Tuesday, 31 May 2016

वीरता कहाँ? सेक्स का इतिहास कहो!!

यदि बात इतिहास से सीखने की आये तो नारी के शोषण के अलावा कोई क्या सीख सकता है? हर एक पन्ना
स्त्री के नरम नाजुक मन के खरोंचता सा दिखाई देता है| अब जिसे सच से मुंह छिपाना हो वो धार्मिक ग्रंथो के कम्बल में घुस सकता है| शायद आज गाय को माता, गंगा को मैया और नारी को देवी का रूप बताकर आकाश गुंजा देने वाले लोग शायद लेख पढ़कर बाद में थोडा निराश हो| क्योकि गंगा को नाला बनाना वाले और गाय को सड़कों पर कचरा खाने को मजबूर करने वाले लोग ही नारी को देवी लक्ष्मी जैसे शब्दों से अलंकृत करते है|  इसके बाद भी परिणाम क्या आया यहीं ना कि छोटे गाँव से लेकर मेट्रो शहरों तक आज वासना के तन्दुरों में नारी को भुना जा रहा है| कहते है नर हमेशा से नारी का पथप्रदर्शक रहा लेकिन लेकर कहाँ गया, बिस्तर पर या कहीं ओर?  या एक दुसरे से उसे छीनने का इतिहास बना डाला और खुद को वीर घोषित कर डाला| जो राजा शोषण के लिए ज्यादा दासी दान करता था वो उसको धनवान और जो युद्ध में अधिक संख्या में नारी हरण करता था उसे वीर कहा जाता रहा है| आज पुरे इतिहास में यदि एक दो वाकये छोड़ दिए जाये तो मुझे कहीं भी पुरुष की वीरता का किस्सा दिखाई नहीं देता हाँ हर एक पन्ना उसकी वासना को जरुर चित्रित कर देता प्रतीत होता है|
 कहाँ से पढ़े  सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय से! कि कैसे अपनी विशाल फौज के बल पर संयोगिता को उठा लाया था| क्या यह वीरता था या वासना? कैसे मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर की बेटियों को पाने के लिए सिंध में किस तरह लाखों मासूमों का खून बहाया था, क्या वो भी वीरता थी| भागमल की बेटी जोधाबाई को अपनी हवस के लिए ले जाने वाला अकबर को भी सम्राट लिखा गया? शायद ये इतिहास नया है.. अवधारणाओं की अगली कड़ी में लेखक संपादक रहे राजीव मित्तल सही कहते है किन्हीं सावित्री, सीता, शकुन्तला, राधा, जैसे चरित्र हैं, जिनका घनघोर पतिव्रता चरित्र चौखटे में फिट कर घर-घर लटका दिया गया और नारी को कहा गया देखो तुम्हारा नाम कोई भी हो, लेकिन तुम्हें बनना इन जैसा ही है, अगर तुम जरा भी इधर उधर हुई तो कुलटा, चरित्रहीन कहलाई जाओगी| शादी करके सबसे ज्यादा दुर्दशा द्रोपदी की हुई जैसे जैसे वह नारी नहीं साझे का हुक्का हो, कि जिसने चाहा गुड़गुड़ा दिया। तभी तो कर्ण ने भरी सभा में कहा था कि पांचाली धर्मपत्नी नहीं, पांचों की रखेल है। और द्रोपदी का अपमान दुशासन ने तो बाद में किया, आहुति तो युधिष्ठिर ने ही डाली थी, जिन्होंने पत्नी की देह का विज्ञापन करते हुए उसे दांव पर चढ़ा दिया कि मेरी पत्नी न नाटी है, न बहुत लम्बी है, न दुबली-पतली है, न बहुत मोटी है, उसके काले-काले घुंघराले बाल हैं। मैं उसी को पासे पर चढ़ा रहा हूं।दांव हार जाने के बाद दुशासन ने द्रोपदी का चीरहरण शुरू किया। लेकिन पांडव चुपचाप सभा में सिर झुकाए बठे रहे|


