Wednesday, 5 October 2016

क्या रालोद से निकलेगा यूपी का सीएम?




एक बार फिर चौधरी अजीत सिंह द्वारा सत्ता की कुर्सी पर निशाना लगाने के लिए राजनीति के धनुष पर गठबंधन की प्रत्यंचा चढ़ाई जा रही है. इस बार रालोद की सहायक पार्टी के रूप में जदयू खड़ी दिखाई दे रही है. हालाँकि साथ ही राजनीतिक गलियारों में व्यंग भी चल रहा है कि रालोद को उत्तर प्रदेश जीतने के लिए पड़ोसी राज्य से राजनीतिक मदद मांगनी पड़ रही है. यदि गठबंधन 10 सीट जीत गया तो अगला गठबंधन असम गण परिषद या तेलगुदेशम पार्टी से भी किया जा सकता है. जबकि कुछ लोग पहले ही इस गठबंधन को थूक की नदी पर रेत का पुल बता रहे है. तो कुछ लोग गठबंधन के प्रति आशावादी भी दिखाई दे रहे है. बहरहाल सत्ता का पेड़ जनादेश के बीज में छिपा होता है. जैसा खाद पानी मिलता है बीज वैसा ही पनपता है. शायद इस वजह से राष्ट्रीय लोक दल, जनता दल यूनाइटेड और बीएस फोर ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लडने और रालोद नेता जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है. साथ ही लोगों को पुराना सपना भी याद दिलाया, गन्ना मूल्य व 15 लाख रूपये भी चौधरी अजीत सिंह याद दिलाना नहीं भूले. किन्तु यहाँ अजीत सिंह खुद भूल गये कि सपना चकनाचूर करने में भी उनका योगदान कम नहीं रहा.
राजनीति की दुनिया में रालोद को सबसे अविश्वसनीय साथी के तौर पर माना जाता है. जुलाई माह में खुद अजीत सिंह ने अपने आवास पर अपने समर्थको पर गुस्सा निकालते हुए कहा था कि भाग जाओ यहाँ से मुझे चुनाव नहीं लड़ना.इसके 2 माह बाद महागठबंधन का ऐलान किसी को समझ आये या ना आये पर नीतीश कुमार और केसी त्यागी जरुर समझ रहे है. अब गठबंधन हो गया पर इसका निष्कर्ष क्या निकलेगा सिर्फ अभी कयास ही लगाये जा सकते है. चूँकि उत्तर प्रदेश एक बड़ा राज्य है. पश्चिम में जहाँ अजीत सिंह के पास मतदाता है तो वहीं थोक के भाव में नेता भी किन्तु राजनीति की पगडण्डी जितना लखनऊ की और बढती है उतना ही वोटर तो दूर की बात पार्टी के लिए उम्मीदवार भी तलाशने दूभर हो जाते है. बिलकुल यही हाल पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ने पर जदयू का भी होता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में यदि जेडीयू के पास कुर्मी मतदाता है तो पश्चिम में रालोद के पास जाट किन्तु गठबंधन के बाद भी दोनों दल अकेले ही खड़े है.

