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीते| 1998 में हुई हार उनके राजनैतिक जीवन की पहली एक मात्र असफलता थी| 1999 में अजीत सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल का निर्माण किया. जुलाई 2001 के आम-चुनावों में इस दल का भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार का निर्माण किया था| अजीत सिंह को कैबिनेट मंत्री के तौर पर कृषि मंत्रालय का पदभार सौंपा गया. इसके बाद अजीत सिंह ने अपनी पार्टी को बीजेपी और बीएसपी के गठबंधन में शामिल कर लिया. लेकिन बीजेपी और बीएसपी के अलग होने से कुछ समय पहले ही अजीत सिंह ने अपनी पार्टी को बीएसपी से अलग कर लिया, जिसके कारण बीएसपी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. मुलायम सिंह यादव के सत्ता में आने के साथ अजीत सिंह ने 2007 तक उन्हें अपना समर्थन दिया| लेकिन जब उनका मन वहां लगा तो फिर 2009 के चुनावों में उन्होंने एनडीए के घटक के तौर पर चुनाव लड़ा और वह पंद्रहवीं लोकसभा में चुने गए. और इसके बाद एनडीए को ठेंगा दिखाते हुए कांगेस के साथ गठबंधन कर केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री बने| चौधरी अजीत सिंह हमेशा बागपत के विकास के सपने दिखा कर सत्ता सुख प्राप्त करते रहे भले ही लोग कहे कि अजीत सिंह ने किसानों के लिए बहुत काम किया पर सच यह है किसानों के लिए अगर किसी ने कुछ काम किया तो वो है कृषि वैज्ञानिक जिन्होंने फूलसे की जगह थ्रेशर दिया, रहट की जगह ट्यूबेल, समर्सिबल दिया| नये खाद बीज उपलब्ध कराए नई कृषि नीति दी यदि आज किसान के पास कुछ है तो वो उसकी मेहनत और कृषि वैज्ञानिको की बदोलत है| और इन सब के कारण इस किसान नेता के पास 300 करोड़ की सम्पत्ति है
राजीव चौधरी

Tuesday, 12 January 2016

यह हमारी पुरानी कायरता का परिचय है?



