Thursday, 26 October 2017

नई अफगान नीति में पाकिस्तान



हम भारतीय भी ना उलझे-उलझे से रहते है. इधर उधर इतना कुछ घट जाता है लेकिन हम इतने भोले है कि राजनैतिक पार्टियों के एजेंडे को अपनी अस्मिता का सवाल बना-बनाकर हेशटेग कर पुश करने में लगे रहते है. अभी पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नई अफगान नीति को लेकर सामने आये थे. इस नई नीति में जहां पाकिस्तान को अमेरिका से फटकार मिली थी तो वहीं अमेरिका ने अफगानिस्तान में भारत से और मदद की मांग की थी. भारत की ओर से ट्रंप की नई अफगान नीति का स्वागत किया गया था.

अमेरिका ने अपनी इस नई अफगान नीति में पाकिस्तान को मिलने वाली इमदाद (सहायता राशि) भी बंद करने की धमकी देते हुए कहा था कि पाकिस्तान अपनी आतंक की सुरक्षित पनाहगाह बंद करें. जिसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने दबी जबान से ही सही लेकिन कहा था कि इमदाद सिमदाद तो अब आप वैसे भी नहीं देते तो हम क्यों कार्रवाही करें? उनके इस जवाब का स्वागत वहां सदन में मौजूद सभी संसद सदस्यों ने मेज थप-थपाकर किया हालाँकि उनकी करीब 269 सदस्यों वाली नेशनल असेम्बली में से उस वक्त वहां सिर्फ 52 ही मौजूद थे.
इस बयान के बाद ख्वाजा आसिफ मानों पूरे पाकिस्तान की आँख का तारा बन गया और सत्ता-विपक्ष दोनों अमेरिका से कह रहे हो कि पाकिस्तान का 37 बिलियन डॉलर कर्जा उतार दो तालिबान को हम ही कूट-काट देंगे.

मुख्य विपक्षी दल का नेता होने के नाते इमरान खान ने भी अमेरिका को आइना दिखाते हुए सरकारी और फौजी सुर में सुर में मिलाते हुए कहा हम किसी दुसरे की लड़ाई अपने घर में नहीं लड़ेंगे.दरअसल अभी इमरान खान सत्ता में नहीं है जब तक इन्सान पावर में नहीं आता तब वो कुछ भी बोल लेता है. राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रम्प को ले लो या अपने देश में देखे तो एक नेता सत्ता में आने से पहले लोकपाल और व्यवस्था परिवर्तन पता नहीं क्या-क्या कर रहा था.

खैर देखा जाये अभी तक पाकिस्तान ने अमेरिका से आतंकवाद से लड़ने के लिए ही साढ़े चौदह बिलियन डॉलर लिए है उनमें से साढ़े चार बिलियन डॉलर उसने फौज को दिए बाकि 10 बिलियन का हिसाब-किताब जितना मेरे पास है उतना ही पाकिस्तान के पास है. मतलब खाया पिया मुकर गया. अब अमेरिका को किस मुंह से समझाएं कि उसकी इमदाद से अच्छा और बुरा तालिबान दोनों पलते है. अच्छे तालिबान को वो भारत और अफगानिस्तान से लड़ने के लिए खुद देते है और बुरा तालिबान खुद ले लेता हैं. सीधे सरकारी ठेकेदार के पास चिट्ठी आती है बोला जनाब खैबरपख्तूनवा में बन रहा पुल उडाऊ या इमदाद दोंगे? वजीरिस्तान में स्कूल उडाऊ या इमदाद दोंगे? मतलब पाकिस्तान के अन्दर जब अमेरिकी इमदाद का कददू कटता है तो सब में बंटता है.