एक वक्त था जब राजस्थान से ले कर हरियाणा और उत्तरप्रदेश में सचमुच भरोसे के कई जाट नेता थे. राजस्थान में कुंभाराम आर्य, रामनिवास मिर्धा, नाथूराम मिर्धा से ले कर हरियाणा में देवीलाल और उत्तर प्रदेश में चरण सिंह जैसे नेता उत्तर भारत की राजनीति में बहुत प्रभावी थे. मगर न जाने कैसे मैंऔर मैंके व्यक्तिवादी अहम में इनकी विरासत मैंऔर परिवार में ही सिमटती गई. पिता से पुत्र और पुत्र से पोते में नेताओं ने अपने को समेटा. दरअसल चरण सिंह की विरासत और जाटों के थोक वोटों की पूंजी को अजित सिंह ने 35 सालों में जैसे गवांया है वह कई मायनों में जाट राजनीति की त्रासद हकीकत है. जब अजीत सिंह ने लोकदल का नेतृत्व संभाला था तब मुलायम सिंह से कई गुना अधिक राजनैतिक ताकत और विधायकों की संख्या अजित सिंह के पास थी. लेकिन अजीत सिंह सब गंवाते गए वहीं मुलायम सिंह कई बार मुख्यमंत्री बने. अब यदि आज के हालात देखे तो राजनीति में एक बड़ा फेरबदल हुआ जहाँ अजीत सिंह अपनी राजनीति को अभी भी पुराने ढर्रे पर चलाना चाहते है वहां आज का युवा मतदाता चलना नहीं चाहता. हालाँकि कुछ लोग इसे समझ नही पा रहे और दूसरा रंग देने की कोशिश के रूप में प्रश्न पूछ रहे कि मुजफ्फरनगर दंगो की सजा अजीत सिंह को क्यों?  
 लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह है पश्चिम यूपी के जिन जाट वोटों पर अजित सिंह इतराए हुए हैं उनकी मुस्लिम वोटों से जैसी गहरी ठनी है उसके चलते मुलायम सिंह और मायावती यदि रालोद को अपनाते तो खुद मुस्लिम वोट गवाने का खतरा पैदा हो सकता था. इसलिए अजीत सिंह के पास भाजपा के अलावा कोई चारा नहीं बचा था पर पार्टी में कई थिंक टेंक होने की वजह से कुछ लोग अभी भी जाट मुस्लिम समीकरण बनाने की जिद पाले हुए है तो कुछ का मत है कि अब इसके कोई मायने नहीं रह गये है. अब यह सिर्फ मन को तस्सली भर देने वाली राजनीति है वरना दोनों मतदाता साथ रहते हुए भी अपने राजनितिक हितों के लिए बहुत दूर निकल चुके है जहाँ से वापिस लोटना बेहद मुश्किल है. जहाँ अजीत के लिए उत्तर प्रदेश में कभी राजनीति में साथियों की कमी ना थी आज वहां प्रदेश में विकल्प नहीं मिल रहा है. तभी चरण सिंह की विरासत वाले अजीत सिंह राज्यसभा की अदद एक सीट के लिए आज दर,दर ठोकर खा रहे हैं और विधानसभा का आगामी पूरा चुनाव भी एक राज्यसभा की सीट पर कुरबान करने पर उतारू है!

यदि यहाँ जाट मतदाता की बात करें तो यूपी की अगली सत्ता में जाट की भागीदारी तभी संभव है जब भाजपा की सरकार बने. इसलिए अगले चुनाव में भी जाट अजीत सिंह से वैसे ही दूर रहेंगे जैसे मई 2014 में रहे थे. पश्चिम उत्तर प्रदेश का जाट हर हाल में चाहेगा कि लखनऊ की सत्ता में रोल बने. नीतीश-अजित सिंह-बीएस फॉर  के समीकरण के साझा चुनाव से कुछ सीटें बन सकती हैं लेकिन इससे सत्ता बनने की गलतफहमी जाट नहीं पालेंगे। तभी कहते हैं कि कुछ जाट सलाहकारों ने भी अजित सिंह को समझाया था. भाजपा से बातचीत करने के लिए कहा था. पर जब जाट अपने आप समर्थक हैं तब भाजपा क्यों अजीत सिंह का बोझ उठाए? तभी अजीत सिंह के आगे विलय की शर्त बताई जा रही है. अब अजीत सिंह अपना विलय भाजपा में, कराएँ या जनता दल यू से गठबंधन उनकी अब न भाजपा में वीरेंद्र सिंह जैसी हैसियत बनेगी और न जनता दल यू में केसी त्यागी से ज्यादा अहमियत! हमेशा की तरह चुनाव में जीत के नारों का शोर तो सुनाई देगा पर परिणाम वही खामोश रहेंगे ... Rajeev choudhary


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