Friday, 29 April 2016

और देश का भविष्य रो रहा था..



कभी कभी आगे निकलने की चाह हमें ताकत देती हैं तो कभी हमें कमजोर बना देती हैं| गलती किसी की नहीं, बस जरूरत होती है कि हम असलियत से भागना छोड़कर उसे स्वीकार करे| दुसरे का बढ़ता कद देखकर आत्महीनता का शिकार ना हो! सब कुछ आप नहीं कर सकते महाभारत का युद्ध अकेले अर्जुन से नहीं जीता गया था| घटोत्कच ना मरता तो यही इतिहास अर्जुन की वीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता दिखाई देता| हालाँकि गाथा हमेशा विजेता की लिखी जाती है दुसरे विश्व युद्ध में यदि हिटलर जीत गया होता, तो मजाल कोई इतिहासकार उसे सनकी या हत्यारा लिख देता? सनकी से याद आया आजकल इस शब्द का भारतीय राजनीती में खूब उपयोग हो रहा है| सुबह मेट्रो ट्रेन से आ रहा था सीलमपुर का गन्दा नाला देखा सोचा कितनी गंदगी है इसमें अचानक न्यूज़ पेपर पर नजर गयी एक दो खबर पढ़ी तो लगा कि देश की राजनीती से तो यह नाला भी साफ है|

कई दिन बीत गये कुछ लिखा नहीं, कुछ कहा नहीं|  आज फिर यूँही कलम चलने लगी और दिल के कुछ जज्बात शब्दों में उकेरने की एक बार फिर नाकाम सी कोशिश कर रहा हूँ| कई बार गलती किसकी है, क्यों है ये जानने की न तो हिम्मत होती है न ही इच्छा, कहीं न कहीं कई बार एक ग़लतफहमी को बनाए रखने की जिद होती है, जैसे आज केजरीवाल जी को है| केजरीवाल जी दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो उनके चाहने वालों ने सोचा होगा दिल्ली अब हर रोज कुछ अलग होगा| व्यवस्थाओं के परिवर्तन को लेकर लोग इस कदर उत्साहित थे कि हो सकता है दिल्ली के अन्दर सूरज पश्चिम से निकले| लेकिन केजरीवाल जी मोदी विरोध को जिद बनाये बैठे है| एक साल से ज्यादा हो गया केजरीवाल जी विज्ञापन देते कि हमने सब कुछ बदलकर रख दिया इतने अधिकारी जेलों में गये, हवा शुद्ध हो गयी, सड़कें जाम मुक्त हो गयी| यदि बदलाव का कोई विज्ञापन सामने नहीं आया तो वो था अपनी और 67 आम आदमी की सेलरी के बढ़ाने का| 

हालाँकि में नहीं मानता बदलाव नहीं आया| आया है, दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री ने वो काम नहीं किया जो केजरीवाल जी किया| दलित बच्चों की हत्या पर सुनपेड गये, अकलाख की हत्या पर दादरी गये 15 लाख का चेक दिया, रोहित की आत्महत्या पर हेदराबाद गये| किसी भी मुद्दे पर यह बताने से नहीं चुके कि देश में हर एक बुरी खबर के लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है| कल केजरीवाल जी और उसकी सेना के सारे ट्वीट प्रधानमंत्री जी की शिक्षा को लेकर थे| भगवान का शुक्र है आज गरीब जुलाहा कबीरदास नहीं है वरना जिस कबीरदास पर आज लोग पीएचडी करते है उसकी शेक्षिक योग्यता को लेकर जरुर आरटीआई दाखिल होती और कबीरवाणी सुप्रीमकोर्ट के चक्कर काट रही होती| विरोध नीतियों का हो सकता है| पर केजरीवाल जी राजनीती में जो अब तक काम किया उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है| क्या कोई नेता बता सकता है कि आज राजनीति देश को एक धागे में बाधने के लिए नहीं हो रही? राजनीतिक दल समाज में बराबरी की राजनीति क्यों नहीं कर रहे? कल हमने खुद का नेविगेशन सिस्टम लांच किया जो एक विश्व स्तरीय उपलब्धि थी कितने नेताओं ने इस काम के लिए बधाई के पात्र इसरो के वैज्ञानिकों को ट्वीट कर बधाई दी? आज देश की हालत देख एक चुटकुला सार्थक सा लगता हैं- बेटा अपने बाप से: "ये राजनीति क्या होती हैं? बाप: "बेटा, मान लो तेरी मम्मी घर चलती हैं तो वो सरकार हुयी, मैं कमाता हूँ तो कर्मचारी हुआ, कामवाली काम करती हैं तो वो मजदूर हुई, तुम देश की जनता हो और तुम्हारा छोटा भाई देश का भविष्य ...बेटा : "अब मुझे राजनीति समझ आ गयी पापा। कल रात मैंने देखा कर्मचारी मजदूर के साथ मज़े ले रहा था, सरकार सो रही थी, जनता की किसी को फ़िक्र नहीं थी, और देश का भविष्य रो रहा था।" राजीव चौधरी 