अमेरिका ने कहा है पाकिस्तान हमसे इतने पैसे लेता है पर बदले में कुछ नहीं करता और भारत हमसे इतने पैसे कमाता है लेकिन अफगनिस्तान में कम निवेश करता है. मसलन ट्रंप प्रशासन अपनी नई नीति के तहत चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत की भागीदारी और बढ़े और यह भागीदारी आर्थिक के साथ-साथ सैन्य भागीदारी भी हो. इसका मतलब कुछ इस तरह लिया जाये कि ये अधमरा सांप भारत के गले में डालकर चुपके से वहां से खिसक लिया जाये. पर उनकी आशाओं पर थोडा सा पानी उस वक्त फिर जब भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत युद्ध प्रभावित अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास कार्यों में मदद करना जारी रखेगा लेकिन हम वहां कोई सैन्य सहयोग नहीं दे पाएंगे. भला बिना बात भारत क्यों फंसे कि लुगाई किसी ओर कि लड़ाई किसी ओर की सिर फूडायें हम.
भारत के इस अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकराने के बाद पाकिस्तान की मानों बांछे खिल गयी. वहां के विदेश मंत्री को कतर, रूस और चाइना का दौरा करना था पर विमान को अमेरिका की तरफ मोड़ दिया और वहां जाकर स्वीकार करते हुए कहा कि हाँ पाकिस्तान में आतंकी हैं पर वह हमारे नहीं है वो जनरल जियाहुल हक और मुशर्रफ का लाधा हुआ बोझ है यदि कुछ इमदाद मदद मिल जाये हम ये बोझ आपके हवाले कर देंगे वो क्या हैं कि (आई. एम. एफ.) के कर्जों और आतंकी दोनों का बोझ अब सहन नहीं होता. 

अब इत्ती सी बात से हाफिज सईद भड़क उठा और फटाफट विदेश-ए-खारजा, ख्वाजा आसिफपर 10 करोड़ रूपये का मान हानि का मुकदमा ठोक दिया. मुझे भी ताज्जुब हुआ कि पाकिस्तान में आतंकियों का भी मान होता है? पर हाफिज को कौन समझाए कि उसके ऊपर 50 करोड़ का इनाम है पाक सरकार उसे 50 करोड़ में बेचकर उसके मान हनन का 10 करोड़ चुकाकर भी 40 करोड़ कमा लेगी. और उन पैसों से पता नही कितने हाफिज खड़े हो जायेंगे?
अब जहाँ अमेरिका ने अपनी नई अफगान नीति में पाकिस्तान को एकबार फिर साझीदार बनाया है तो पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आश्वस्त किया है कि आप हमारे साथ हेलीकॉप्टरों में बैठकर चले जहाँ-जहाँ तालिबानी और हक्कानी नजर आये मारों पर जनाब ये (आई. एम. एफ.) के रोज-रोज के तकादो से पिच्छा छुड़ा दो...राजीव चौधरी


Friday, 11 August 2017

तसलीमा तुम डर से डर गयी या भीड़ से ?

