Friday, 2 December 2016

हिजाब का ये कैसा खेल?



खबर है कि भारतीय शूटर हिना सिद्धू ने नौवीं एशियाई एयरगन शूटिंग चैंपियनशिप से अपना नाम वापस ले लिया है. ईरान में होने वाली इस चैंपियनशिप में हिजाब पहनने की अनिवार्यता के चलते हिना ने ये कदम उठाया है. यह प्रतियोगिता दिसंबर में ईरान की राजधानी तेहरान में होगी. इस भारतीय खिलाडी ने कहा है कि वो ऐसा करने वाली कोई क्रांतिकारी खिलाडी नहीं है, ले‍किन व्यक्तिगत रूप से उन्हें लगता है कि किसी खिलाड़ी के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य करना खेल भावना के लिए ठीक नहीं है. एक खिलाड़ी होने का उन्हें गर्व है क्योंकि अलग-अलग संस्कृाति, पृष्ठभूमि, लिंग, विचारधारा और धर्म के लोग बिना किसी पूर्वाग्रह के एक दूसरे से खेलने के लिए आते हैं., खेल मानवीय प्रयासों और प्रदर्शन का प्रतिनिधित्व करता है. न की किसी धर्म का! यदि यहीं पर रुख दूसरी खबर का करें तो चेचन्या की सरकार ने शादियों पर नजर रखने के लिए ख़ास अफसरों को तैनात करने का फैसला किया है. ये अफसर शादी के दौरान होने वाले अनुचित व्यवहार रोकेंगे. कार्यकारी संस्कृति मंत्री खोजा-बाऊदी दायेव ने कहा, विशेष कार्यकारी समूह सार्वजनिक जगहों में होने वाली सभी शादियों में शिरकत करेंगे. यदि पोशाकें और नृत्य की भंगिमाएं राष्ट्रीय रीति रिवाजों और इस्लामिक परंपराओं के ख़िलाफ हुईं तो शादी रोक दी जाएंगी.

कई बार लगता है कि इस्लाम जीवन शैली से ज्यादा परम्पराओं में बसता है. या कहो पुरातन परम्पराओं के बचाव का नाम ही धर्म विशेष रह गया है? सब जानते है कि इस्लाम के मानने वालों की एक बहुत बड़ी तादाद कट्टरवादी नहीं है. वहीं कई कट्टरपंथी ऐसे भी हैं जिनका दूसरों का सिर धड़ से अलग करने के काम से कोई वास्ता नहीं है. इसके बावजूद, मुस्लिम सोच में एक ऐसी दिक़्क़त है जिसके बारे में बात करने से ज्यादातर मुस्लिम बचते हैं. ऐसा नहीं है कि ये सोच केवल मुसलमानों के भीतर ही है, लेकिन आजकल यह उनके बीच ख़ासतौर पर प्रचलित है. इस दिक़्क़त की एक पहचान यह है कि कई मुसलमान, यहाँ तक कि कुछ धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम भी, मुस्लिम संस्कृति और समाज से जुड़ी हर चीज का बचाव करते हैं. इसके लिए आम तौर पर अपने गौरवशाली अतीत की दुहाई दी जाती है, साथ ही वर्तमान समय की परेशानियों के लिए किसी बड़े खलनायक को जिम्मेदार ठहराया जाता है.

जंग या बहस कोई भी हो विचारधारा को लेकर होती है और ताकतवर लोग हमेशा अपनी विचारधारा को बड़ा रखना चाहते है. इन्सान वैसे तो हमेशा वैचारिक स्वतंत्रता का पक्षधर रहा किन्तु समूह में आकर वो हमेशा उस समूह की विचारधारा की सम्मान करने की बात करता है क्योकि समूह हमेशा संगठन की गरिमा की बात करता है. कुछ समय पहले मैंने बीबीसी की एक रिपोर्ट में पढ़ा था कि फैशनेबल कपड़े पहनने पर एक फलस्तीनी लेखिका ने कुछ पश्चिमी देशों में बुर्क़ा पहनने के विरोध या उसपर प्रतिबंध की कोशिशों की आलोचना की थी. जबकि वो खुद बुर्का नहीं पहनती थी. लेकिन अपने कई अन्य बुर्क़ा न पहनने वाले साथियों की तरह उन्हें भी लगा कि अपने भाइयों के पक्ष में बोलना उनकी जिम्मेदारी है. उन्होंने तर्क दिया था कि पश्चिमी देश बिकनी पर क्यों नहीं प्रतिबंध लगाते, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि बिकनी से भी महिलाओं की उसी तरह एक ख़ास छवि बनती है जैसी कि बुर्क़े से. भले भी उस लेखिका की नीयत अच्छी थी, लेकिन तर्क बुरा था. कोई भी पश्चिमी देश महिलाओं को बिकनी पहनने के लिए जबरदस्ती जोर नहीं डालता. आप पश्चिम में किसी भी समुद्र तट पर पूरे कपड़े पहनकर घूम सकते हैं! लेकिन कई इस्लामी देश, जैसे कि सऊदी अरब, बुर्का पहनने के लिए बाध्य करते हैं और इसे जबरदस्ती लागू करते हैं. मुझे लगता है कि मुसलमानों को अपने तर्कों और बहानों की पूरी ईमानदारी से जाँच करनी चाहिए.