Tuesday, 26 April 2016

नारी अस्तित्व की चादर में लिपटे प्रश्न



मैं बचपन में समझ नहीं पाती थी कि मैं कौन हूँ| मेरी इंग्लिश सहेलियाँ जब मुझसे बताती थीं कि वो अपनी अम्मी से हर तरह की बातें करती हैं तो मुझे लगता था कि मैं क्यों नहीं कर सकती| नादिया का जन्म ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के परिवार में हुआ जहाँ उन्हें लड़कों से बात करने, मनपसंद कपड़े पहनने, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी नहीं थी| सेक्स जैसे विषयों पर पाकिस्तानी समाज के रवैये पर भी नादिया ने सवाल उठाए--जहाँ वे चुटकी लेते हुए कहती हैं, "पाकिस्तानी समाज में सेक्स की कोई जगह नहीं है| दरअसल पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही नहीं| कितना अजीब है ना? आठ से दस बच्चे पैदा करने वाले लोग सेक्स का नाम लेना भी मजहब के खिलाफ मानते है| यह सब आज की वो नारी बोल रही है, जो स्वतंत्र है, अपने विचारों को लेकर, अपनी जिन्दगी की महत्वकांक्षा को लेकर| शायद उसने अपने अस्तित्व की चादर में लिपटे प्रश्न को खोज लिया कि में 
 कौन हूँ?? 

मुझे कई बार बड़ा अजीब लगता है जब में पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल पर नारी समाज को लेकर होती बहस देखता हूँ, वहां कि मीडियाकर्मी जो खुद महिला है वो इस बात से परेशान है कि पाकिस्तान में लड़कियों ने लाज शर्म के परदे क्यों लाँघ दिए और वो इसके लिए भारतीय कल्चर मीडिया आदि को दोष देती कहती है कि पाकिस्तान में पाकिस्तान का अब कुछ नहीं बचा| यहाँ सब कुछ भारतीय होता जा रहा है| बालीवुड के गीतों पर थिरकती लाहौर मेडिकल कॉलिज की छात्राएं कहती है धर्म का आजादी से क्या मतलब आखिर हमें कब तक दबा कर रखोंगे? कुछ भी हो पुरुषवादी सोच यदि कुछ जगह बदली तो कुछ जगह पुरुष बिफरा| वो आज भी महिलाओं के मामले में पुरानी सभ्यता की बात करता दिखाई दे जाता है| यूरोप में पिछले हजार वर्षो तक जिस नारी को आत्माविहीन समझा | और अरब में कहो या इस्लाम में तो कपडे के अन्दर से बाहर आना नारी के कत्ल का कारण बन जाता था| 
 
आज सब कुछ बदला आज की नारी आधुनिकता की चादर में लिफ्टी हुई इतनी आगे निकल आई है कि वह हर चीज में खुद की खुशी ढूंढती है। पिछले दिनों ही पढ़ रहा था कि वह दूसरे का दामन थामने और पहल करने में भी पीछे नहीं रहती। अब नहीं रहा वो झिझक का पर्दा! जिसको उसका नारीत्व समझा जाता था| आधुनिकता में रची बसी आज की नारी के मन में प्यार और सेक्स को लेकर पहले की अपेक्षा वो संकोच व झिझक नहीं रही है, जो कुछ सालों पहले थी। वह अपनी संतुष्टि और अभिव्यक्ति को अपना अधिकर मानती है,जिसका परिणाम यह है कि आज वह खुले दिमाग के साथ सेक्स के बारे में बातें करती है। वह अपनी इच्छाओं को सामाजिक दबाव के कारण दमन नहीं करती, बल्कि बिना संकोच के सेक्स की पहल करती है, ताकि उनकी जरूरतों की पूर्ति हो सके। यह बात सही है कि समय के साथ हर चीज बदल जाती है और महिलाओं की बदलती सोच का यह परिणाम है कि एक समय था जब महिला को जीवनसाथी चुनने व सेक्स मे संतुष्ट होने का कोई अधिकर नहीं था। पर आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत क्योंकि आज स्त्री ने मुखर होकर अपनी पसंद जाहिर करनी शुरू कर दी है कि उनके लिए भी सेक्स उतना ही जरूरी है जितना कि पुरूषों के लिए। आज की लडकियां ज्यादा सक्रिय हैं। आज बहुत सारी लडकियों के साथ भावनात्मक झझंट नही है। आज की आधुनिक नारी के लिए अब सेक्स गोपनीयता का विषय नहीं रहा है आधुनिक विचारों ने महिला की ख्वाहिशों को भी एक नई उडान दी है  और तो और दांपत्य जीवन में सेक्सुअल संतुष्टि की बात करें तो अब लडकियां पहल करने में पीछे नही रह गई हैं।

महिलाओं ने स्वयं के अनुभव के आधार पर, अपनी मेहनत और आत्मविश्वास के आधार पर अपने लिए नई मंजिलें, नये रास्तों का निर्माण किया है। पर यह नहीं है उसकी सफलता के पीछे क्षण अंश भी किसी पुरुष के हाथ होने की सम्भावना को नकार दिया जायेगा? बिलकुल नहीं तो फिर समस्या कहाँ से आई? मैं कौन हूँ का प्रश्न अभी भी नारी के पास किस उत्तर की आस में खड़ा हुआ? दरअसल पारिवारिक रिश्तों में उसका अपमान, उसका तिरस्कार, उसकी अवहेलना उसे यहाँ तक खींच कर लाई, उसके पूर्णतया समर्पण के बाद भी उसे शक्की नजरों से देखे जाना, मकड़ी की तरह बेवजह आरोपों के जाल में लिपटी महिला ने यह जाल तोड़ डाला अपने हक के लिए लड़ी भी मरी भी| पर आज उस मुकाम पर खड़ी हो गयी जहाँ पुरुष उसे यह कहने को मजबूर हो गया मेम क्या में अन्दर आ सकता हूँ? लेखक राजीव चौधरी