सच कहना, आलोचना करना या किसी विषय पर अपनी अलग हटकर राय रखना तो ऐसे हो गया है जैसे आपने भूखे भेड़ियों के झुण्ड में कंकर फेंक दिया हो। कुछ दिन पहले औरंगाबाद  हवाई अड्डे के बाहर कुछ मुसलमान “तस्लीमा गो बैक” के नारे लगा रहे थे। पुलिस ने किसी भी तरह की हिंसा की आशंका को देखते हुए तस्लीमा को हवाई अड्डे से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं दी और उन्हें वहीं से मुंबई वापस भेज दिया।
मैंने कहीं पढ़ा था कि जब भीड़ सड़कों पर सामूहिक हिंसा के ज़रिए आम इंसानों को डराने लगे और देश की संस्थाएं तमाशाई बनी बैठी रहें तो फिर ये लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए चिंता का विषय है। पर तस्लीमा तुम डरना मत, ये लोग डराकर ही जीना जानते हैं। तुम मुझसे उम्र और ज्ञान में बड़ी हो, तुमने बुद्ध का संदेश ज़रूर पढ़ा होगा कि जब तुम किसी की सदियों पुरानी धारणाओं को तोड़ते हो तो लोग तुम्हें आसानी से स्वीकार नहीं करते। वो पहले तुम्हारा उपहास उड़ायेंगे, फिर हिंसक होंगे और तुम्हारी उपेक्षा करेंगे। इसके बाद तुम्हें स्वीकार करेंगे। तुम अभी इन लोगों की धारणाओं को खंडित कर रही हो, लेकिन यकीन मानो एक दिन यह लोग तुम्हें ज़रूर स्वीकार करेंगे।
ये विरोध सिर्फ तुमने ही नहीं बल्कि हर उस इंसान ने भी झेला, जिनके पास कहने को कोई नई बात थी। तस्लीमा शायद तुमने भी पढ़ा होगा, यही लोग थे जिन्होंने कभी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) साहब पर कूड़ा फेंका था और उनका उपहास उड़ाया था। लेकिन बाद में हाथ से पत्थर गिरते गए और सजदे में सर झुकते चले गए।
तस्लीमा तुम्हें क्या बताना कि यही लोग थे जिन्होंने सुकरात को ज़हर का कटोरा थमा दिया था, जीसस को सूली पर चढ़ा दिया था। ज़्यादा दूर ना जाओ, यही लोग थे जिन्होंने नारी शिक्षा और धार्मिक आडम्बरों से मुक्त करने वाले स्वामी दयानन्द जैसे समाज सुधारक को ज़हर तक दिया था। बुद्ध के ऊपर थूकने की घटना और उस पर महात्मा बुद्ध का मुस्कुराना भी हमने इसी इतिहास में पढ़ा है।
तस्लीमा तुम्हें क्या बताना कि धर्म और नेकी अंदर होती है और नफरत और हिंसा बाहर से सिखाई जाती है, जो आज इन विरोध करने वालों को सिखाई गई है। तुम्हारे सवालों को लेकर बवाल मचाने वालों और इस बवाल का पोछा बनाकर आपनी राजनीति का फर्श चमकाने वालों से घबराना नहीं, क्योंकि हर नए पैगाम, हर नई बात, हर नए नज़रिए का ऐसे ही विरोध होता है। बड़ी सच्चाई विरोध के पन्ने पर ही तो लिखी जाती है।
मुझे दुःख है जो फैसले लोकतंत्र और संविधान लेता था आज उसे नफरत की विचारधारा लिए भीड़ और आवारातंत्र ले रहा है। मुझे इस कृत्य पर लज्जा आई पर तस्लीमा जो लोग तुम्हारी पुस्तक ‘लज्जा’ से लज्जित नहीं हुए भला उन्हें कौन शर्म, हया का पाठ पढ़ा सकता है?
जो लोग मज़हब और धर्म का शांति पाठ और लोकतंत्र में आज़ादी पढ़ा रहे हैं, क्या उनके लिए ये बात शर्म से डूब मरने की नहीं है कि 21वीं सदी में किसी इंसान को अपनी धार्मिक या सामाजिक विचारधारा के कारण हिंसक भीड़ के डर से अपनी जिंदगी छुपकर और गुमनामी में गुज़ारनी पड़े?
तस्लीमा तुमने वो कहानी तो ज़रूर सुनी होगी कि कभी प्राचीन येरुशलम में लोग इबादत और प्रार्थना के जोखिम से बचने के लिए हर कोई अपने-अपने पापों की एक छोटी गठरी बकरी के सींगों से बांधकर उसे ये सोचकर शहर से निकाल दिया जाता था कि हमारे पाप तो बकरी ले गई, अब हम फिर से पवित्र हो गए।

आज भी वही लोग हर जगह बसे हैं, बस आज बकरी उसे बना देते जो सच कह देता है। इसमें चाहे पाकिस्तान में तारिक फतेह हो, भारत से सलमान रुश्दी और एम. एफ हुसैन। शायद इस लिस्ट में बांग्लादेश के कथित ठेकेदारों ने देश से बाहर कर तुम्हें भी वही बकरी बना दिया, खासकर कि धार्मिक कट्टरपंथी लोगों ने।
एम.एफ. हुसैन को धर्मांध लोगों के कारण भागते रहना पड़ा, मगर हुसैन को किनके कारण भारत छोड़ना पड़ा? हुसैन को सताने वाले लोग, सलमान रुश्दी की मौत का फतवा जारी करने वालों से किस तरह अलग हैं? हुसैन की बेकदरी करने वाले, तुम्हें दरबदर करने वालों से किस तरह भिन्न हैं? ये धर्म की आड़ में लोगों का उत्पीड़न करने की कोशिश करते हैं। ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यकीन नहीं रखते हैं।
पर देखना तस्लीमा एक दिन यह लोग तुम्हें भी उसी तरह स्वीकार करेंगे, जैसे तीस वर्ष तक फ्रॉयड की किताबों को आग में झोंकने वाले आज उनका गुणगान करते नहीं थकते हैं। हर जगह जब खुद पर बस नहीं चले तो सच लिखने, बोलने वालों को सब बुराईयों की जड़ बताकर अपनी जान छुड़ाना कितना आसान सा हो गया है ना तस्लीमा?