यह बात कोई मायने नहीं रखती की पठानकोट हमले में कौन से शरीफ का हाथ था नवाज़ शरीफ का था राहिल शरीफ का था? सब जानते है कि पाकिस्तान में दिखावे का लोकतंत्र है पाक प्रधानमंत्री का घर रायविंड पेलेस सिर्फ दावत का अड्डा है वरना पाकिस्तान सेना भारत के साथ संबधो को लेकर कभी भी एक प्रतिशत भी संजीदा नहीं रही है| उनके हाथ में सदा से ही खंजर रहा है और वो अपनी मनमर्जी कभी सीने में तो कभी पीठ में भोकते रहे है| पर अब हमारी परेशानी यह नहीं है हमारी असली परेशानी कुछ अलग है और उसे समझने के लिए इतिहास सबसे अच्छा साधन माना जाता है क्योंकि इतिहास से सीख मिलती है ताकि फिर ऐसी गलती फिर ना दोहराही जाये|
 जब सन १०२५ में महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण को आतुर था और पुरे भारत वर्ष में यह चर्चा का विषय बना की अब क्या होगा!! उस समय पाटन के राजकुमार भीमदेव सोलंकी ने सोमनाथ मंदिर के महंत गंगसर्वज से पूछा था क्या मंदिर सच में लुट जायेगा भगवन? तब गंग सर्वज्ञ ने कहा था- सुनो कुमार यदि गजनवी सिंधूं  का दरिया पार कर मुल्तान को हराकर पंजाब को रोंदकर राजस्थान के घुटने टिका कर गुजरात में तुम्हे पीसकर तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करके  मंदिर लूटकर ले जाता है तो इसमें गजनवी का शोर्य होगा और भारतवर्ष के राजाओं की कायरता होगी|
ठीक लगभग एक हजार वर्ष बाद आज भी हम वहीं खड़े है जहाँ एक हजार साल पहले थे पाकिस्तान की गलियों में पलने वाले छोकरे जो बड़े भाई का कुरता और छोटे भाई पजामा पहनकर मजहबी शिक्षा पाने जाते है जिन्हें ना खाने की अक्ल न पहनने की और वो लड़के भारत की सीमा को लांघकर प्रशासनिक अधिकारी की गाड़ी छीनकर एयरफोर्स के बेस में अन्दर घुसकर हमारे जवानों को मार जाते है तो इसमें कहीं ना कहीं लापरवाही हमारी है| चाहें वो सीमा की रखवाली कर रहे जवानों से होती हो या राज्य पुलिस बलों से होती हो! नागरिक करते हो या नेता| किन्तु इसमें हमें किसी को दोषी ठहराने के साथ-साथ खुद की लापरवाही भी स्वीकारनी होगी क्योंकि कुत्ता पागल है तो हमे अपनी रक्षा खुद करनी होगी| पाकिस्तान का जन्म भारतीय लोगों से नफरत कर हुआ था तो उससे किस आधार पर प्रेम की अपेक्षा कर सकते है| वो हमला करेगा कभी छिपकर तो कभी सामने आकर करेगा यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस तरह जबाब देते है|
शनिवार तडके हमले से लेकर अब तक मैने कई बार पाकिस्तान मीडिया को देखा उनके अन्दर हमले को लेकर कोई आत्मीयता नहीं दिख रही वो इसे भारत सरकार का स्वघोषित एजेंडा बता रहे है मीडिया ही क्यूँ वहां की सरकार भी हमले के 5 घंटे बाद अधिकारिक रूप से इस हमले की निंदा करती है तो इससे पता चलता है कि पाक सरकार शांति के पथ पर चलने को कितना संजीदा है| भारतीय विपक्षी दलों का सरकार पर हमला जायज है| जब आपको पता है कि नवाज़ शरीफ की पाकिस्तान के अन्दर एक दिखावटी भूमिका है| वहां पर राहिल शरीफ और कट्टरपंथी मौलाना सरकार चलाते है तो आपको जो भी बात करनी है उनसें करो| और अपनी सेना को रक्षात्मक उपकरणों से लेस करो| जिम्मेदार अधिकारीयों का तबादला सीमावर्ती इलाकों में करों वरना लापरवाही से तो इतिहास भरा पड़ा है| जय हिन्द
राजीव चौधरी

क्या मौन स्वीकृति का लक्षण है?



