Wednesday, 15 June 2016

इस्लाम पर ही खतरा क्यों?

एक बार फिर अमरीका के ऑरलैंडो शहर में एक आतंकी ने गोलाबारी कर करीब 50 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया| करीब इतने ही घायल है जिन्हें में जिन्दा नहीं समझता क्योंकि हमलावर का इरादा उन्हें जिन्दा छोड़ना कतई नहीं था वो तो उनकी किस्मत ने उन्हें बचा लिया गया| अब लाशों की गिनती कर हमले को छोटा बड़ा बताकर मूल्याकन किया जायेगा| किन्तु लोगों के मन में जितनी सवेदना मरने वाले लोगों के प्रति दिख रही है, उससे ज्यादा सहानुभूति तो मुझे आतंकी के प्रति दिखाई दे रही है| आखिर किस आधार पर एक हत्यारी मानसिकता को यह कहकर क्लीनचिट दी जा रही है कि हत्यारा पागल सनकी था| यदि वो पागल या सनकी था तो उसने सउदी अरब, के किसी शेख के होटल पर हमला क्यों नहीं किया? आतंक की इस हत्यारी मानसिकता का सहानुभूतिपूर्ण बचाव क्यों? जबकि  गोलीबारी करने वाले आतंकी उमर मतीन के पिता सादिक़ मीर मतीन ठीक कह रहे है कि मतीन के दिल में इतनी नफरत भरी हुई थी, इसका उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था| किसी गलत या सही काम की सजा इन्सान नही ऊपर वाला तय करता है ख़ुदा नौजवानों को इस्लाम के सच्चे सिद्धांतों को समझने में मदद करें|

शायद सादिक़ मीर मतीन सही कह रहे है लड़ाई आतंक के बजाय इस अन्दर की नफरत से लड़नी होगी| जब तक इस नफरत का दमन नहीं होगा तब तक आतंक को खत्म नहीं किया जा सकता| नफरत भरे दिल हर रोज किसी कसाब, मतीन, लादेन को जन्म देते रहेंगे| लेकिन प्रश्न भी हमेशा यहीं पर अटकता है कि आखिर यह नफरत आई कहाँ से? कैसे हर आतंकी हमले के बाद यह कहा जाता है कि वो तो बड़ा अच्छा नेक लड़का था पता नहीं यह सब क्यों किया!! क्यों करते है ऐसा एक बार इस विषय पर गंभीरता से सबको सोचना होगा| क्यों एक दुसरे कि संस्कृति, सभ्यता, उनका सामाजिक परिवेश को निशाना बनाया जाता है| कहीं इस लिए तो नहीं कि हर एक धर्म-ग्रन्थ यह कहता है मै ही श्रेष्ठ हूँ बाकि अन्य नहीं?   
 पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि आतंकी संगठन खुद को सही बताने के लिए बेचैन हैं। वे स्वयं को धार्मिक नेताओं और इस्लाम की रक्षा करने वाले पवित्र योद्धाओं के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं। कट्टरपंथी इस्लाम से बाहर के लोगों को आतंकवादियों की इस बात को खारिज करने की आवश्यकता है कि पश्चिम एवं इस्लाम या आधुनिक जीवन या अन्य धर्मो की जीवनशैली इस्लाम के परस्पर विरोधी हैं। ऐसा भी नहीं हो सकता कि पुरे विश्व के सात अरब से ज्यादा लोगों का खान-पान रहन-सहन या उनकी सामाजिक आर्थिक जीवनशैली कुछ आतंकी समूह द्वारा संचालित की जाएगी| ओबामा ने कहा था इसीलिए आईएसआईएस स्वयं को इस्लामिक स्टेट कहता है और दुष्प्रचार करता है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की लड़ाई इस्लाम से है। इसी तरह वे लोगों को अपने संगठन में शामिल करते हैं। इसी तरह वे युवाओं को कट्टर बनाने की कोशिश करते हैं।


