Tuesday, 24 May 2016

पिता के नाम पर गठबंधन की आस!!



भले ही देश का किसान सूखे की मार झेल रहा हो पर अजीत सिंह की रालोद पार्टी भी गठबंधन की प्यास में राजनैतिक कुओं की तलाश में दरबदर भटक रही है लोकसभा चुनाव में कुल 5 लाख वोट पाकर 2 सीटों पर अपनी जमानत बचाने वाला दल राष्ट्रीय लोकदल को कौन नजरअंदाज कर सकता है| लगभग सभी दलों के गठबंधन कर बरसो से सत्ता सुख भोगने वाला वाला दल आज फिर गठबंधन की आस में अपनी नजरें गडायें बैठा है| इस प्रसंग में एक बात बताना चाहूँगा कि मेरा जन्म बागपत जिले में हुआ जिसकी कमान कभी स्वर्गीय चौधरी चरणसिंह जैसे जमीन से जुड़े नेता के हाथों में हुआ करती थी| किन्तु बाद में लोगों ने भावुकतावश इसे चौधरी अजीत सिंह की विरासत बना दी|पूरा देश जानता है कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह जी इस देश के किसान मजदुर और राजनीति को कितना कुछ दिया जो चंद शब्दों में बयाँ नहीं हो सकता लेकिन उनकी विरासत पुत्र से यदि प्रश्न करे तो उत्तर न्यून पाया जायेगा| यदि बात इस पार्टी के कार्यकर्ताओं की करें तो किसी दिन ये लोग जाटवाद का परचम तो किसी दिन सेकुलरता का चौला ओढ़े मिलेंगे| किसी प्रसंग में पाकिस्तान का जाट समुदाय भी इनका भाई हो जाता है किन्तु जब बात अपने नेता के चुनाव हारने की आती है तो ये लोग फिल्म अभिनेता सन्नी देओल जो कि खुद जाति से जाट है उसपर भी पत्थर बरसाने से नहीं हिचकते|

पिछले कुछ सालों में इस पार्टी को लेकर लोगों की विचारधारा बदली और उन्होंने इसे एक राजनैतिक दल मानने के बजाय एक संगठन मानने को मजबूर हो गये| कारण इस संगठन के पास न कोई राजनैतिक विचारधारा न कोई विकासवाद का नजरिया| युवाओं के लिए रोजगार किसानों के लिए आर्थिक नीति जो जैसे इनके एजेंडे से बाहर की चीज है| यदि कुछ है तो सिर्फ एक भय जो ये लोग पैदा करके बरसों से वोट बटोरते आये है|  
2017 के चुनाव में अभी किसी दल से गठबंधन ना होने की सूरत में आजकल फेसबुक पर रालोद के कुछ कार्यकर्ता “अबकी बार जयंत चौधरी की सरकार” का नारा लेकर आये है|


लोग समझ नहीं पा रहे कि आखिर कौन सा समीकरण है जो 10 या 12 सीट पर मुख्यमंत्री बना दे या फिर हो सकता है ये लोग कोई तंत्रमन्त्र क्रिया सीखकर आयें हो!! खेर  नारे लगाने से क्षेत्र की हालत नहीं सुलझेगी उसके लिए कार्य करने होते है| 2012 में 9 विधानसभा और 2009  5 लोकसभा सीट लेकर जो पार्टी हरित प्रदेश या हाइकोर्ट बेंच तो दूर की बात बागपत में एक बस स्टॉप नहीं बनवा सकी, उससे एक अलग प्रदेश बनवाने की अपेक्षा रखना भाले से चींटी का सर काटने जैसा है|  बहरहाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्य का सबसे संपन्न क्षेत्र है। यहाँ मुस्लिम, दलित, राजपूत, जाट, गुजर, त्यागी, सैनी  आदि की बहुलता है।  यही लोग यहाँ की राजनीति की दिशा निर्धारित करते हैं। पश्चिमी यूपी में 30% मुस्लिम और 70% हिन्दू संख्या है अब यदि रालोद के नेटवीर और गलियों के मोखिक संवादाता 6% कुल जाट आबादी के भरोसे 40 सीट का सपना पाले है तो यह उनका सबसे बड़ा भ्रम होगा क्योंकि मुस्लिम आबादी के बाद 25% दलित समुदाय है और करीब 7 -7 फीसदी राजपूत और यादव है 25% अन्य जातीय भी है जिसे भाजपा का वोट बेंक कहा जाता है| 
 अब अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश अलग से हरित प्रदेश बनता है तो----और जातिगत मुद्दे लेकर लोग अपनी संप्रभुता को  सफल करना चाहते हो तो में बता दूँ सर्वाधिक लाभ की स्थिति में मुस्लिम समाज होगा जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत कम हैं ,दलित मुस्लिम समीकरण बन गया तो यहाँ किसी और का जीतना असम्भव होगा,राजपूतो की स्थिति यथावत रहेगी,जाट और गुर्जर भी मुस्लिम या दलित किसी एक पक्ष में जाकर ही सफल हो सकते हैं अन्यथा नहीं, इसके विपरीत यदि लोग विकास चाहते है तो सन 1952 व्र्हत दिल्ली का वो मसौदा दिल्ली विधानसभा में अटका पड़ा है जो दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधरी ब्रहम प्रकाश ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु को सौपा था जिसे नेहरु ने कुछ समय के लिए टाल दिया था 1955 में गुरमुख निहाल सिंह दिल्ली के मुख्यमंत्री बने किन्तु तक़रीबन पश्चिमी यूपी के 12 जिलों को लेकर व्रहत दिल्ली बनने का  मामला ठंडे बसते में पड़ा रहा 1956 में दिल्ली विधानसभा भंग कर दी गयी और फिर 1993 में चुनाव हुए लेकिन तब तक लोग उस मुद्दे को भूल चुके थे अब यदि लोग खुद का भला चाहते है तो हरित प्रदेश के आंकड़े देखकर समझ सकते है कि उनके विकास का रथ रोज मस्जिद और मंदिर की दीवारों में टकराएगा जबकि दिल्ली से जुड़कर वो देश की राजधानी से जुड़ सकते है| मेरा रालोद के कार्यकर्ताओं से अनुरोध है प्लीज सही राजनीति करें अब लोगों को और भर्मित न करें अपने नेता की जीत के रास्ते की बजाय लाखो किसान मजदूरों  के विकास का रास्ता खोजे
राजीव चौधरी

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