पुरुष के चरित्र का कोई मापदंड नारी के पास नहीं है हाँ नारी चरित्र के सब सर्वाधिकार पुरुष समाज ने अपने पास जरुर रखे है। गौतम ऋषि की पत्नी आहिल्या की क्या गलती थी? बलात्कार की शिकार होकर पत्थर बन जाना पड़ा| शायद इसके बाद वो किसी से बोलती ना हो और लोग उसे पत्थर कहने लगे हो| ऐसी कामवासना का गरिमामय लेखन और किसी देश के इतिहास में मिलेगा! याज्ञवल्क्य ने शास्त्रार्थ में गार्गी के प्रश्नों से घबरा कर धमकी दे डाली थी कि अब ज्यादा पूछोगी तो तुम्हारी गर्दन कट कर गिर पड़ेगी। राजा दुष्यंत ने कुंवारी मुनिकन्या मेनका की बेटी शकुंतला को दूषित कर दिया और फिर पहचानने से भी इनकार कर दिया।
मुझे तो अक्सर यही लगता है कि स्वंय राम ने सीता के प्रति सबसे ज्यादा अन्याय किया है। इतना पाखंड तो रावण ने भी नहीं किया। राम ने कभी यह नहीं जानना चाहा कि रावण ने सीता से जोरजबरदस्ती की भी थी या नहीं, सिर्फ शक की बुनियाद पर राम ने सीता पर दोषारोपण कर दिया। परीक्षा देने से सीता ने मरना बेहतर समझा और वह धरती में समा गयीं। अन्यथा जीवन भर जिल्लत झेलतीं। सीता को मुक्ति दी धरती ने। किसी पुरुष ने उन्हें आश्रय नहीं दिया। बात सिर्फ भारत के इतिहास की नहीं है| बात पुरे विश्व के इतिहास की है| यूरोप तो 16 सदी तक नारी को आत्माविहीन समझता रहा|
यदि अब आज के हालात देखे तो औरत की अस्मिता को लेकर तसलीमा ने कुरान पर कुछ सवाल खड़े किये तो मुल्ला-मौलवियों ने उनकी मौत का फतवा जारी कर दिया। तस्लीमा कहती हैं जड़वादी सोच का एक प्रमाण यह भी है कि " अल्लाह ने स्त्रियो पर पर्दे का कानून लागू किया है " अर्थात उन्हें सामाजिक जीवन में भाग नहीं लेना चाहिए ‘‘ और ईमान वाली स्त्रियों से कहा कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों ( गुप्त इंद्रियों ) की रक्षा करें और अपना श्रृंगार न दिखांए सिवाय उसके जो जाहिर रहे और अपने सीनों ( वक्ष स्थल ) पर अपनी ओढ़नियों के आंचल डाले रहें और वे अपने श्रृंगार किसी पर जाहिर न  केवल नारी के सतीतत्व को लेकर इतना शोरगुल है, सती शब्द का कोई पुल्लिंग विलोम क्यों नहीं है?..........Rajeev choudhary

Tuesday, 24 May 2016

पिता के नाम पर गठबंधन की आस!!



भले ही देश का किसान सूखे की मार झेल रहा हो पर अजीत सिंह की रालोद पार्टी भी गठबंधन की प्यास में राजनैतिक कुओं की तलाश में दरबदर भटक रही है लोकसभा चुनाव में कुल 5 लाख वोट पाकर 2 सीटों पर अपनी जमानत बचाने वाला दल राष्ट्रीय लोकदल को कौन नजरअंदाज कर सकता है| लगभग सभी दलों के गठबंधन कर बरसो से सत्ता सुख भोगने वाला वाला दल आज फिर गठबंधन की आस में अपनी नजरें गडायें बैठा है| इस प्रसंग में एक बात बताना चाहूँगा कि मेरा जन्म बागपत जिले में हुआ जिसकी कमान कभी स्वर्गीय चौधरी चरणसिंह जैसे जमीन से जुड़े नेता के हाथों में हुआ करती थी| किन्तु बाद में लोगों ने भावुकतावश इसे चौधरी अजीत सिंह की विरासत बना दी|पूरा देश जानता है कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह जी इस देश के किसान मजदुर और राजनीति को कितना कुछ दिया जो चंद शब्दों में बयाँ नहीं हो सकता लेकिन उनकी विरासत पुत्र से यदि प्रश्न करे तो उत्तर न्यून पाया जायेगा| यदि बात इस पार्टी के कार्यकर्ताओं की करें तो किसी दिन ये लोग जाटवाद का परचम तो किसी दिन सेकुलरता का चौला ओढ़े मिलेंगे| किसी प्रसंग में पाकिस्तान का जाट समुदाय भी इनका भाई हो जाता है किन्तु जब बात अपने नेता के चुनाव हारने की आती है तो ये लोग फिल्म अभिनेता सन्नी देओल जो कि खुद जाति से जाट है उसपर भी पत्थर बरसाने से नहीं हिचकते|