हिंसक कट्टरपंथ जिसे यूएस की एक ब्लागर लेखक पामेला जेलर ने रेडिकल इस्लाम का नाम दिया है आज इसके खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता है। इस काम को कोई और नहीं बल्कि खुद उदारवादी मुस्लिम समुदाय को करना होगा| जब तक यह काम कोई और करेगा इसे हमेशा धर्म या सम्प्रदाय के टकराव का नाम दिया जाता रहेगा| इससे  आंतक कमजोर होने के बजाय और मजबूत होता चला जायेगा| जब भी आतंक के खिलाफ अमेरिका, रूस, फ्रांस आदि देश खड़े होते है तो इसे मानवता- दानवता के तराजू में न रखकर बड़ी चालाकी से धार्मिक टकराव घोषित कर दिया जाता है| मुस्लिमो को इस भूल से बाहर आना होगा कि आंतकी संगठन इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे कुछ ऐसे पागल लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ईश्वर के नाम पर लोगों की हत्या करते है। आतंकवाद के लिए कोई धर्म जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए रेडिकल मानसिकता के लोग जिम्मेदार हैं| ओबामा ने अपने भाषण में कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को बहुत स्पष्ट रूप से यह कहना होगा कि भले ही पीडित कोई भी हो, निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा इस्लाम या मुसलमानों की रक्षा नहीं करती, यह इस्लाम और मुसलमानों को नुकसान पहुंचाती है। उदारवादी मुस्लिम जगत को सोचना होगा कि जब मात्र हजारों की संख्या में बचे पारसी समुदाय को किसी से कोई खतरा नहीं, बोद्ध समुदाय को किसी से कोई खतरा नहीं तो करोड़ों, अरब से ज्यादा करीब 56 देशों के मालिक मुस्लिमों के इस्लाम पर ही खतरा क्यों? आखिर क्यों कुछ लोग यह कहने को मजबूर हुए कि मुस्लिमों से विश्व को खतरा है?........लेख राजीव चौधरी

Friday, 3 June 2016

लाशों की लगती है, कीमत!!

