कनॉट प्लेस को दिल्ली का दिल कहा जाता है| भले ही कनॉट प्लेस को दिल्ली के सबसे बड़े वाणिज्यिक और व्यापारिक केंद्रों में से एक माना जाता
हो, पर बिना किसी ना नकुर के हर कोई यह भी स्वीकार कर लेगा कि भीख का एक बहुत बड़ा
कारोबार भी यहीं पर होता है| मंगलवार का दिन हो और आप
हनुमान मंदिर के आस पास से गुजर रहे हो अचानक गंदे मेले कपड़ों में लिपटा जर्जर शरीर,
उस पर कई जगह नई पट्टियाँ बंधी हो, हाथ में कुछ चिल्लर लिए एक दम आपके कदमो में से
आवाज़ आये ऊपर वाले के नाम पर कुछ दे दो बाबू जी। तो निसंकोच समझ जाईये कि कोई भिखारी है|
किन्तु भीख देते समय सोचना जरुर कहीं आप दान की आड़ में नशे को बढ़ावा तो नहीं दे
रहे है!!
बात हो रही है
भिखारियों की, जो देश के हर शहर में सामाजिक बुराई बनकर सामने आ खड़े हुए हैं। गरीबी और बेरोजगारी की समस्या के साथसाथ भारत जैसे विकाशसील देश के लिए भिखारियों की एक बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी है। देश का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा होगा जहां भिखारी न
हों। पिछले दिनों एक बेहद चौकाने वाली खबर पढ़ी कि जिस्म के कारोबार में उमरदराज उन महिलाओं से जो ग्राहकों के आकर्षण पैदा नहीं कर सकती अधिकतर को अंग भंग कर भीख के कारोबार में धकेल दिया जाता है| मसलन जब तक साँस है कमाकर देना है| लेकिन सबके साथ ऐसा कहाँ होता है कुछ भिखारी तो नशे और अपनी मौज मस्ती के लिए भीख मांगते है| कई साल पहले कनॉट प्लेस थाना पुलिस ने एक ड्रग्स तस्कर को गिरफ्तार किया है। उसके पास से ड्रग्स की 103 पुडिय़ा बरामद हुईं थी। पूछताछ में उसने बताया कि वह हनुमान मंदिर के पास बेघर लोगों और भिखारियों को ड्रग्स बेचता था। हालाँकि
यहाँ पूजा, पाठ आरती भंडारे आदि को मंदिरों की शान समझा जाता है तो यहीं हाथ फेलाए
फटे कपड़ों में भीख मांगते छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े गरीब निर्धन लोगों को भी
देखा जा सकता है| मंदिर के सामने झोली फेलाए भक्त खड़े है तो उन भक्तो के सामने हाथ
फैलाये भिखारी भी खड़े आसानी से देखे जा सकते है| क्या इस समुदाय में पैदा होने वाले
बच्चे के नसीब में भीख मांगना ही लिखा है? उसके पैदा होते ही ये तय हो जाता है कि वो आगे चलकर
सिर्फ और सिर्फ भिखारी ही बनेगा। अपने माँ बाप का दैनिक जीवन और जमाने की मौजूदा रफ्तार की अनदेखी
इन्हें इससे आगे सोचने भी नहीं देती। ऐसे समुदाय अपने नसीब को ईश्वरीय देन मानकर उसी पेशे से जुड़े रहते हैं।
हनुमान मंदिर के बाजू में मोहनसिंह पैलेस के
सामने बैठे भिखारी परिवारों में दो बुढिया
सगी बहन है इन दोनों का पूरा परिवार नशे का आदी है| रिवोली सिनेमा के पास बने
भूमिगत पैदल पार पथ के पास शाम को नशे हालत में अपने बेटे को जमीन पर लिटाकर आने
जाने वालों के सामने भीख मांगती देखी जा सकती है| हर किसी को सुनने को मिल जाता है कि इसे भीख मत दो , नहीं तो यह शाम को जाकर शराब या भांग पिएगा और यह बात सच भी है। नशे के आदी लोगों को जब नशे के लिए पर्याप्त धन नहीं मिलता तो वह गलत तरीकों को अपना लेते हैं। इस टाइप के लोग या तो चोरी करने लगते हैं या फिर भीख मांगकर अपने नशे की लत को पूरा करते हैं। आजकल भीख मांगना केवल पेट पालने तक नहीं रह गया
है। भीख मांगना अब कारोबार का रूप ले चुका है। आंकड़े के अनुसार राजधानी में लगभग 60 हजार के करीब भिखारी हैं। इनमें से 30 प्रतिशत की उम्र 18 वर्ष से कम है। लगभग 67 प्रतिशत पुरुष और 30 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेकिन गैरसरकारी संगठनों का
कहना है कि राजधानी में भिखारियों की संख्या एक लाख से अधिक है। जिनमे से करीब 75 फीसदी भिखारी नशे के लिए भीख मांगते पाए जाते
है| भीख ना मिलने पर कई बार नशे की लत के कारण यह लोग अपराध को भी अंजाम देने से
नहीं चुकते|
मानवाधिकार आयोग, बालश्रम आयोग, यूनिसेफ जैसी दर्जनों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं मिलकर भी इस अमानवीय उद्योग में कोई खास रोक नहीं लगा पा रही। हर बात पे हो हल्ला मचाने वाला मानवाधिकार आयोग रोज हो रहे इन बच्चों के मानवधिकारों के हनन पर चुप रहता है। बात-बात में झंडा ले
कर खड़ा होने वाले सफेदपोश नेता उसी ट्रैफिक सिग्नल से अपनी मर्सिडीज से गुजर जाते हैं जिस ट्रेफिक सिग्नल पर ये भिखारी हर आते जाते लोगों के सामने गिडगिडाकर
भीख मांगते है| मंगलवार हो तो हनुमान मन्दिर, गुरुवार हो तो साईं मन्दिर, शुक्रवार हो तो मस्जिद और शनिवार को शनि मन्दिर के आस पास भीख मांगने वालो की भारी तादात देखने को मिल
जाएगी| लोग इनकी हालत देखकर इस डर की वजह से भी भीख दे देते ताकि उनके ऊपर ऐसी कोई
विपत्ति ना आये| किन्तु यह कभी नहीं सोचते की जो दान स्वरूप धन हम इन लोगों को
बाँट रहे है वो इनका पेट पालने के बजाय इनके नशे की लत की पूर्ति कर रहे है| एक
स्वास्थ समाज में दान जहाँ धर्म की स्थापना करता है वही इनको मिला दान बेकारो
बेरोजगारों नशे के सौदागरों की भीड़ जमा करता दिखाई देता है| लेख राजीव चौधरी



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