Friday, 30 June 2017

हंगामा क्यों बरपा? वर्जिनिटी जो खो दी है!!

Rajeev choudhary 

Rajeev choudhary

अक्सर आपने देखा होगा या खबर सुनी होगी कि फलां देश में फलां जगह एक लड़की ने अपनी वर्जिनिटी की बोली लगाई, हिंदी में कहे तो कौमार्य की नीलामी और इसके बाद पता चलता है कि उसके पास इतने लाख आवेदन आये!
आखिर ऐसा क्या होता है कौमार्य में जिसे लेकर पुरुष वर्ग इतना उत्साहित रहता है? बस यही कि पहली बार शारीरिक संबंध के दौरान महिला की योनी से निकलने वाली रक्त की बूंदे देख सके या उसकी चीखने की आवाज सुन सके? यदि इसे मानसिक तृप्ति से जोड़कर देखा जाये तो फ्रायड जैसे मनोचिकित्सक इस सोच वाले लोगों को किस श्रेणी में रखेंगे? अच्छा महिला के कौमार्य से चरित्र मापने वाले क्या बता सकते हैं कि पुरुष की वर्जिनिटी मापने के लिए उसने कितनी तकनीक खोजी, कितने वर्जिनिटी टेस्टर बनाये?
पता नहीं यह प्रसंग यहाँ कितना एहमियत रखता है किन्तु आजकल चीन में इसे लेकर काफी बहस है। हाल ही में चीन में एक टीवी सीरियल के बहाने इन दिनों लड़कियों के कुंवारेपन पर बहस छिड़ी हुई है। कहने को चीन कितनी भी आर्थिक तरक्की कर चुका हो पर आज भी सामाजिक सोच के स्तर पर भारत के पिछड़े समाज से तुलना की जा सकती है। सवाल यह है कि क्या आज के चीन में भी लड़कियों के लिए कुंवारी होना सबसे बड़ी धरोहर है? चीन के सबसे मशहूर टीवी सीरियल ओड टू जॉयने इस बहस को देश में व्यापक पैमाने पर छेड़ दिया है।
हालाँकि यह विषय भारत में वर्जित ही माना जाता रहा है। इस विषय पर बात करने तक को चरित्र की सीमा से जोड़ने में देर नहीं लगाते। पूरा सच तो यहाँ लिखा भी नहीं जा सकता और ना ही यहाँ पढ़ा जायेगा। उल्टा अपनी सोच छोड़कर मुझसे सवाल शुरु हो जाएंगे। क्योंकि यहाँ ऋषि वात्सायन द्वारा लिखित कामसूत्र को धार्मिक पुस्तक और कामसूत्र फिल्म को अश्लील माना जाता है।
मामला एक देश का नहीं बल्कि कई देशों की सोच का है। इंडोनेशियन नैशनल पुलिस में नए महिला सिपाहियों की शारीरिक तथा नौतिक शक्ति सिद्ध करने के लिए उनके कौमार्य की जाँच की जाती है। तो दक्षिण अफ्रीका में वर्जिनिटी टेस्ट में पास लड़कियों को ही कुछ स्कूल छात्रवृति प्रदान करते है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी जांच निजता का हनन है। शिक्षा के अवसर और वर्जिनिटी को जोड़कर देखना सही नहीं है। अब आप सोच रहे होंगे खैर ये तो पिछड़े देश है इनका क्या गीत गाना।
कई जगह वर्जिनिटी खोने को सील टूटना तक कहा जाता है। जैसे महिला एक जीवित देह न होकर पैक सामान हो!
यदि भारत की बात करें तो यहाँ हर रोज संस्कृति के कथित रखवाले को रोते देखा है कि देश पश्चिमी संस्कृति में डूब रहा है। सिर्फ अनपढ़ ही नहीं, कई पढ़े-लिखे लड़के भी लड़कियों के शरीर उसकी चाल को देख कर निर्णय करते दिखाई दे जाते हैं कि उसका यौन जीवन कैसा है। पैर फैला कर चलने वाली लड़कियां यौन सम्बन्ध बना चुकी होती हैं। कुछ तो ये भी समझते हैं कि जो लड़कियां पहली बार यौन सम्बन्ध बनाने पर रोती या चिल्लाती नहीं हैं, वो वर्जिन नहीं होती। असल में यदि लड़की सेक्स के दौरान कामोत्तेजित होती है, तो ऐसा दर्द नहीं होता है कि वो चीखने लगे। शर्म और लज्जा की बात तो यह कि कई जगह वर्जिनिटी खोने को सील टूटना तक कहा जाता है। जैसे महिला एक जीवित देह न होकर पैक सामान हो!
