जब देश के सविंधान
में सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है| सभी धर्मो का बराबर सम्मान है|
कानून लोगों को एक नजर से देखने वाला बताया जाता है तो फिर किसी हिंसा या
शहादत ke मामले में राजनैतिक या सरकारी स्तर पर मिलने वाली मुआवजा राशि में
भेदभाव क्यों? यदि उत्तर प्रदेश सरकार के समाजवाद पर ही बात की जाये तो,
पार्टी के नाम और काम में काफी अंतर दिखाई देता है| अक्सर देखने पढने में
समाजवाद बहुत अच्छा शब्द लगता है, कि सभी के लिए हित बराबर सभी के लिए
अवसर बराबर सभी एक जैसे देखे जायेंगे कौन बड़ा कौन छोटा कोई लेना देना
नहीं, यानी एक ही नजर से देखे जाना इस समाजवाद शब्द का अर्थ समझ में आता
था| किन्तु उत्तरप्रदेश सरकार का समाजवाद आजकल बिलकुल भिन्न दिखाई देता है|
यहाँ सरकार लोगों को क्षेत्र, जाति और धर्म में बांटकर दिखाई सी देती नजर
आती है| जिसके कुछ उदहारण भी लोगों के सामने है|
मथुरा की घटना में अखिलेश
यादव द्वारा शहीद हुए थानाध्यक्ष संतोष कुमार के परिजनों को बीस लाख के
मुवावजे की घोषणा कर दी जोकि एक राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा सवेंदना के
नाते उठाया गया स्वागत योग्य है| किन्तु मेरा हमेशा कहना है कि हिंसा कहीं
भी हो, किसी भी रूप में हो, गरीब मरे या अमीर सबके परिजनों के आंसू दर्द
समान होता है| मामला चाहे धर्म का हो या जातिगत किन्तु मरता हमेशा मनुष्य
है| पूजा, उपासना धर्म में कुछ अंतर हो सकता है, किन्तु हमारे मानवीय
संवेदना में अंतर नहीं होना चाहिए| किन्तु सरकारों की ओर से कुछ और ही होता
आया है| सब जानते है प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में मारे गए डी.एस.पी. जिया
उल हक की पत्नी परवीन और पिता शम्सुल हक को 25-25 लाख रुपये के चेक सौंपे
थे और परिवार के पांच सदस्यों को योग्यता के अनुसार नौकरी का आश्वासन दिया
था। पांच के उलट जिया उल हक की बीबी परवीन ने नौकरी के लिए आठ लोगों की
सूची शासन को भेजी थी, जिसमें से सात उसके मायके के सदस्य थे| किन्तु इसके
कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ही मेरठ में एक
युवती के साथ बदमाशों द्वारा दुव्र्यवहार की घटना में उनसे मोर्चा लेने के
दौरान शहीद फौजी वेदमित्र चौधरी के परिजनों को 10 लाख रुपए की आर्थिक
सहायता देने की घोषणा थी क्या यही समाजवाद था ? हो सकता है यहाँ सरकार के
समाजवाद के चश्में का नम्बर बदल गया हो! कि एक को 50 लाख दुसरे को 10 लाख| मतलब की एक किस्म से मरने के बाद जैसे लाशों की कीमत सी लगती है|
सीओ जियाउल-हक की मौत के बाद,
इंस्पेक्टर अनिल कुमार की हत्या पर सीएम अखिलेश ने उन्हें 20 लाख का
मुआवजा दिया था जो एक बार फिर समाजवाद की द्रष्टि पर ऊँगली उठा रहा था|
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वहां पर पीड़ितों को मुआवजे देने में धार्मिक भेदभाव
का आरोप भी सपा सरकार पर लगता रहा था| यदि सरकार उस समय सर्वधर्म समरसता
का रास्ता अपनाती तो हो सकता था कि मुस्लिमों को लगता कि उनके साथ भेदभाव
हो रहा है। लिहाजा मुलायम खुलकर मुसलमानों के पक्ष में नजर आये थे और
पीड़ितों को पांच पांच लाख रूपये की राशि और एक परिजन को सरकारी नौकरी
प्रदान कर दी गयी थी| जबकि उस समय उच्चतम न्यायालय ने मुजफ्फरनगर दंगा
पीडितों से संबंधित मुआवजे की नीति में भेदभाव को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार
को कड़ी फटकार भी लगाई थी किन्तु जब धार्मिक टकराव अपने चरम पर होता है तो
जातिवाद नहीं चलता। शायद इसी का नतीजा सपा को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा
था|
दादरी के अख़लाक़ हत्याकांड से कौन परिचित नहीं है जिसमे उसके परिजनों को मुआवजा देने की एक राजनैतिक होड़ सी मची थी| जिसमे सरकार की ओर से मुआवजा राशि को रातों रात बीस लाख से बढाकर पेंतालिस लाख कर दिया गया था| साथ ही अखलाक के परिजनों को फ्लेट देने की घोषणा भी उसी दौरान कर दी गयी थी| किन्तु इसके बाद सोनभद्र में कुछ मजदुर मारे गए थे तब मजदूरों के परिवारों को सिर्फ दो-दो लाख रुपए की सहायता राशि दी गयी थी| यहाँ भी समाजवाद धर्म और राजनीति के बीच में खड़ा मानवता की अनदेखी कर रहा था| यदि इस संदर्भ में बात की जाये तो हमारे देश में राजनेताओं के द्वारा सामाजिक धार्मिक समरसता के गीत सुनाई देते है हमेशा सभी पंथो के लोगों को भाई भाई बताया जाता है| किन्तु जब कोई हिंसा या कोई दंगा होता है तो सरकारी और राजनैतिक मापदंड में दोहरापन दिखाई दे जाता है| जब सबके लिए कानून एक है, सविधान एक है, जब सब समान है तो मुआवजा राशि में भेदभाव क्यों? राजीव चौधरी



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