मुस्लिम लेखिका अय्यान हिरसी कहती है कि जमाना तो बदला पर अभी भी इस्लाम में बहुत कुछ नहीं बदला वहीं आधुनिक विवाद की ऐतिहासक जड़ें,  इस पुस्तक में लेखिका लैला अहमद कहती हैं इस्लाम में स्त्रीवाद व स्त्री कि ये आवरण प्रथा सर्वप्रथम ससानियन समाज में प्रचलित था जिसे लिंगभेद के लिये इस्तेमाल किया जाता था साथ ही इस आवरण का प्रयोग ईसाई समुदाय में मध्य पूर्व व मेडिटेरियन भागों में, इस्लाम के उदय के समय था. मोहम्मद के जीवनकाल में व उस काल के अंतिम समय में, सिर्फ उनकी पत्नियां वे मुस्लिम थी जो आवरण में रहती थी. उनकी मृत्यु के बाद और मुस्लिम समुदाय की स्थिति के अनुसार, उच्च वर्ग की महिलाएं आवरण में रहने लगी और धीरे धीरे ये मुस्लिम उच्च वर्ग की महिलाओं का प्रतीक बन गया.  आवरण में या बुर्के में रहना, इसे जीवन में मोहम्मद द्वारा प्रचलित नही किया गया था वरन्‌ ये वहां पर पहले से मौजूद था. शायद इसका कारण वहां उड़ता रेत रहा हो. जिसे बाद में सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाने लगा था. जो कि अब बदलते समय में धार्मिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है. शायद मुस्लिम समाज में, अपनी प्रतिष्ठा व धन प्रदर्शन का मुद्‌दा बनाकर आवरण को ग्रहण करने की प्रथा धीरे धीरे मोहम्मद की पत्नियों को अपना आदर्श बनाकर आगे चल पड़ी.वरना हिजाब का कोई भी पर्यावाची बुर्के या पर्दे से नहीं बल्कि हिजाब का अर्थ सिर्फ शर्म बताया गया है.

सोमालिया की लेखिका इरशद मांझी ने कुछ समय पहले आक्सफोर्ड में मुस्लिम विद्यार्थियों, प्रोफेसरों तथा बुद्धिजीवियों से कहा था कि मुस्लिमों को धमकी और शिकायत का रवैया छोड़कर आत्म अवलोकन और खुले विचार- विमर्श पर उतरना चाहिए यदि मुसलमान भी अपनी ऐसी कमजोरी मान लें तो यह बड़ा रचनात्मक कदम होगा. यदि मुस्लिम समुदाय अपने वैचारिक स्त्रोतों के एकमात्र सत्य या त्रुटिहीन होने की जिद छोड़ दे तो उसमें विवेकशील चिंतन स्वत: आरंभ हो जाएगा जब तक मुसलमान अपनी जिद ठाने रहेंगे, समस्या बनी रहेगी जो इस्लाम के अथवा मानवता के हित में नहीं होगा. मुस्लिम समाज में सुधारों की आवाज उठाने में मुस्लिम महिलाएं आगे हैं-? पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि से लेकर ईरान, सऊदी अरब, यूरोप, अमेरिका तक सुधारवादी मुसलमानों के बीच निर्भीक स्वर स्त्रियों का ही है. यह इस्लामी रीति-रिवाजों में पुनर्विचार की जरूरत पर बल देता है.  इसलिए अब तसलीमा नसरीन को अपवाद रूप में नहीं लिया जा सकता. उनकी तरह ही अय्यान हिरसी अली, वफा सुल्तान, फेहमिना दुर्रानी, इसरद मांझी, बसमा बिन सऊद आदि की आवाजें मुखर हो रही हैं. अब इन्हें अज्ञानी, इस्लाम विरोधी और अमेरिकी एजेंट कहकर झुठलाया नहीं जा सकता. बसमा तो स्वयं सऊदी राजपरिवार की हैं. आज नहीं तो कल मुस्लिम नेताओं, उलेमाओं और आलिमो को उन पर गंभीर विचार करना ही होगा। धमकी या हिंसा के बल पर या परम्पराओं के रखरखाव के लिए किसी को कब तक चुप किया जा सकता है-?

