एक बार फिर अमरीका के ऑरलैंडो शहर में एक आतंकी ने
गोलाबारी कर करीब 50 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया| करीब इतने ही घायल
है जिन्हें में जिन्दा नहीं समझता क्योंकि हमलावर का इरादा उन्हें जिन्दा छोड़ना
कतई नहीं था वो तो उनकी किस्मत ने उन्हें बचा लिया गया|
अब लाशों की गिनती कर हमले को छोटा बड़ा बताकर मूल्याकन किया जायेगा| किन्तु लोगों के
मन में जितनी सवेदना मरने वाले लोगों के प्रति दिख रही है, उससे ज्यादा सहानुभूति
तो मुझे आतंकी के प्रति दिखाई दे रही है| आखिर किस आधार पर एक हत्यारी मानसिकता को
यह कहकर क्लीनचिट दी जा रही है कि हत्यारा पागल सनकी था| यदि वो पागल या सनकी था
तो उसने सउदी अरब, के किसी शेख के होटल पर हमला क्यों नहीं किया? आतंक की इस हत्यारी
मानसिकता का सहानुभूतिपूर्ण बचाव क्यों? जबकि
गोलीबारी करने वाले आतंकी उमर मतीन के
पिता सादिक़ मीर मतीन ठीक कह रहे है कि मतीन के दिल में इतनी नफरत भरी हुई थी, इसका उन्हें कोई
अंदाज़ा नहीं था| किसी गलत या सही काम की सजा इन्सान नही ऊपर वाला तय करता है
ख़ुदा नौजवानों को इस्लाम के सच्चे सिद्धांतों को समझने में मदद करें|
शायद सादिक़ मीर मतीन सही कह रहे है लड़ाई आतंक के बजाय इस अन्दर की
नफरत से लड़नी होगी| जब तक इस नफरत का दमन नहीं होगा तब तक आतंक को खत्म नहीं किया
जा सकता| नफरत भरे दिल हर रोज किसी कसाब, मतीन, लादेन को जन्म देते रहेंगे| लेकिन
प्रश्न भी हमेशा यहीं पर अटकता है कि आखिर यह नफरत आई कहाँ से? कैसे हर आतंकी हमले
के बाद यह कहा जाता है कि वो तो बड़ा अच्छा नेक लड़का था पता नहीं यह सब क्यों
किया!! क्यों करते है ऐसा एक बार इस विषय पर गंभीरता से सबको सोचना होगा| क्यों एक
दुसरे कि संस्कृति, सभ्यता, उनका सामाजिक परिवेश को निशाना बनाया जाता है| कहीं इस
लिए तो नहीं कि हर एक धर्म-ग्रन्थ यह कहता है मै ही श्रेष्ठ हूँ बाकि अन्य नहीं?
पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने
कहा था कि “आतंकी संगठन खुद को सही बताने के लिए बेचैन
हैं। वे स्वयं को धार्मिक नेताओं और इस्लाम की रक्षा
करने वाले पवित्र योद्धाओं के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं।“ कट्टरपंथी इस्लाम से बाहर के लोगों को
आतंकवादियों की इस बात को खारिज करने की आवश्यकता है कि पश्चिम एवं
इस्लाम या आधुनिक जीवन या अन्य धर्मो की जीवनशैली इस्लाम के परस्पर विरोधी हैं। ऐसा भी नहीं हो सकता कि पुरे
विश्व के सात अरब से ज्यादा लोगों का खान-पान रहन-सहन या उनकी सामाजिक आर्थिक
जीवनशैली कुछ आतंकी समूह द्वारा संचालित की जाएगी| ओबामा ने कहा था इसीलिए आईएसआईएस
स्वयं को इस्लामिक स्टेट कहता है और दुष्प्रचार करता
है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की लड़ाई इस्लाम से है। इसी तरह वे लोगों
को अपने संगठन में शामिल करते हैं। इसी तरह वे युवाओं को कट्टर बनाने की
कोशिश करते हैं।
हिंसक कट्टरपंथ जिसे यूएस की एक ब्लागर
लेखक पामेला जेलर ने रेडिकल इस्लाम का नाम दिया है आज इसके खिलाफ आवाज उठाने की
आवश्यकता है। इस काम
को कोई और नहीं बल्कि खुद उदारवादी मुस्लिम समुदाय को करना होगा| जब तक यह काम कोई
और करेगा इसे हमेशा धर्म या सम्प्रदाय के टकराव का नाम दिया जाता रहेगा| इससे आंतक
कमजोर होने के बजाय और मजबूत होता चला जायेगा| जब भी आतंक के खिलाफ अमेरिका, रूस,
फ्रांस आदि देश खड़े होते है तो इसे मानवता- दानवता के तराजू में न रखकर बड़ी चालाकी
से धार्मिक टकराव घोषित कर दिया जाता है| मुस्लिमो को इस भूल से बाहर आना होगा कि
आंतकी संगठन इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे कुछ ऐसे पागल लोगों का
प्रतिनिधित्व करते हैं जो ईश्वर के नाम पर लोगों की हत्या करते है। आतंकवाद के लिए कोई धर्म जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए रेडिकल
मानसिकता के लोग जिम्मेदार हैं| ओबामा ने अपने भाषण में कहा था कि प्रत्येक
व्यक्ति को बहुत स्पष्ट रूप से यह कहना होगा कि
भले ही पीडित कोई भी हो, निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा इस्लाम या मुसलमानों की रक्षा नहीं करती, यह इस्लाम और
मुसलमानों को नुकसान पहुंचाती है। उदारवादी
मुस्लिम जगत को सोचना होगा कि जब मात्र हजारों की संख्या में बचे पारसी समुदाय को किसी
से कोई खतरा नहीं, बोद्ध समुदाय को किसी से कोई खतरा नहीं तो करोड़ों, अरब से
ज्यादा करीब 56 देशों के मालिक मुस्लिमों के इस्लाम पर ही खतरा क्यों? आखिर क्यों
कुछ लोग यह कहने को मजबूर हुए कि मुस्लिमों से विश्व को खतरा है?........लेख राजीव चौधरी





