कभी कभी आगे निकलने की चाह हमें ताकत देती हैं तो कभी हमें कमजोर बना देती हैं| गलती किसी की नहीं, बस जरूरत होती है कि
हम असलियत से भागना छोड़कर उसे स्वीकार करे| दुसरे का बढ़ता कद देखकर आत्महीनता का शिकार ना हो! सब कुछ आप नहीं कर सकते
महाभारत का युद्ध अकेले अर्जुन से नहीं जीता गया था| घटोत्कच ना मरता तो यही इतिहास
अर्जुन की वीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता दिखाई देता| हालाँकि गाथा हमेशा विजेता
की लिखी जाती है दुसरे विश्व युद्ध में यदि हिटलर जीत गया होता, तो मजाल कोई
इतिहासकार उसे सनकी या हत्यारा लिख देता? सनकी से याद आया आजकल इस शब्द का भारतीय राजनीती
में खूब उपयोग हो रहा है| सुबह मेट्रो ट्रेन से आ रहा था सीलमपुर का गन्दा नाला
देखा सोचा कितनी गंदगी है इसमें अचानक न्यूज़ पेपर पर नजर गयी एक दो खबर पढ़ी तो लगा
कि देश की राजनीती से तो यह नाला भी साफ है|
कई दिन बीत गये कुछ लिखा नहीं, कुछ कहा नहीं| आज फिर यूँही कलम
चलने लगी और दिल के कुछ जज्बात
शब्दों में उकेरने की एक बार फिर नाकाम सी कोशिश कर
रहा हूँ| कई बार गलती किसकी है, क्यों है ये जानने की
न तो हिम्मत होती है न ही इच्छा, कहीं न कहीं कई बार एक ग़लतफहमी को बनाए रखने की जिद होती है, जैसे आज केजरीवाल
जी को है| केजरीवाल जी दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो उनके चाहने वालों ने सोचा
होगा दिल्ली अब हर रोज कुछ अलग होगा| व्यवस्थाओं के परिवर्तन को लेकर लोग इस कदर
उत्साहित थे कि हो सकता है दिल्ली के अन्दर सूरज पश्चिम से निकले| लेकिन केजरीवाल
जी मोदी विरोध को जिद बनाये बैठे है| एक साल से ज्यादा हो गया केजरीवाल जी
विज्ञापन देते कि हमने सब कुछ बदलकर रख दिया इतने अधिकारी जेलों में गये, हवा
शुद्ध हो गयी, सड़कें जाम मुक्त हो गयी| यदि बदलाव का कोई विज्ञापन सामने नहीं आया
तो वो था अपनी और 67 आम आदमी की सेलरी के बढ़ाने का|
हालाँकि में नहीं मानता बदलाव
नहीं आया| आया है, दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री ने वो काम नहीं किया जो केजरीवाल जी
किया| दलित बच्चों की हत्या पर सुनपेड गये, अकलाख की हत्या पर दादरी गये 15 लाख का
चेक दिया, रोहित की आत्महत्या पर हेदराबाद गये| किसी भी मुद्दे पर यह बताने से नहीं
चुके कि देश में हर एक बुरी खबर के लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है| कल केजरीवाल जी
और उसकी सेना के सारे ट्वीट प्रधानमंत्री जी की शिक्षा को लेकर थे| भगवान का शुक्र है आज गरीब जुलाहा कबीरदास नहीं है वरना जिस कबीरदास पर आज लोग
पीएचडी करते है उसकी शेक्षिक योग्यता को लेकर जरुर आरटीआई दाखिल होती और कबीरवाणी
सुप्रीमकोर्ट के चक्कर काट रही होती| विरोध नीतियों का हो सकता है| पर केजरीवाल जी
राजनीती में जो अब तक काम किया उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है| क्या कोई नेता बता
सकता है कि आज राजनीति देश को एक धागे में बाधने के लिए नहीं हो रही? राजनीतिक दल समाज में बराबरी की राजनीति क्यों नहीं
कर रहे? कल हमने खुद का नेविगेशन सिस्टम लांच किया जो एक विश्व स्तरीय उपलब्धि थी
कितने नेताओं ने इस काम के लिए बधाई के पात्र इसरो के वैज्ञानिकों को ट्वीट कर
बधाई दी? आज देश की हालत देख एक चुटकुला सार्थक सा लगता हैं- बेटा अपने बाप से: "ये राजनीति क्या होती हैं? बाप: "बेटा, मान लो तेरी मम्मी घर
चलती हैं तो वो सरकार हुयी, मैं कमाता हूँ तो कर्मचारी हुआ, कामवाली काम करती हैं
तो वो मजदूर हुई, तुम देश की जनता हो और तुम्हारा
छोटा भाई देश का भविष्य ...बेटा : "अब मुझे राजनीति समझ आ गयी पापा। कल रात
मैंने देखा कर्मचारी मजदूर
के
साथ मज़े ले रहा था, सरकार सो रही थी, जनता की किसी को
फ़िक्र नहीं थी, और देश का भविष्य रो
रहा था।" राजीव चौधरी