Wednesday, 5 October 2016

क्या रालोद से निकलेगा यूपी का सीएम?




एक बार फिर चौधरी अजीत सिंह द्वारा सत्ता की कुर्सी पर निशाना लगाने के लिए राजनीति के धनुष पर गठबंधन की प्रत्यंचा चढ़ाई जा रही है. इस बार रालोद की सहायक पार्टी के रूप में जदयू खड़ी दिखाई दे रही है. हालाँकि साथ ही राजनीतिक गलियारों में व्यंग भी चल रहा है कि रालोद को उत्तर प्रदेश जीतने के लिए पड़ोसी राज्य से राजनीतिक मदद मांगनी पड़ रही है. यदि गठबंधन 10 सीट जीत गया तो अगला गठबंधन असम गण परिषद या तेलगुदेशम पार्टी से भी किया जा सकता है. जबकि कुछ लोग पहले ही इस गठबंधन को थूक की नदी पर रेत का पुल बता रहे है. तो कुछ लोग गठबंधन के प्रति आशावादी भी दिखाई दे रहे है. बहरहाल सत्ता का पेड़ जनादेश के बीज में छिपा होता है. जैसा खाद पानी मिलता है बीज वैसा ही पनपता है. शायद इस वजह से राष्ट्रीय लोक दल, जनता दल यूनाइटेड और बीएस फोर ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लडने और रालोद नेता जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है. साथ ही लोगों को पुराना सपना भी याद दिलाया, गन्ना मूल्य व 15 लाख रूपये भी चौधरी अजीत सिंह याद दिलाना नहीं भूले. किन्तु यहाँ अजीत सिंह खुद भूल गये कि सपना चकनाचूर करने में भी उनका योगदान कम नहीं रहा.
राजनीति की दुनिया में रालोद को सबसे अविश्वसनीय साथी के तौर पर माना जाता है. जुलाई माह में खुद अजीत सिंह ने अपने आवास पर अपने समर्थको पर गुस्सा निकालते हुए कहा था कि भाग जाओ यहाँ से मुझे चुनाव नहीं लड़ना.इसके 2 माह बाद महागठबंधन का ऐलान किसी को समझ आये या ना आये पर नीतीश कुमार और केसी त्यागी जरुर समझ रहे है. अब गठबंधन हो गया पर इसका निष्कर्ष क्या निकलेगा सिर्फ अभी कयास ही लगाये जा सकते है. चूँकि उत्तर प्रदेश एक बड़ा राज्य है. पश्चिम में जहाँ अजीत सिंह के पास मतदाता है तो वहीं थोक के भाव में नेता भी किन्तु राजनीति की पगडण्डी जितना लखनऊ की और बढती है उतना ही वोटर तो दूर की बात पार्टी के लिए उम्मीदवार भी तलाशने दूभर हो जाते है. बिलकुल यही हाल पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ने पर जदयू का भी होता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में यदि जेडीयू के पास कुर्मी मतदाता है तो पश्चिम में रालोद के पास जाट किन्तु गठबंधन के बाद भी दोनों दल अकेले ही खड़े है.

