उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 में भले
ही हो लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव का मानसून अभी दस्तक दे रहा है| हर
बार की तरह इस बार भी राजनैतिक द्रष्टिकोण से सबकी नजरे छोटे चौधरी अजीत सिंह पर
टिकी है| हालाँकि अब यह तस्वीर बहुत हद तक साफ़ हो चुकी हैं कि चुनाव में जो कुछ भी परिणाम
निकले वो ऐतिहासिक ही होगा| किन्तु फिर भी राष्ट्रीय
लोकदल के कार्यकर्ताओं के मन में एक अजीब डर इस बार भी व्याप्त है कि अपनी जिन्दगी
के 75 साल जी चुके अजीत सिंह कहीं फिर से कोई बचकाना फैसला ना ले बैठे! हालाँकि
लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित हुई पार्टी अभी तक जनता के सामने अपना कोई ठोस
एजेंडा नही रख पाई जिस कारण पार्टी अभी भी हमेशा की तरह अफवाहों पर चल रही है|
जहाँ पहले पार्टी हरित प्रदेश हाईकोर्ट जैसे मुद्दों पर वोट मांगती नजर आती थी अब
वही पार्टी के लोग अपनी कमजोरी छिपाने के लिए प्रदेश की बदहाल स्थिति के लिए सपा,
बसपा नजरंदाज कर सीधा केंद्र सरकार को निशाना पर लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों,
विदेश नीति पर या फिर सीधा मोदी ने क्या किया जैसे शब्दों से अपनी नाकामी छिपाते
नजर आते है|
इसे रालोद की कमजोरी
क्यों कहा गया इसके पीछे भी एक कारण है
दरअसल किसान मसीहा चौधरी चरणसिंह जी के बाद बिना जातिवाद का बिगुल बजाये कोई नेता
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दस्तक नहीं दे पाया किन्तु 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद
इस फेहरिस्त में मुजफ्फरनगर से सांसद और केंद्र में कृषि राज्यमंत्री के पद पर
आसीन डॉ संजीव बालियान को बिना वक़्त गवाएं जातिवाद के धब्बे से
मुक्त एक कुशल राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्ति के साथ वेस्ट यूपी की अस्त राजनीति में एक चमकते सितारे के तौर देखा जा रहा है|
जिसे सालों से अजीत सिंह की राजनैतिक सेवा कर रहे लोग शायद बर्दाश्त नहीं कर पा
रहे है! अबकी बार जयंत सरकार, या किसान मर रहा मोदी को सुध नहीं है आदि आदि
मुर्खता पूर्ण व् बचकाने नारे लेकर नजर आ रहे है| क्या मै इसे हताशा की राजनीति कह
सकता हूँ? वर्षो तक सत्ता में रहने वाला दल रालोद आज गठबंधन के लिए भटक रहा एक किस्म
से यदि इस बार रालोद का किसी पार्टी के साथ गठबंधन नही होता तो पार्टी कोई बड़ा
कमाल न करते सिर्फ सवेंदना में मिले वोटों पर ही आश्रित होकर रह जाएगी|
विकल्प के तौर पर संजीव बालियान
उत्तरप्रदेश को भारत
की राजनीति का सबसे दुर्गम किला समझा जाता है क्योंकि यहाँ की राजनीति से विकास,
रोजगार, मौलिक सुविधा आदि जैसे मुद्दे हवा होकर या सीधा जातिवाद से संबधित हो जाते
है या फिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बन जाते है| जिस कारण एक बार फिर मायावती से
लेकर सपा सरकार तक की नज़र उत्तर प्रदेश के उन करीब 21 फ़ीसदी मुसलमानों पर है, जिनके समर्थन से वह सत्ता का स्वाद चखते
है हर बार की तरह इस बार भी यह दोनों पार्टी 17 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत पक्की करने की जुगत लगा रहे हैं|
इस कड़ी में इस बार एक प्रश्न फिर उठ रहा है कि
आखिर इन चुनाव में भाजपा का मुख्यमंत्री कौन होगा वैसे भाजपा के पास देखा जाये तो
उत्तरप्रदेश में नेताओं की कोई कमी नहीं है 73 विजेता सांसदों के साथ योगी आदित्यनाथ
वरुण गाँधी जैसे दिग्गज नेता की कड़ी में आज यदि संजीव बालियान का नाम जोड़ा जाये तो
कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए| आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने रालोद का विकल्प
संजीव बालियान के रूप में तलाश कर लिया है| क्योकि कई मौकों पर संजीव बालियान ने
साबित किया कि वो जमीन से जुड़े नेता के साथ एक कुशल राजनैतिक रणनीतिकार भी है| वो
हर छोटे बड़े कार्यकर्ताओ से जिस साधारण ढंग व् शालीनता से मिलते है वो अपने आप में
एक शानदार व्यवहार कहा जा सकता है| पार्टी ने अब तक बालियान को जो छोटी लड़ाई सौपी
उन्हें जीतकर उन्होंने दिखा दिया कि वें 2017 का युद्ध लड़कर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े
राज्य की कमान सँभालने की योग्यता भी रखते है| आज उत्तर प्रदेश को जातिवाद व्
परिवारवाद समाजवाद कहो या बहुजनसमाजवाद से ऊपर उठकर केवल विकास की राजनीति पर
ध्यान देना होगा वरना अगली नस्ल जब हमसे हमारे वोट की कीमत पूछेगी तो शायद हम जबाब
ना दे पाए| राजीव चौधरी




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