Tuesday, 28 February 2017

नांगेली, इतिहास का एक दर्दनाक सच

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 19वीं सदी में दक्षिण भारत में अपने स्तनों को ढकने के हक के लिए लड़ाई लड़ने वाली नांगेली नाम की महिला की कहानी को पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला किया है. 2006-2007 में जाति व्यवस्था और वस्त्र परिवर्तन नाम से इस सेक्शन में इस आंदोलन में जोड़ा गया था. उस आंदोलन के बारे में किताबों में बताए जाने पर कई संगठनों ने आपत्ति की थी. कई संगठनों का इस बारे में कहना था कि एक औरत का ब्रेस्ट को ढकने के लिए आंदोलन और उसके ब्रेस्ट को काट लिए जाने की कहानी शर्मनाक है और बच्चों को नहीं पढ़ाई जानी चाहिए. पर प्रश्न यह है कि आखिर क्यों न पढाई जाये जातीय व्यवस्था का यह कुरूप चेहरा? बल्कि इस कहानी के साथ बच्चों को वीर सावरकर की मोपला भी पढाई जानी चाहिए

आखिर क्या नांगेली और उसके आन्दोलन की कहानी जिसे पढ़कर समाज और सरकार आज शर्मसार हो रही है. पर प्रश्न यह है कि यदि यह शर्म 19 वीं सदी के धर्म के ठेकेदारों और शासकों को होती तो क्या हम धार्मिक रूप से इतने बड़े बदलाव केरल के अन्दर होते? नंगेली का नाम केरल के बाहर शायद किसी ने न सुना हो. किसी स्कूल के इतिहास की किताब में उनका जिक्र या कोई तस्वीर भी नहीं मिलेगी. लेकिन उनके साहस की मिसाल ऐसी है कि एक बार जानने पर कभी नहीं भूलेंगे, क्योंकि नंगेली ने स्तन ढकने के अधिकार के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे. केरल के इतिहास के पन्नों में छिपी ये लगभग सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कहानी उस समय की है जब केरल के बड़े भाग में त्रावणकोर के राजा का शासन था. उस समय जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उनके स्तन न ढकने का आदेश था. उल्लंघन करने पर उन्हें ब्रेस्ट टैक्स यानी स्तन कर देना पड़ता था. नांगेली भी कथित निचली जाति में आने वाली महिला थीं. उन्होनें राजा के इस अमानवीय टैक्स का विरोध किया. नांगेली ने अपने स्तन ढकने के लिए टैक्स नहीं दिया मामला राजा तक पहुंचा तो सजा के तौर पर इस जुर्म के लिए वहां के राजा ने नांगेली के स्तन कटवा दिए. जिससे उसकी मौत हो गई. नांगेली का मौत ने दक्षिण भारत में एक सामाजिक आंदोलन की चिंगारी भड़का दी.

इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया. नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं. उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे. नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था. वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं. लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था. नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी.

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं. 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए. बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने और यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं. धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया. इस समुदाय को जातीय व्यवस्था के कारण सम्मान तो दूर कपडे भी नहीं मिल रहे थे उस समय इस्लाम ने इन्हें बुर्का दिया ईसाइयत ने सम्मान जिस कारण केरल में बड़ा धार्मिक समीकरण उलट पुलट हुआ!

ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था.ये एक तरह से एक औरत के निचली जाति से होने की कीमत थी. इस कर को बार-बार अदा कर पाना इन गरीब समुदायों के लिए मुमकिन नहीं था. केरल के हिंदुओं में जाति के ढांचे में नायर जाति को शूद्र माना जाता था जिनसे निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता था. उस दौर में दलित समुदाय के लोग ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे और ये कर देना उनके बस के बाहर था. ऐसे में एड़वा और नायर समुदाय की औरतें ही इस कर को देने की थोड़ी क्षमता रखती थीं. जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता. अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते. सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था. क्यों न होता! आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें.
नांगेली का मौत के बाद सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं. इसी वर्ष मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है. अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं. 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया. कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया.

अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा हो तो सोचो इस जाति पर कितने अत्याचार हुए होंगे हिन्दुओं को एक बार जरुर सोचना चाहिए कि आखिर गलती किसकी थी? उम्मीद करते है इस लेख को पढ़कर आप लोग वीर सावरकर की पुस्तक मोपला जरुर पढेंगे ताकि भारत की धार्मिक त्रासदी का सच्चा इतिहास जाना जा सके. आखिर क्या कारण रहे की कभी दुनिया में हमारा वैदिक परचम लहराता था जो आज सिर्फ भारतीय भू-भाग तक सिमट कर रह गया. गलती हमारी थी तो स्वीकारोक्ति भी हमारी होनी चाहिए या फिर सोचना चाहिए क्या हम फिर यही गलती अभी भी तो नहीं दोहरा रहे है?.....राजीव चौधरी 

Friday, 24 February 2017

इस ममता का मूल्य कब तक चुकाएगी?


अस्सी का दशक था मुम्बई में पहला राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था जिसमें महिला शोषण पर खुलकर विमर्श हुआ और रेप के सवाल को मूल मुद्दा बनाया गया था. इसके बाद महिलाओं के अधिकारों को कानून ने लम्बे चोडे रास्ते प्रदान किये. पर शायद वो रास्ते सवेंधानिक कागजों तक ही सिमटकर रह गये जिस कारण समाज की उसी संकरी सोच की गली में महिला अकेली खड़ी दिखाई दे रही है. हाल ही में एक बार फिर रेप की एक और घटना अपने उसी अंदाज में समाज के सामने आ खड़ी हुई और इस बार पीडिता कोई दलित, गरीब अल्संख्यक नहीं बल्कि मलयालम फिल्मों की एक जानी-मानी अभिनत्री है. इस अभिनेत्री का आरोप है कि शुक्रवार की रात चलती गाड़ी में दो ड्राइवरों समेत कुछ लोगों ने उनका यौन शोषण किया जब वो कोच्ची में एक फिल्म की डबिंग निपटाकर त्रिचूर लौट रही थीं.

पहले मुझे लगता था कि कम पढ़ी लिखी, आर्थिक स्तर पर कमजोर, सामाजिक और जातिगत रूप से दबी कुचली महिला ही रेप का शिकार होती है. पर पिछले कुछ समय से ऐसे मामले पढ़कर मेरी सोच धरी की धरी रह गयी जब पता चला कि आज आर्थिक स्तर पर स्वावलंबी, सामाजिक रूप से संम्पन पढ़ी लिखी महिला भी इसका शिकार हो रही है. चाहें इसमें 2013 मुंबई की शक्ति मिल कंपाउंड में एक महिला पत्रकार से हुए सामूहिक बलात्कार का मामला हो या 2009 नोएडा में 24 वर्षीय एमबीए छात्रा से 11 लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार मामला. हालाँकि नोएडा मामले में तो अदालत ने नौ आरोपियों को इस आधार पर बरी कर दिया कि असली गुनाहगारों की पहचान साबित नहीं हो सकी. हो सकता है कल मलयालम अभिनेत्री से रेप करने वाले भी बरी हो जाये पर आज सवाल यह है कि एक महिला के प्रति इतनी क्रूरता क्यों? क्यों आज अचानक उसकी बोद्धिक प्रखरता एक वर्ग को अखरने लगी इस कारण कि वो अपनी मेहनत के बल पर बिना गिडगिडाये, बिना हाथ फैलाये, बिना कोई समझोता किये संघर्ष कर सामाजिक और आर्थिक रूप से सबल हो गयी और आप निर्बल रह गये? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस दौड़ में महिला से पिछड़ने का रंज मनाकर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कितना भी ऊपर चली जा हम तो एक झटके में अपने नीचे ले आयेंगे! जितना भी आज वो अपने संघर्ष के नये आयाम गढ़ रही है उसके शोषण के उससे ज्यादा रूप बदल-बदलकर सामने आ रहे है.