एक वक्त था जब राजस्थान से ले कर हरियाणा और उत्तरप्रदेश में सचमुच भरोसे के कई जाट नेता थे. राजस्थान में कुंभाराम आर्य, रामनिवास मिर्धा, नाथूराम मिर्धा से ले कर हरियाणा में देवीलाल और उत्तर प्रदेश में चरण सिंह जैसे नेता उत्तर भारत की राजनीति में बहुत प्रभावी थे. मगर न जाने कैसे मैंऔर मैंके व्यक्तिवादी अहम में इनकी विरासत मैंऔर परिवार में ही सिमटती गई. पिता से पुत्र और पुत्र से पोते में नेताओं ने अपने को समेटा. दरअसल चरण सिंह की विरासत और जाटों के थोक वोटों की पूंजी को अजित सिंह ने 35 सालों में जैसे गवांया है वह कई मायनों में जाट राजनीति की त्रासद हकीकत है. जब अजीत सिंह ने लोकदल का नेतृत्व संभाला था तब मुलायम सिंह से कई गुना अधिक राजनैतिक ताकत और विधायकों की संख्या अजित सिंह के पास थी. लेकिन अजीत सिंह सब गंवाते गए वहीं मुलायम सिंह कई बार मुख्यमंत्री बने. अब यदि आज के हालात देखे तो राजनीति में एक बड़ा फेरबदल हुआ जहाँ अजीत सिंह अपनी राजनीति को अभी भी पुराने ढर्रे पर चलाना चाहते है वहां आज का युवा मतदाता चलना नहीं चाहता. हालाँकि कुछ लोग इसे समझ नही पा रहे और दूसरा रंग देने की कोशिश के रूप में प्रश्न पूछ रहे कि मुजफ्फरनगर दंगो की सजा अजीत सिंह को क्यों?  
 लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह है पश्चिम यूपी के जिन जाट वोटों पर अजित सिंह इतराए हुए हैं उनकी मुस्लिम वोटों से जैसी गहरी ठनी है उसके चलते मुलायम सिंह और मायावती यदि रालोद को अपनाते तो खुद मुस्लिम वोट गवाने का खतरा पैदा हो सकता था. इसलिए अजीत सिंह के पास भाजपा के अलावा कोई चारा नहीं बचा था पर पार्टी में कई थिंक टेंक होने की वजह से कुछ लोग अभी भी जाट मुस्लिम समीकरण बनाने की जिद पाले हुए है तो कुछ का मत है कि अब इसके कोई मायने नहीं रह गये है. अब यह सिर्फ मन को तस्सली भर देने वाली राजनीति है वरना दोनों मतदाता साथ रहते हुए भी अपने राजनितिक हितों के लिए बहुत दूर निकल चुके है जहाँ से वापिस लोटना बेहद मुश्किल है. जहाँ अजीत के लिए उत्तर प्रदेश में कभी राजनीति में साथियों की कमी ना थी आज वहां प्रदेश में विकल्प नहीं मिल रहा है. तभी चरण सिंह की विरासत वाले अजीत सिंह राज्यसभा की अदद एक सीट के लिए आज दर,दर ठोकर खा रहे हैं और विधानसभा का आगामी पूरा चुनाव भी एक राज्यसभा की सीट पर कुरबान करने पर उतारू है!

यदि यहाँ जाट मतदाता की बात करें तो यूपी की अगली सत्ता में जाट की भागीदारी तभी संभव है जब भाजपा की सरकार बने. इसलिए अगले चुनाव में भी जाट अजीत सिंह से वैसे ही दूर रहेंगे जैसे मई 2014 में रहे थे. पश्चिम उत्तर प्रदेश का जाट हर हाल में चाहेगा कि लखनऊ की सत्ता में रोल बने. नीतीश-अजित सिंह-बीएस फॉर  के समीकरण के साझा चुनाव से कुछ सीटें बन सकती हैं लेकिन इससे सत्ता बनने की गलतफहमी जाट नहीं पालेंगे। तभी कहते हैं कि कुछ जाट सलाहकारों ने भी अजित सिंह को समझाया था. भाजपा से बातचीत करने के लिए कहा था. पर जब जाट अपने आप समर्थक हैं तब भाजपा क्यों अजीत सिंह का बोझ उठाए? तभी अजीत सिंह के आगे विलय की शर्त बताई जा रही है. अब अजीत सिंह अपना विलय भाजपा में, कराएँ या जनता दल यू से गठबंधन उनकी अब न भाजपा में वीरेंद्र सिंह जैसी हैसियत बनेगी और न जनता दल यू में केसी त्यागी से ज्यादा अहमियत! हमेशा की तरह चुनाव में जीत के नारों का शोर तो सुनाई देगा पर परिणाम वही खामोश रहेंगे ... Rajeev choudhary


Monday, 3 October 2016

पाकिस्तान के साथ किसका तकरार ?