सिहांसन के मौन होने के कुछ भी कारण हो सकते है किन्तु शहीदों के घर से निकली मासूम बच्चों की किलकारी, एक शहीद की बहन का मूक दर्द उसकी आँखों से छलकता पानी एक पत्नि की वेदना में लिपटी सिसकियाँ और माँ बाप की ममता के बुझे चिराग जहाँ सब एक दुसरे को सात्वना देकर छुप करते है| उनके बहते आंसू पर हमारी कलम भला क्यों चुप रहे? पठानकोट हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भेड़िया के साथ कोई भेड़ लाख बार संधि करे किन्तु भेड़िया अपना स्वभाव नहीं बदलेगा| मालदा और पठानकोट दो घटना एक दिन में घटित हुई और दोनों में अल्लाह हु अकबर का नारा था एक घटना को मीडिया ने दबा दिया और दूसरी का खूब विश्लेषण हुआ और शुरू से अंत तक एक बात सामने आई कि घटना हमेशा की तरह पाक प्रायोजित थी|
पठानकोट हमला पाक प्रायोजित था किन्तु प्रश्न यह है कि मालदा पश्चिम बंगाल की घटना किसके द्वारा प्रायोजित थी क्या उसमे भी पाकिस्तान का हाथ था? आखिर किसके कहने पर दो से ढाई लाख लोग सड़क पर उतर आये? किसके कहने पर करोड़ों की सम्पत्ति को आग के हवाले कर दिया? आखिर इसका सूत्रधार कौन था? और सरकार इस मामले पर मौन क्यूँ है? कहीं यह मौन अगली घटना की स्वीकृति का लक्षण तो नहीं है?
कल भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान को पठानकोट हमले के सारे साक्ष्य सौप दिए और पाकिस्तान के तरफ से हमेशा की तरह कड़ी कारवाही आश्वासन दिया गया पर क्या इतने आश्वासन से काम चल जायेगा! साक्ष्य तो भारत सरकार ने ताज हमले के बाद भी सौपे थे क्या हुआ? 250 लोगों का हत्यारा हाफिज सईद अब भी पाकिस्तान में खुला घूम रहा है| कंधार विमान अपहरण कांड में छोड़ा गया आतंकी संगठन जैश ए मोह्हमद का सरगना अजहर मसूद आज भी पाकिस्तान में बैठ खुले आम भारत सरकार को चुनौती दे रहा है| उन पर पाकिस्तान ने कितनी कारवाही की है? हजार बार दाउद इब्राहीम के पाकिस्तान में होने के सबूत भारत ने पाकिस्तान को सौप दिए क्या कारवाही हुई? जो अब पाकिस्तान से कारवाही की आशा की जाये! 
जब कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच धनुष उठाकर अर्जुन ने योगिराज कृष्ण से कहा था हे माधव! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिये ताकि में युद्ध के अभिलाषी लोगों को भली प्रकार देख लूँ कि मुझे किन-किन लोगों से युद्ध करना है और भली प्रकार ध्रतराष्ट्र के पुत्रों का हित अनहित चाहने वालों को देख ना लूँ तब तक मेरे रथ को खड़ा रहने दिया जाये| ठीक वो हालात लिए आज हम इस देश में कलम लिए खड़े है ताकि इस देश का हित अनहित चाहने वालों की पहचान की जा सके| आज देश दो हमलावरों के बीच खड़ा है एक बाहरी आतंक और दूसरा आंतरिक आतंक और सरकारों को इन दोनों के बीच खड़ा होकर तय करना चाहिए कि पहले किस से निपटा जाये क्योंकि जब तक बाहरी आतंक को आंतरिक आतंक की मदद मिलती रहेगी आतंक समाप्त नहीं हो सकता और इस बात समझने के लिए इतिहास का एक वाक्य काफी है कि जयचंद ने गौरी का साथ न दिया होता तो भारत का सर्वनाश ना हुआ होता|
 केंद्र और राज्य सरकारों ने मालदा की घटना पर पर्दा डाल दिया या ये कहों मौन साध लिया| किन्तु कब तक? चलो मान लेते है कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष कमलेश ने विवादित बयान दिया था लेकिन भारतीय सविंधान के अनुसार उन पर गिरफ्तारी के तहत कारवाही हुई तो 96 करोड़ लोगों ने सविंधान का सम्मान किया और इस कारण अब वह जेल के अन्दर है किन्तु यह भीड़ कौन थी? जो उसके एक महीने बाद उनकी फांसी की मांग कर रही थी| घरों दुकानों को लूट रही थी थानों और गाड़ियों में आग रही थी|  और अब सरकार उनके खिलाफ कारवाही से क्यों बच रही है? जो मुस्लिम धर्मगुरु पठानकोट हमले पर पाकिस्तान की निंदा (मजम्मत) कर रहे है वो मालदा हिंसा पर मौन क्यूँ है कहीं यह मौन अगली हिंसा की स्वीकृति का लक्षण तो नहीं?
राजीव चौधरी