जब देश के सविंधान में सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है| सभी धर्मो का बराबर सम्मान है| कानून लोगों को एक नजर से देखने वाला बताया जाता है तो फिर किसी हिंसा या शहादत ke मामले में राजनैतिक या सरकारी स्तर पर मिलने वाली मुआवजा राशि में भेदभाव क्यों? यदि उत्तर प्रदेश सरकार के समाजवाद पर ही बात की जाये तो, पार्टी के नाम और काम में काफी अंतर दिखाई देता है| अक्सर देखने पढने में समाजवाद” बहुत अच्छा शब्द लगता है, कि सभी के लिए हित बराबर सभी के लिए अवसर बराबर सभी एक जैसे देखे जायेंगे कौन बड़ा कौन छोटा कोई  लेना देना नहीं, यानी एक ही नजर से देखे जाना इस समाजवाद शब्द का अर्थ समझ में आता था| किन्तु उत्तरप्रदेश सरकार का समाजवाद आजकल बिलकुल भिन्न दिखाई देता है| यहाँ सरकार लोगों को क्षेत्र, जाति और धर्म में बांटकर दिखाई सी देती नजर  आती है| जिसके कुछ उदहारण भी लोगों के सामने है|
 मथुरा की घटना में अखिलेश यादव द्वारा शहीद हुए थानाध्यक्ष संतोष कुमार के परिजनों को बीस लाख के मुवावजे की घोषणा कर दी जोकि एक राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा सवेंदना के नाते उठाया गया स्वागत योग्य है| किन्तु मेरा हमेशा कहना है कि हिंसा कहीं भी हो, किसी भी रूप में हो, गरीब मरे या अमीर सबके परिजनों के आंसू दर्द समान होता है| मामला चाहे  धर्म का हो या जातिगत किन्तु मरता हमेशा मनुष्य है| पूजा, उपासना धर्म में कुछ अंतर हो सकता है, किन्तु हमारे मानवीय संवेदना में अंतर नहीं होना चाहिए| किन्तु सरकारों की ओर से कुछ और ही होता आया है| सब जानते है प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में मारे गए डी.एस.पी. जिया उल हक की पत्नी परवीन और पिता शम्सुल हक को 25-25 लाख रुपये के चेक सौंपे थे और परिवार के पांच सदस्यों को योग्यता के अनुसार नौकरी का आश्वासन दिया था। पांच के उलट जिया उल हक की बीबी परवीन ने नौकरी के लिए आठ लोगों की सूची शासन को भेजी थी, जिसमें से सात उसके मायके के सदस्य थे|  किन्तु इसके कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ही मेरठ में एक युवती के साथ बदमाशों द्वारा दुव्र्यवहार की घटना में उनसे मोर्चा लेने के दौरान शहीद फौजी वेदमित्र चौधरी के परिजनों को 10  लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की  घोषणा थी क्या यही  समाजवाद था ? हो सकता है यहाँ सरकार के समाजवाद के चश्में का नम्बर बदल गया हो! कि एक को 50 लाख दुसरे को 10 लाख| मतलब की एक किस्म से मरने के बाद जैसे लाशों की कीमत सी लगती है|
 सीओ जियाउल-हक की मौत के बाद, इंस्‍पेक्‍टर अनिल कुमार की हत्‍या पर सीएम अखिलेश ने उन्‍हें 20 लाख का मुआवजा दिया था जो एक बार फिर समाजवाद की द्रष्टि पर ऊँगली उठा रहा था| मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वहां पर पीड़ितों को मुआवजे देने में धार्मिक भेदभाव का आरोप भी सपा सरकार पर लगता रहा था| यदि सरकार उस समय सर्वधर्म समरसता का रास्ता अपनाती तो हो सकता था कि मुस्लिमों को लगता कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। लिहाजा मुलायम खुलकर मुसलमानों के पक्ष में नजर आये थे और पीड़ितों को पांच पांच लाख रूपये की राशि और एक परिजन को सरकारी नौकरी प्रदान कर दी गयी थी| जबकि उस समय उच्चतम न्यायालय ने मुजफ्फरनगर दंगा पीडितों से संबंधित मुआवजे की नीति में भेदभाव को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार भी लगाई थी किन्तु जब धार्मिक टकराव अपने चरम पर होता है तो जातिवाद नहीं चलता। शायद इसी का नतीजा सपा को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था|

दादरी के अख़लाक़ हत्याकांड से कौन परिचित नहीं है जिसमे उसके परिजनों को मुआवजा देने की एक राजनैतिक होड़ सी मची थी| जिसमे सरकार की ओर से मुआवजा राशि को रातों रात बीस लाख से बढाकर पेंतालिस लाख कर दिया गया था| साथ ही अखलाक के परिजनों को फ्लेट देने की घोषणा भी उसी दौरान कर दी गयी थी| किन्तु इसके बाद सोनभद्र में कुछ मजदुर मारे गए थे तब मजदूरों के परिवारों को सिर्फ दो-दो लाख रुपए की सहायता राशि दी गयी थी| यहाँ भी समाजवाद धर्म और राजनीति के बीच में खड़ा मानवता की अनदेखी कर रहा था| यदि इस संदर्भ में बात की जाये तो हमारे देश में राजनेताओं के द्वारा सामाजिक धार्मिक समरसता के गीत सुनाई देते है हमेशा सभी पंथो के लोगों को भाई भाई बताया जाता है| किन्तु जब कोई हिंसा या कोई दंगा होता है तो सरकारी और राजनैतिक मापदंड में दोहरापन दिखाई दे जाता है| जब सबके लिए कानून एक है, सविधान एक है, जब सब समान है तो मुआवजा राशि में भेदभाव क्यों? राजीव चौधरी