राजीव चौधरी 

मनसे की धमकी के बाद पाक कलाकार फवाद खान के भारत छोड़ने के बाद राजनीति और मीडिया में एक अजीब बहस चल पड़ी कुछ इसे कला का अपमान तो कोई कला पर हमला बता रहा है. क्वीनके निर्देशक विकास बहल का कहना है कि पड़ोसी देश के कलाकारों को देश छोड़ने पर मजबूर करने के बजाए, इस प्रकार के मुद्दों (आतंकवाद से संघर्ष) पर भावी कार्रवाई के लिए रणनीति बनानी चाहिए. गायक अभिजीत ने भाषा से संयम खोते हुए कई बालीवुड फिल्म निर्माताओं को दलाल और पाक कलाकारों को बेशर्म तक कह डाला. पूरा प्रकरण देखकर कहा जा सकता है कि बालीवुड दो हिस्सों में बंटता सा नजर आया. अभिजीत ने पिछले दिनों गुलाम अली के खिलाफ भी कहा था कि इन लोगो के पास सिर्फ आतंकवाद है और हम अपने देश में इन्हें पाल रहे है. पर उस समय सिने अभिनेता नसरुददीन शाह ने इस मामले पर दुख जताते हुए कहा था इस घटना से में बहुत शर्मिंदा हूँ क्योंकि जब में लाहौर गया था तो मेरा बहुत शानदार स्वागत किया गया था. इसका मतलब लड़ाई कलाकारों की नहीं है. न व्यापारियों की, राजनेता भी गलबहिया करते नजर आते है और क्रिकेटर भी.
भारत और पाकिस्तानी कलाकारो का एक दूसरे के यहां आना जाना लगा रहता है. राजनेता और मीडिया भी खबरों के अलावा आपसी संवाद स्थापित करते रहते है. क्रिकेटर भी मैच के बाद या कमेंटरी रुम में अच्छा वार्तालाप करते है. उधोगपति और व्यापारी भी अपने हितोनुसार आते जाते और मिलते रहते है. अब इस सारे प्रसंग पर गौर करने बाद खेल,व्यापार आदि की कला, कई सारे प्रश्न जन्म लेते है कि जब राजनीति, कला, व्यापार के साथ पाकिस्तान की कोई दुश्मनी नहीं है तो पाकिस्तान का भारत में दुश्मन कौन है? भारत की सेना? पर सेना के जवानों की यहाँ कौनसी ऐसी फैक्ट्री या परियोंजना चल रही है जो पाकिस्तानी उसे हथियाना चाहते है? या फिर पाकिस्तान के दुश्मन वो लोग जरुर है जो बाजारों में सामान खरीदते आतंकियों द्वारा बम विस्फोट में मारे जाते है. या फिर सरहद के किनारे बसे गाँवो में खेलते मासूम बच्चे जो अचानक हुई गोलाबारी में मारे जाते है वो जरुर पाकिस्तान के दुश्मन होंगे? फ़िल्मी सितारें तो पाकिस्तान के दोस्त है भला कला में क्या दुश्मनी? ओमपुरी उधर फिल्म बनाता है फवाद खान इधर कुमार सानू के वहां शो होते है और राहत फतेह अली खान के इधर. सानिया मिर्जा का शोहर पाकिस्तानी है तो अलगावादी नेता यासीन मलिक की बीबी पाकिस्तानी. जब राजनीती, कला, व्यापार और मीडिया में से पाकिस्तान का यहाँ कोई दुश्मन नहीं है तो पाकिस्तान का यहाँ तकरार किससे है? क्यों रोजाना सीमा पार से सीजफायर टूटते है,  क्यों हमारे देश के सैनिको पर घात लगाकर हमले होते है. क्यों उडी, पठानकोट में आतंकी हमले होते है?  आखिर उनकी यह दुश्मनी किससे है और कलाकारों की नजर में दुश्मनी का मापदंड क्या है?
स्थितियों का विश्लेषण करने की मेरी सीमित योग्यता के चलते मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ अभिजीत ने जो कहा वह उसकी देश के प्रति गहरी आस्था को दर्शाता है उसने कला से पहले देश को सम्मान दिया, हो सकता है उसके अन्दर शहीद हुए जवानों के परिवारों के प्रति प्रेम जागा हो, आखिर जो लोग सीमा पर बैठकर हमारे हितो की रक्षा करते है क्या हम उनके हित के लिए दो शब्द भी नही कह सकते? जब हिन्दुस्तान के मुस्लिम राजनेता सलमान रुश्दी के जयपुर साहित्य सम्मेलन में आने का विरोध कर सकते है तो मनसे और अभिजीत ने गुलाम अली का विरोध करके कोई पाप अनाचार नहीं किया इनके अन्दर भी देश प्रेम की भावना हिलोरे मार सकती है! क्योकि जिस देश से कलाकार आते है उसी देश से आतंक भी आता है, जिस देश के कलाकार यहाँ से पैसा और सोहरत बटोरकर ले जाते है उसी देश के आतंकी आकर जवानों के सर काटकर ले जाते है. तो इसका मतलब पाकिस्तान मेरा दुश्मन है? या फिर हर उसका दुश्मन है जिन्हें भारत की मिटटी से प्यार है?