इस ताजा मामले में अभिनेत्री मंजू वारियर ने पूछा है महिलाएं पुरुषों को जितना सम्मान देती हैं उतना सम्मान पाने की उम्मीद करना महिलाओं का अधिकार है. हर बार कुछ ऐसा होता है तो हम संवाद को कुछ हैशटैग तक सीमित कर देते हैं. फिर कुछ दिन बाद घटना को भुला दिया जाता है. क्या कभी ऐसा शोषण बंद होगा? अगर देखा जाये तो इनका सवाल ठीक है कारण  हर बार यही होता है आज समाज में जितना संवेदनशील लोग जन्म ले रहे है उससे कहीं ज्यादा संख्या क्रूर भोगी खड़े हो रहे है इस बार भी वही कहानी दोराही जाएगी. कम कपडे, अंगो का दिखावा, आधी रात, लड़की अकेली क्यों थी? फिर वही राजनैतिक टिप्पणी विपक्ष का सत्तारूढ़ दल पर टूटना, संसद में शोर और इसके बाद बलात्कारियों के मुंह पर कपडा डालकर मामले पर मिटटी डाल दी जाएगी. अपराधी जेल की बेरग में लेटकर चटकारे लेकर अपनी बर्बरता के किस्से सुनायेंगे तो मानवीय गिरावट राजनीति की भेंट चढ़कर कटघरे में खड़ी नजर आएगी!
हर बार मीडिया और कलम से ये पाप उजागर होते है. हमेशा नैतिक-अनैतिक कृत्यों का समाज को बोद्ध भी कराया जाता है. लेकिन सवाल यह है क्या उस तबके तक यह बात पहुँच पाती है? शायद नहीं! बस कुछ दिन तो चर्चा का विषय बनी रहती है इसके बाद वकील, पुलिस, पीडिता और अपराधी के बीच सुलह की सुबगुआहट सुनाई देने लगती है. यदि भाग्य से न्याय मिल भी जाये तो कौनसा समाज में पीडिता का रुतबा बढ़ जाता है? यदि कोई बुद्धिजीवी महिला इस तरह के मामलों की पैरवी जोर शोर से करने की हिम्मत भी करें तो उसे पत्रकार, जज या वकील की रखेल कहकर कमजोर कर दिया जाता है.
कई बार महिला समाज द्वारा भी अधिकांश झूठे रेप के मामलें दर्ज होते है. मुझे नहीं पता उनका आधार क्या होता है. लेकिन इतना जरुर है कि उन झूठे मामलें से कामवासना के रोगियों को इन्हीं तर्को के दम पर बचाने का कार्य होता है. या कहो इन झूठे मामलों का उदहारण देकर हमेशा सच्चे मामलों को दबाया जाता है. इसमें कहीं न कहीं झूठा मामला दर्ज करने वाली एक महिला को भी जरुर सोचना होगा कि कही उसके इस झूठ से किसी के सच का गला तो नहीं घोटा जा रहा है! इस कारण भी एक ऐसी सोच विकसित कर दी गयी जैसे इस सबके लिए सिर्फ महिला ही जिम्मेदार है.
दामिनी के बाद क्या रेप बंद हुए? उसके बाद तो बुलंदशहर एन.एच 91 पर माँ बेटी को परिवार के सामने रोंदा गया और अब मलयालम अभिनेत्री के साथ आखिर यह कब तक चलेगा? एक महिला ने आपकी जिन्दगी में कौनसा हस्तक्षेप किया जो आप हर रोज उसके जीवन में हस्तक्षेप कर रहे है! बस यही कि उसने जन्म दिया. या यह कि उसने सीने से लगाकर पालन पोषण किया? आखिर वो अपने इस स्नेह अपनी इस ममता का मूल्य कब तक चुकाएगी? कोई निश्चित अवधि, कोई समय, कोई साल, कोई दिनांक ताकि फिर उसे लगे कि चलो इस अँधेरी रात के बाद तो एक उजली सुबह होगी..
 Rajeev Choudhary

Monday, 6 February 2017

कश्मीर नहीं, पाकिस्तान विवादित है.