खाप का नया कदम भी देखो



खाप पंचायत हमेशा से मीडिया के निशाने पर रही है, यहाँ तक कि अब तो पुरे देश में कहीं भी किसी सार्वजनिक मंच पर या दस पांच लोगों के द्वारा लिया किसी भी बुरे से बुरे फैसले को मीडिया खाप से जोड़ देती है| न्यूज़ एंकर चिल्लाते है देखो बंगाल में खाप पंचायत के फैसले ने क्या किया! खाप को महिला विरोधी मानसिकता का बताया गया खाप को इस तरह परोसा गया कि लोग खाप के नाम से किसी भुत प्रेत से ज्यादा डरने लगे| फिल्म निर्माता निर्देशकों ने एक बाद एक कई फिल्म बना खाप को आतंकवादी संगठनों की तरह दिखाया जाता है|
जहाँ तक खाप का प्रश्न और जन्म है खाप पुरे देश में नहीं है| यह तो उत्तर भारत में पंजाब हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायत पहली बार महाराजा हर्षवर्धन के काल में 643 ईस्वी में अस्तित्व में आई। प्राचीन काल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले का व्यक्ति ही इस पंचायत का महामंत्री हुआ करता था। गुलामी के समय में भी सबसे बडी खाप पंचायत मुजफ्फरनगर की ही हुआ करती थी। सर्वखाप का उदय पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की खाप पंचायतों से मिलकर हुआ है। खाप पंचायतों ने देश में कई बडी पंचायतें की हैं और समाज तथा देश के हित में महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी किए तथा जेवर और पर्दा प्रथा को खत्म किए जाने जैसे सामाजिक हित के निर्णय भी लिए। युध्द के समय में भी खाप पंचायतों ने देशभक्ति की मिसाल कायम की है और प्राचीन काल में युध्द के दौरान राजाओं और बादशाहों की मदद की है। वैसे देखा जाए तो देश में परिवार की इज्जत के नाम पर कत्ल की पुरानी परम्परा रही है। जब इज्जत के नाम पर राम सीता को छोड़ देता है और आहिल्या को शापित होकर पत्थर बनना पड़ता है, द्रोपदी के अपमान पर 18 लाख सेना मर सकती है| जयचंद गोरी से मिल सकता है और महबूबा मुफ़्ती की इज्जत का वास्ता देकर आतंकवादी छोड़ें जा सकते है तो आज के अनभिज्ञ समाज पर इतना क्या चिल्लाना| हालाँकि इज्ज़त के नाम पर हत्या होती है और हरियाणा. पंजाब. राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इनमें सबसे आगे हैं।
आनर किलिंग के यादातर मामलों में लडके. लडकी का एक ही गोत्र.सगोत्र. में विवाह करना एक कारण रहा। अंतरजातीय प्रेम विवाह इस अपराध की दूसरी वजह रही। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक गोत्र में विवाह से विकृत संतान के जन्म लेने की आशंका रहती है| जिसे विज्ञान ने भी सिद्ध किया दूसरी बात 10 वीं 12 वीं कक्षा में पढने वाले बच्चे अडोस पडोस में प्यार करने लगते है जिसे ग्रामीण समाज में कुटुंब कुनबा माना जाता है यदि परिवार के लोग बच्चे को रोकते डांटते है और बच्चा योन अन्धता के कारण आत्महत्या कर लेता है तो मीडिया के द्वारा उसे तालिबानी फरमान आदि बताया जाता है| हालाँकि कुछ फैसले पंचायतो के गलत रहे है किन्तु उसे खाप से जोड़कर बताना गलत है उनमे अधिकतर ग्रामीण पारिवारिक फैसले होते है| किन्तु आज जब खाप कोई अच्छा काम करती है तो मीडिया गायब पाई जाती क्या अच्छे काम का प्रचार प्रसार करना बुरा काम है? . अपने सख्त फैसलों की वजह से उन्हें अब तक महिला विरोधी भी समझा जा रहा था. लेकिन महिलाओं से जुडे मामलों में कुछ अहम फैसले लेकर खाप पंचायत ने एक मिसाल कायम की है. दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या को लेकर पंचायत सजग हुई
कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम कसने के लिए खाप पंचायत ने एक समझदारी भरा फैसला किया है कि दो बेटियां हो जाने के बाद कोई संतान पैदा नहीं करेगा. और जो लोग ऐसा करेंगे उन्हें खाप सम्मानित करेगी.
दहेज प्रथा इसी दिशा में खाप ने दहेज प्रथा को मात देने की एक कोशिश की है. उन्होंने फैसला किया है कि शादी में लड़की वालों से दहेज के नाम पर सिर्फ 1 रुपया ही लिया जाएगा.
शादी का खर्च घटाया जायेगा- लड़की के मां-बाप पर शादी का बोझ कम पड़े इसके लिए शादियों के खर्च को कम करने का प्रयास किया गया. निर्णय लिया गया कि बारात में केवल 21 बाराती ही लड़की के घर जाएंगे. यही नही खाप ने मृत्युभोज का तक का बहिष्कार किया| में समझता हूँ यदि कोई बुरे काम को फैला सकता है तो अच्छे काम को फैला कर उदहारण पेश कर सकता है
राजीव चौधरी