अभी तक एक शर्माती हुई लड़की कांपते हाथों से नजरें नीची कर चाय का ट्रे लेकर आती थी, लोग उससे पूछते थेकहाँ तक पढ़ी हो खाना बनाना आता है’? बस इतना जानने के लिए कि लड़की तुतलाती तो नहीं या फिर ये सब शादी की एक रस्म में शरीक सा था पर अब समय बदला सोच बदली और शादी से पहले लड़के और लड़कियाँ बातें करते हैं और उनकी बातों में वो सब शामिल होता है जिसे अब तक वर्जित समझा जाता था।
मैं पिछले दिनों ही पढ़ रहा था कि लड़कों में वर्जिनिटी की ख़्वाहिश ख़त्म नहीं हुई है। वो लड़की से उसके ब्वॉयफ्रेंड के बारे सिर्फ इसलिए पूछते मिल जायंगे ताकि उसके कौमार्य का परीक्षण किया जा सके। इस मामले में लड़कियों का बेबाक होना उनकी मुखरता को दर्शाता है। लड़के जब किसी लड़की से उसके प्रेम संबध के बारे में पूछते हैं तो उनके लिए यह अनैतिकसच जानने की तरह होता है जबकि लड़कियां इस मामले में ज़्यादा ईमानदार होती हैं। लड़कियों को लगता है कि उनके संबंधों के बारे में कोई किसी और से पूछे, इससे बढ़िया है कि वह ख़ुद ही साफ़-साफ़ बता दें। जो लड़कियाँ आत्मनिर्भर हैं उन्हें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ऐसा कहने से रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। वो बराबरी का व्यवहार चाहती हैं और यह हमारे समाज के लिए अच्छा है।
इसके बाद जब एक लड़की शादी करके अपने ससुराल आती है। सुहागरात पर उसका पति कमरे में आता है उसकी पहली चाह यह जानने की होती है कि बीवी वर्जिन है या नहीं। सुबह यार दोस्त आसानी से पूछते मिल जाते है खून कितना निकला या नहीं?? मतलब अज्ञानता के कारण एक स्वच्छ रिश्ते में आसानी से रक्त खोजते मिल जायेंगे। क्या वाकई यह रिश्ता भी खून से ही मजबूत होता है?
क्या कभी किसी ने ऐसा सुना है कि किसी महिला ने शादी की पहली रात पति को अपमानित कर कहा हो कि तू वर्जिन नहीं में अपने घर जा रही हूँ ? शायद नहीं!! लेकिन महिलाओं के मामले में आप ऐसी ढेरों कहानियाँ पढ़ सकते है जिनमें उन्हें शादी के बाद वर्जिनिटी खोने की कीमत चुकानी पड़ी हैं।
2013 मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में कन्यादान योजना के तहत सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन किया गया था। इसमें शामिल होने आई 90 आदिवासी महिलाओं समेत 350 महिलाओं का वर्जिनिटी और प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया गया था वर्जिनिटी टेस्ट में फ़ेल महिलाओं की शादी समारोह से निकाल दिया गया था। पर एक पुरुष का वर्जिनिटी टेस्ट तो दूर यह तक नहीं पूछा गया कि क्या आप वर्जिन हो या नहीं?
आज भी, कई लोग लड़की का शादी तक वर्जिन होना बहुत जरूरी मानते है। यही कारण है कि वर्जिनिटी से जुड़े हुए बहुत से मिथक समाज में फैले हैं। हमारे देश में सेक्स-एजुकेशन तो न के बराबर है, जो सीखना होता है लोग पॉर्न देख कर ही सीखते हैं। वर्जिनिटी को किसी एक तरह से नहीं समझाया जा सकता। वर्जिन किसको समझा जाता है, अधिकतर लोग ऐसा मानते हैं कि जिस लड़की ने कभी सेक्स नहीं किया हो, वो वर्जिन होती है और जिसने किया है अरे वो खराब है