एक बार फिर कश्मीर का राग अलापते हुए नवाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान लगातार कश्मीरी लोगों के संघर्ष में उनका साथ देता रहेगा. दुनिया को अब भारत से कहना चाहिए कि “बहुत हो गया” भले ही पुरे विश्व के लिए उनका यह भाषण पुराना हो पर पाकिस्तान के लोगों और मीडिया ने इसे खूब सराहा. दरअसल पाकिस्तान में देशभक्ति का प्रमाणपत्र बिना कश्मीर मुद्दे के नहीं मिल पाता. इसलिए वहां जब-जब विपक्ष किसी प्रधानमंत्री को घेरता तो वो कश्मीर की आजादी का राग गाने लगता है. जिसके तुरंत बाद वहां की मजहबी तंजीमों को चंदा और सरकार को कुछ देर के लिए पंक्चर टायर की तरह हवा मिल जाती है और सरकार अपने कार्यकाल का कुछ फासला तय कर लेती है.

बहरहाल पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दा उस समय उठाया जब भारत में उत्तर-प्रदेश, पंजाब, गोवा समेत कई राज्यों को लेकर मारा मारी हो रही है कि आखिर ये प्रदेश किसके होंगे? इसलिए अब मेरे लिए भी नवाज का बयान कोई मायने नहीं रखता. पाकिस्तान की राजनीति ने भले ही 70 सालों में अपने आवाम को कुछ न दिया हो पर मनोरंजन खूब दिया. जैसे खाने के बाद कुछ लोग पाचक चूरण लेते है इसी तरह पाकिस्तानी मीडिया भी देर रात कश्मीर पर एक प्रोग्राम जरुर चलाती है ताकि अवाम इस सपने में सोये कि उनकी अगली सुबह गुलमर्ग की स्नोफाल में होगी!!

कई बार पता नहीं चलता पाकिस्तान विवादों का देश है या खुद विवादित देश? पाकिस्तान कहता है कश्मीर विवादित हिस्सा है, पर पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों पर गौर करें तो खुद पाकिस्तान ही विवादित हिस्सा नजर आता है. पाकिस्तान में हर तीसरे महीने बलूचिस्तान से लेकर गिलगित तक आज ये रैली, कल वो तंजीमों का जुलूस, परसों आतंकियों की शाहदत पर शोक, इसके बाद वहां पनामा पेपर तो पाकिस्तान के बच्चें-बच्चें के याद हो गये है सच कहे तो पाकिस्तान एक बिखरा हुआ देश है जिसमें उसके क्षेत्रफल से कहीं ज्यादा विवादित मुद्दे है. जब वो मुद्दे सर पर हावी होते उनका विपक्ष मुंह से झाग फेंकने लगता है तो वहां का प्रधानमंत्री कह देता है कश्मीर लेकर रहेंगे. इसके बाद कई दिनों तक वहां जश्न चलता है.

अभी कई रोज पहले नवाज शरीफ का पनामा पेपर मामला सुप्रीम कोर्ट पंहुचा तो नवाज शरीफ ने कहा “उसका जीवन खुली किताब है.” यह सुनकर सुप्रीम कोर्ट के जज “अज्बत सईद” को हार्ट अटेक आ गया. सुना है जब वो ठीक होंगे तो पुन: इस मामले पर सुनवाई होगी. फ़िलहाल पाकिस्तान की मीडिया कह रही है कि मुल्क कहाँ जा रहा है? न हमारी कोई विदेश नीति है,  न कोई सुरक्षा नीति,  देश को आगे बढ़ाने का प्लान सरकार को पता नहीं है,  दहशतगर्दी पर कोई चर्चा नहीं होती, कौम को अँधेरे ने रखा जा रहा है, सीपेक पर जिससे जो हो रहा है वो अपने मन मुताबिक समझोते कर रहा है, पाकिस्तान के नागरिको को विदेशों में टेक्सी ड्राइवर पकड़कर थाने छोड़ आते है, यदि यहाँ से कोई पाकिस्तानी नागरिक एक दो महिना के लिए बाहर चला जाता है तो वापिस आने पर उसका घर नहीं मिलता उस पर दुसरे का कब्जा मिलता है.