पिछले कुछ सालों में इस पार्टी को लेकर लोगों की विचारधारा बदली और उन्होंने इसे एक राजनैतिक दल मानने के बजाय एक संगठन मानने को मजबूर हो गये| कारण इस संगठन के पास न कोई राजनैतिक विचारधारा न कोई विकासवाद का नजरिया| युवाओं के लिए रोजगार किसानों के लिए आर्थिक नीति जो जैसे इनके एजेंडे से बाहर की चीज है| यदि कुछ है तो सिर्फ एक भय जो ये लोग पैदा करके बरसों से वोट बटोरते आये है|  
2017 के चुनाव में अभी किसी दल से गठबंधन ना होने की सूरत में आजकल फेसबुक पर रालोद के कुछ कार्यकर्ता “अबकी बार जयंत चौधरी की सरकार” का नारा लेकर आये है|


लोग समझ नहीं पा रहे कि आखिर कौन सा समीकरण है जो 10 या 12 सीट पर मुख्यमंत्री बना दे या फिर हो सकता है ये लोग कोई तंत्रमन्त्र क्रिया सीखकर आयें हो!! खेर  नारे लगाने से क्षेत्र की हालत नहीं सुलझेगी उसके लिए कार्य करने होते है| 2012 में 9 विधानसभा और 2009  5 लोकसभा सीट लेकर जो पार्टी हरित प्रदेश या हाइकोर्ट बेंच तो दूर की बात बागपत में एक बस स्टॉप नहीं बनवा सकी, उससे एक अलग प्रदेश बनवाने की अपेक्षा रखना भाले से चींटी का सर काटने जैसा है|  बहरहाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्य का सबसे संपन्न क्षेत्र है। यहाँ मुस्लिम, दलित, राजपूत, जाट, गुजर, त्यागी, सैनी  आदि की बहुलता है।  यही लोग यहाँ की राजनीति की दिशा निर्धारित करते हैं। पश्चिमी यूपी में 30% मुस्लिम और 70% हिन्दू संख्या है अब यदि रालोद के नेटवीर और गलियों के मोखिक संवादाता 6% कुल जाट आबादी के भरोसे 40 सीट का सपना पाले है तो यह उनका सबसे बड़ा भ्रम होगा क्योंकि मुस्लिम आबादी के बाद 25% दलित समुदाय है और करीब 7 -7 फीसदी राजपूत और यादव है 25% अन्य जातीय भी है जिसे भाजपा का वोट बेंक कहा जाता है| 
 अब अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश अलग से हरित प्रदेश बनता है तो----और जातिगत मुद्दे लेकर लोग अपनी संप्रभुता को  सफल करना चाहते हो तो में बता दूँ सर्वाधिक लाभ की स्थिति में मुस्लिम समाज होगा जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत कम हैं ,दलित मुस्लिम समीकरण बन गया तो यहाँ किसी और का जीतना असम्भव होगा,राजपूतो की स्थिति यथावत रहेगी,जाट और गुर्जर भी मुस्लिम या दलित किसी एक पक्ष में जाकर ही सफल हो सकते हैं अन्यथा नहीं, इसके विपरीत यदि लोग विकास चाहते है तो सन 1952 व्र्हत दिल्ली का वो मसौदा दिल्ली विधानसभा में अटका पड़ा है जो दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधरी ब्रहम प्रकाश ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु को सौपा था जिसे नेहरु ने कुछ समय के लिए टाल दिया था 1955 में गुरमुख निहाल सिंह दिल्ली के मुख्यमंत्री बने किन्तु तक़रीबन पश्चिमी यूपी के 12 जिलों को लेकर व्रहत दिल्ली बनने का  मामला ठंडे बसते में पड़ा रहा 1956 में दिल्ली विधानसभा भंग कर दी गयी और फिर 1993 में चुनाव हुए लेकिन तब तक लोग उस मुद्दे को भूल चुके थे अब यदि लोग खुद का भला चाहते है तो हरित प्रदेश के आंकड़े देखकर समझ सकते है कि उनके विकास का रथ रोज मस्जिद और मंदिर की दीवारों में टकराएगा जबकि दिल्ली से जुड़कर वो देश की राजधानी से जुड़ सकते है| मेरा रालोद के कार्यकर्ताओं से अनुरोध है प्लीज सही राजनीति करें अब लोगों को और भर्मित न करें अपने नेता की जीत के रास्ते की बजाय लाखो किसान मजदूरों  के विकास का रास्ता खोजे
राजीव चौधरी

