यदि बात इतिहास से सीखने की आये तो नारी के शोषण के अलावा कोई क्या सीख सकता है? हर एक पन्ना
स्त्री के नरम नाजुक मन के खरोंचता सा दिखाई देता है| अब जिसे सच से मुंह छिपाना हो वो धार्मिक ग्रंथो के कम्बल में घुस सकता है| शायद आज गाय को माता, गंगा को मैया और नारी को देवी का रूप बताकर आकाश गुंजा देने वाले लोग शायद लेख
पढ़कर बाद में थोडा निराश हो| क्योकि गंगा को नाला बनाना वाले और गाय को सड़कों पर
कचरा खाने को मजबूर करने वाले लोग ही नारी को देवी लक्ष्मी जैसे शब्दों से अलंकृत
करते है| इसके बाद भी परिणाम क्या आया
यहीं ना कि छोटे गाँव से लेकर मेट्रो शहरों तक आज वासना के तन्दुरों में नारी को
भुना जा रहा है| कहते है नर हमेशा से नारी का पथप्रदर्शक रहा लेकिन लेकर कहाँ गया,
बिस्तर पर या कहीं ओर? या एक दुसरे से उसे
छीनने का इतिहास बना डाला और खुद को वीर घोषित कर डाला| जो राजा शोषण के लिए
ज्यादा दासी दान करता था वो उसको धनवान और जो युद्ध में अधिक संख्या में नारी हरण करता
था उसे वीर कहा जाता रहा है| आज पुरे इतिहास में यदि एक दो वाकये छोड़ दिए जाये तो
मुझे कहीं भी पुरुष की वीरता का किस्सा दिखाई नहीं देता हाँ हर एक पन्ना उसकी
वासना को जरुर चित्रित कर देता प्रतीत होता है|
कहाँ
से पढ़े सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय से! कि कैसे अपनी विशाल फौज के बल पर
संयोगिता को उठा लाया था| क्या यह वीरता था या वासना? कैसे मोहम्मद बिन कासिम ने
राजा दाहिर की बेटियों को पाने के लिए सिंध में किस तरह लाखों मासूमों का खून
बहाया था, क्या वो भी वीरता थी| भागमल की बेटी जोधाबाई को अपनी हवस के लिए ले जाने
वाला अकबर को भी सम्राट लिखा गया? शायद ये इतिहास नया है.. अवधारणाओं की अगली कड़ी
में लेखक संपादक रहे राजीव मित्तल सही कहते है किन्हीं सावित्री, सीता,
शकुन्तला, राधा, जैसे चरित्र हैं, जिनका घनघोर पतिव्रता चरित्र चौखटे में
फिट कर घर-घर लटका दिया गया और नारी को कहा गया देखो तुम्हारा नाम कोई भी हो, लेकिन तुम्हें बनना इन जैसा ही है,
अगर तुम जरा भी इधर उधर हुई तो कुलटा,
चरित्रहीन कहलाई जाओगी| शादी करके सबसे
ज्यादा दुर्दशा द्रोपदी की हुई जैसे जैसे वह नारी नहीं साझे का हुक्का हो, कि जिसने चाहा गुड़गुड़ा दिया। तभी तो
कर्ण ने भरी सभा में कहा था कि पांचाली धर्मपत्नी नहीं, पांचों की रखेल है। और द्रोपदी का अपमान दुशासन ने तो बाद में
किया, आहुति तो युधिष्ठिर
ने ही डाली थी, जिन्होंने पत्नी की देह का
विज्ञापन करते हुए उसे दांव पर चढ़ा दिया कि मेरी पत्नी न नाटी है, न बहुत लम्बी है, न दुबली-पतली है, न बहुत मोटी है, उसके काले-काले घुंघराले बाल हैं। मैं उसी को पासे पर
चढ़ा रहा हूं।दांव हार जाने के बाद दुशासन ने द्रोपदी का चीरहरण शुरू किया। लेकिन
पांडव चुपचाप
सभा में सिर झुकाए बठे रहे|
पुरुष
के चरित्र का कोई मापदंड नारी के पास नहीं है हाँ नारी चरित्र के सब सर्वाधिकार
पुरुष समाज ने अपने पास जरुर रखे है। गौतम ऋषि की पत्नी आहिल्या की क्या गलती
थी? बलात्कार की शिकार होकर पत्थर बन जाना पड़ा| शायद इसके बाद वो किसी से बोलती ना
हो और लोग उसे पत्थर कहने लगे हो|
ऐसी
कामवासना का गरिमामय लेखन और किसी देश के इतिहास में मिलेगा! याज्ञवल्क्य ने शास्त्रार्थ में गार्गी
के प्रश्नों से घबरा कर धमकी दे डाली थी कि अब ज्यादा पूछोगी तो
तुम्हारी गर्दन कट कर गिर पड़ेगी। राजा दुष्यंत ने कुंवारी मुनिकन्या मेनका की
बेटी शकुंतला को दूषित कर दिया और फिर पहचानने से भी इनकार कर दिया।
मुझे
तो अक्सर यही लगता है कि स्वंय राम ने सीता के प्रति सबसे ज्यादा अन्याय किया है। इतना
पाखंड तो रावण ने भी नहीं किया। राम ने कभी यह नहीं जानना चाहा कि रावण ने सीता से
जोरजबरदस्ती की भी थी या नहीं, सिर्फ
शक की बुनियाद
पर राम ने सीता पर दोषारोपण कर दिया। परीक्षा देने से सीता ने मरना बेहतर समझा और वह
धरती में समा गयीं। अन्यथा जीवन भर जिल्लत झेलतीं। सीता को मुक्ति दी धरती ने। किसी पुरुष ने
उन्हें आश्रय नहीं दिया। बात सिर्फ भारत के इतिहास की नहीं है| बात पुरे विश्व के
इतिहास की है| यूरोप तो 16 सदी तक नारी को आत्माविहीन समझता रहा|
यदि अब आज के
हालात देखे तो औरत की अस्मिता को लेकर तसलीमा ने कुरान पर कुछ सवाल खड़े किये तो
मुल्ला-मौलवियों ने उनकी मौत का फतवा जारी कर दिया। तस्लीमा कहती हैं जड़वादी सोच का एक
प्रमाण यह भी है
कि " अल्लाह
ने स्त्रियो पर पर्दे का कानून लागू किया है " अर्थात उन्हें सामाजिक जीवन में भाग
नहीं लेना चाहिए ‘‘ और
ईमान वाली स्त्रियों से कहा कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी
शर्मगाहों ( गुप्त इंद्रियों ) की रक्षा करें और अपना श्रृंगार न दिखांए
सिवाय उसके जो जाहिर रहे और अपने सीनों ( वक्ष स्थल ) पर अपनी ओढ़नियों
के आंचल डाले रहें और वे अपने श्रृंगार किसी पर जाहिर न केवल नारी के सतीतत्व को लेकर इतना शोरगुल है,
सती शब्द का कोई पुल्लिंग विलोम क्यों
नहीं है?..........Rajeev choudhary


BEST Analogy Seen So Far. I have same ideologies as yours.
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