पाकिस्तान ने न्यूज चैनल 24 पर तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता अल्ब्ब्सा बीबी ने यहाँ तक कह दिया कि गधे इस मुल्क को चला रहे है और पाकिस्तान एयरलाइन्स को बकरे, पूरा मुल्क अल्लाह के हवाले है. लेकिन इसके बाद भी नवाज शरीफ को कश्मीर चाहिए. पिछले कुछ हफ्तों के दौरान पांच ब्लॉगर लापता हो गए,. कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को धमकी मिली है. अहमदिया समुदाय पर हमले हुए हैं और शिया मुसलमानों का नरसंहार किया गया है. पाकिस्तान की सेना के नए सेनाध्यक्ष जनरल कमर बाजवा ने भी दोहरया है कि चरमपंथ देशी ख़तरा है ना कि विदेशी.

लेकिन इस सब के बाद भी पाकिस्तान शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की बात नहीं करता. उसे चाहिए अपने देश रोजगार के अवसर पैदा करे, नफरत फैलाने वाले भाषणों पर प्रतिबंध लगाने के साथ देश के युवाओं को चरमपंथ से प्रभावित होने से रोकने के लिए स्पष्ट रणनीति बनाये. बलूचिस्तान की परवाह करें वहां सेना द्वारा की जा रही हिंसा पर लगाम लगाये. नवाज़ शरीफ को समझना चाहिए “बहुत हो गया” कभी कश्मीर-कश्मीर के चक्कर में बांग्लादेश की तरह बलूचिस्तान भी वीजा लेकर जाना पड़े..राजीव चौधरी

Wednesday, 1 February 2017

जरूरी नहीं, काजल तुम सिर्फ मेरी हो?

वो गार्ड रसिला को घूरता था जो रसिला को पसंद नहीं था. सिर्फ इस कारण इन्फोसिस की महिला इंजिनियर रसिला राजू को जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उसने गार्ड भबेन सैकिया से उसकी शिकायत करने की बात कही थी. यह कोई प्रेम कहानी नहीं थी कि रसिला ने उससे प्यार किया और बाद छोड़ दिया जिस कारण दिल टूटे आशिक गार्ड ने ताव में आकर हत्या कर दी. में इसे एकतरफा प्रेम का नाम नहीं दे सकता क्योंकि यह सिर्फ एक वासना की गिद्ध द्रष्टि जैसा है!!

90 के दशक में जब ग्रीटिंग कार्ड पर इस तरह की शायरी चल रही कि “चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे” उसी दौरान जीत फिल्म का एक डायलाग बड़ा प्रसिद्ध हुआ था जब नायक ने दूर जाती नायिका से कहा- “काजल तुम सिर्फ मेरी हो” मैं जब बहुत छोटा था इसके मायने नहीं समझ पाया. हाँ कई साल बाद मैंने यह  डायलाग  पता नहीं कितने लोगों की मोबाइल रिंगटोन, ऑटो, डीजे, आदि में सुना, तो हमेशा सोचता रहा कि आखिर काजल दुसरे की क्यों नहीं हो सकती ? 

काजल यानि कोई भी एक लड़की ले लो जो कोई कुर्सी, मेज, भूमि का टुकड़ा या खरीदी गयी प्रोपर्टी नहीं है.  उस लड़की के अपने सपने, अपनी सोच, मर्यादाएं सीमाएं और सबसे बड़ी बात उसकी अपनी जिन्दगी होती है. तो क्या उनपर कोई भी कब्जा जमा लेगा? उन्मुक्ता का अधिकार सबको है. मुझे भी और आपको भी. सबकी अपनी-अपनी पसंद भी होती है, जरूरी नहीं जो हमें पसंद हो वो सब दुसरे को भी पसंद हो? खैर रसिला राजू कोई पहली लड़की नहीं है जो इस तरह के हादसे का शिकार हुई है. अखबार के किसी न किसी पेज पर हर दुसरे तीसरे दिन ऐसी एक घटना जरुर मिल जाती है. जो अधिकतर राजनैतिक उथल-पथल की खबरें पढ़ते समय  सुबह चाय के कप के निचे दब जाती  है.