Tuesday, 17 May 2016

भीख या एक बहुत बड़ा कारोबार?


कनॉट प्लेस को दिल्ली का दिल कहा जाता है| भले ही कनॉट प्लेस को दिल्ली के सबसे बड़े वाणिज्यिक और व्यापारिक केंद्रों में से एक माना जाता हो, पर बिना किसी ना नकुर के हर कोई यह भी स्वीकार कर लेगा कि भीख का एक बहुत बड़ा कारोबार भी यहीं पर होता है| मंगलवार का दिन हो और आप हनुमान मंदिर के आस पास से गुजर रहे हो अचानक गंदे मेले कपड़ों में लिपटा जर्जर शरीर, उस पर कई जगह नई पट्टियाँ बंधी हो, हाथ में कुछ चिल्लर लिए एक दम आपके कदमो में से आवाज़ आये ऊपर वाले के नाम पर कुछ दे दो बाबू जी। तो निसंकोच समझ जाईये कि कोई भिखारी है| किन्तु भीख देते समय सोचना जरुर कहीं आप दान की आड़ में नशे को बढ़ावा तो नहीं दे रहे है!!


बात हो रही है भिखारियों की, जो देश के हर शहर में सामाजिक बुराई बनकर सामने आ खड़े हुए हैं। गरीबी और बेरोजगारी की समस्या के साथसाथ भारत जैसे विकाशसील देश के लिए भिखारियों की एक बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी है। देश का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा होगा जहां भिखारी न हों। पिछले दिनों एक बेहद चौकाने वाली खबर पढ़ी कि जिस्म के कारोबार में उमरदराज उन महिलाओं से जो ग्राहकों के  आकर्षण पैदा नहीं कर सकती अधिकतर  को  अंग भंग कर  भीख के कारोबार में धकेल दिया जाता है| मसलन जब तक साँस है कमाकर देना है| लेकिन सबके साथ ऐसा कहाँ होता है कुछ भिखारी तो नशे और अपनी मौज मस्ती के लिए भीख मांगते है| कई साल पहले कनॉट प्लेस थाना पुलिस ने एक ड्रग्स तस्कर को गिरफ्तार किया है। उसके पास से ड्रग्स की 103  पुडिय़ा बरामद हुईं थी। पूछताछ में उसने बताया कि वह हनुमान मंदिर के पास बेघर लोगों और भिखारियों को ड्रग्स बेचता था। हालाँकि यहाँ पूजा, पाठ आरती भंडारे आदि को मंदिरों की शान समझा जाता है तो यहीं हाथ फेलाए फटे कपड़ों में भीख मांगते छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े गरीब निर्धन लोगों को भी देखा जा सकता है| मंदिर के सामने झोली फेलाए भक्त खड़े है तो उन भक्तो के सामने हाथ फैलाये भिखारी भी खड़े आसानी से देखे जा सकते है| क्या इस समुदाय में पैदा होने वाले बच्चे के नसीब में भीख मांगना ही लिखा है? उसके पैदा होते ही ये तय हो जाता है कि वो आगे चलकर सिर्फ और सिर्फ भिखारी ही बनेगा। अपने माँ बाप का दैनिक जीवन और जमाने की मौजूदा रफ्तार की अनदेखी इन्हें इससे आगे सोचने भी नहीं देती। ऐसे समुदाय अपने नसीब को ईश्वरीय देन मानकर उसी पेशे से जुड़े रहते हैं।
 हनुमान मंदिर के बाजू में मोहनसिंह पैलेस के सामने बैठे भिखारी  परिवारों में दो बुढिया सगी बहन है इन दोनों का पूरा परिवार नशे का आदी है| रिवोली सिनेमा के पास बने भूमिगत पैदल पार पथ के पास शाम को नशे हालत में अपने बेटे को जमीन पर लिटाकर आने जाने वालों के सामने भीख मांगती देखी जा सकती है| हर किसी को सुनने को मिल जाता है कि इसे भीख मत दो , नहीं तो यह शाम को जाकर शराब या भांग पिएगा और यह बात सच भी है। नशे के आदी लोगों को जब नशे के लिए पर्याप्त धन नहीं मिलता तो वह गलत तरीकों को अपना लेते हैं। इस टाइप के लोग या तो चोरी करने लगते हैं या फिर भीख मांगकर अपने नशे की लत को पूरा करते हैं। आजकल भीख मांगना केवल पेट पालने तक नहीं रह गया है। भीख मांगना अब कारोबार का रूप ले चुका है। आंकड़े के अनुसार राजधानी में लगभग 60 हजार के करीब  भिखारी हैं। इनमें से 30 प्रतिशत की उम्र 18 वर्ष से कम है। लगभग 67   प्रतिशत पुरुष और 30 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेकिन गैरसरकारी संगठनों का कहना है कि राजधानी में भिखारियों की संख्या एक लाख  से अधिक है। जिनमे से करीब 75 फीसदी भिखारी नशे के लिए भीख मांगते पाए जाते है| भीख ना मिलने पर कई बार नशे की लत के कारण यह लोग अपराध को भी अंजाम देने से नहीं चुकते|
  मानवाधिकार आयोग, बालश्रम आयोग, यूनिसेफ जैसी दर्जनों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं मिलकर भी इस अमानवीय उद्योग में कोई खास रोक नहीं लगा पा रही। हर बात पे हो हल्ला मचाने वाला मानवाधिकार आयोग रोज हो रहे इन बच्चों के मानवधिकारों के हनन पर चुप रहता है। बात-बात में झंडा ले कर खड़ा होने वाले सफेदपोश नेता उसी ट्रैफिक सिग्नल से अपनी मर्सिडीज से गुजर जाते हैं जिस ट्रेफिक सिग्नल पर ये भिखारी हर आते जाते लोगों के सामने गिडगिडाकर भीख मांगते है| मंगलवार हो तो हनुमान मन्दिर, गुरुवार हो तो साईं मन्दिर, शुक्रवार हो तो मस्जिद और शनिवार को शनि मन्दिर के आस पास भीख मांगने वालो की भारी तादात देखने को मिल जाएगी| लोग इनकी हालत देखकर इस डर की वजह से भी भीख दे देते ताकि उनके ऊपर ऐसी कोई विपत्ति ना आये| किन्तु यह कभी नहीं सोचते की जो दान स्वरूप धन हम इन लोगों को बाँट रहे है वो इनका पेट पालने के बजाय इनके नशे की लत की पूर्ति कर रहे है| एक स्वास्थ समाज में दान जहाँ धर्म की स्थापना करता है वही इनको मिला दान बेकारो बेरोजगारों नशे के सौदागरों की भीड़ जमा करता दिखाई देता है| लेख राजीव चौधरी