यदि ऐसे मामलों की बात की जाये तो जुलाई 2016 बिहार के गोपालगंज जिले में सिरफिरे आशिक ने एकतरफा प्यार में अपनी कथित प्रेमिका की धारदार चाकू से गला रेतकर हत्या कर दी थी. तो अगस्त माह में दिल्ली के भलस्वा डेरी इलाके में रहने एक प्रेमी ने लड़की को जिंदा जला दिया था. दिसम्बर माह में शामली के पास गाँव में एक प्रेमी द्वारा अपनी प्रेमिका की दरांती से गर्दन रेत कर हत्या करने का सनसनीखेज मामला सामने आया था. ये सब देश की अलग-अलग जगह के मामले है और इन सब मामलों में आरोपियों से एक ही जवाब मिला था कि वह उक्त महिला से प्रेम करता है वो दुसरे के साथ जाना चाहती थी इस वजह से हत्या कर दी. मसलन हर जगह वजह यही कि “काजल तुम सिर्फ मेरी हो”

कहते है प्यार को शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता और ना ही इसकी कोई परिभाषा है. इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. प्यार की कोई भाषा नहीं होती है. ये शब्दविहीन वर्डलेस होता है. प्यार एक ऐसी तपस्या है जिसमे इंसान अपनी सारी खुशियां, अपने अपने प्यार के लिए कुर्बान कर देता है. प्यार एक समर्पण है जिसमे इंसान अपने प्यार के लिए पूरी तरह समर्पित हो जाता है, प्यार एक त्याग का नाम है. जो इमरोज ने लेखिका अमृता प्रीतम के लिए किया. यदि लोग गर्दन काटना जिन्दा जलाना आदि को प्यार का नाम देंगे तो पागल, सनकी या मनोरोगियों को क्या कहेंगे?

जरूरी नहीं कोई इंसान किसी एक आदमी के साथ बँधकर रहना चाहता हो. इसे प्रतिबद्धता की कमी भी कह सकते है. जाहिर सी बात है अगर एक इंसान से जरूरते पूरी नहीं हुई तो इंसान उसे छोड़कर दूसरे के पास अपनी जरूरतें पूरी करने चला जाता है. शरीर यांत्रिक है इसे जबरदस्ती आध्यात्मिक बनाया जाता है. या फिर किसी पर जरा सी मुसीबत, या मुश्किल समय आ जाता है तो लोग उसे छोड़कर दूसरे के पास चले जाते हैं. इसमें महिला और पुरुष दोनों है. क्योंकि मेने अभिनेत्री काजोल अभिनीत फिल्म गुप्त भी देखी जिसमे एक लड़की नायिका एक लड़के नायक को पाने के लिए कई कत्ल तक कर देती है. हालाँकि महिलाओं के इस तरह के मामले विरले ही सुनने में आते है. हाँ पुरुष जरुर इस बात को सौ फीसदी सच मान बैठता है कि यदि लड़की ने उसे देखा मुस्कुराया, या हंसकर बात की तो वो उसकी अमानत हो गयी है.

इस मामले में अधिकांश स्त्रियों के उलझे होने पूरी संभावना होती है. क्योंकि प्रेम के या सेक्स के निवेदन उसके पास अधिक आते है वो उन्मुक्ता चाहती और कई बार वो पुरुष के दोगलेपन को स्वीकार भी कर लेती है क्योंकि इतनी उलझनों के बाद भी वो प्रेम करना चाहती है लेकिन प्रेम और विश्वास में डूबे उसके अस्तित्व पर जब कब्जे की बात आती है तो वो कई बार घुटन महसूस करती है. यदि प्रेम में उसकी स्वाभाविक उत्सुकता और भागीदारी के बावजूद भी पुरुष मन में जब कहीं संदेह उपजता है तो वो किनारा करना चाहती है. जिसे पुरुष स्वीकार नहीं कर पाता और काजल तुम सिर्फ मेरी हो इस तरह डायलाग को ध्यान में रख हिंसा कर बैठता है मेरे हिसाब से इसे सिर्फ प्यार का जुनून या सनकपन कहा जा सकता है क्योंकि यह कैसा और कहां का प्यार है जिसमें सामने वाले को चोट पहुंचा कर खुशी मिलती है?...राजीव चौधरी