मैं
बचपन में समझ नहीं
पाती थी कि मैं कौन हूँ| मेरी इंग्लिश सहेलियाँ जब मुझसे बताती थीं कि वो अपनी अम्मी से हर
तरह की बातें करती हैं तो मुझे लगता था कि मैं क्यों नहीं कर सकती| नादिया का जन्म ब्रिटेन में
पाकिस्तानी मूल के परिवार में हुआ जहाँ उन्हें लड़कों से बात करने, मनपसंद कपड़े पहनने, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी नहीं थी| सेक्स जैसे
विषयों पर पाकिस्तानी समाज के रवैये पर भी नादिया ने सवाल उठाए--जहाँ
वे चुटकी लेते हुए कहती हैं, "पाकिस्तानी
समाज में सेक्स की कोई जगह नहीं है| दरअसल पाकिस्तानी समाज में तो सेक्स होता ही
नहीं| कितना अजीब है ना? आठ से दस बच्चे पैदा करने वाले लोग सेक्स का नाम लेना भी
मजहब के खिलाफ मानते है| यह सब आज की वो नारी बोल रही है, जो स्वतंत्र है, अपने
विचारों को लेकर, अपनी जिन्दगी की महत्वकांक्षा को लेकर| शायद उसने अपने अस्तित्व
की चादर में लिपटे प्रश्न को खोज लिया कि में
कौन हूँ??
मुझे
कई बार बड़ा अजीब लगता है जब में पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल पर नारी समाज को लेकर
होती बहस देखता हूँ, वहां कि मीडियाकर्मी जो खुद महिला है वो इस बात से परेशान है
कि पाकिस्तान में लड़कियों ने लाज शर्म के परदे क्यों लाँघ दिए और वो इसके लिए
भारतीय कल्चर मीडिया आदि को दोष देती कहती है कि पाकिस्तान में पाकिस्तान का अब
कुछ नहीं बचा| यहाँ सब कुछ भारतीय होता जा रहा है| बालीवुड के गीतों पर थिरकती
लाहौर मेडिकल कॉलिज की छात्राएं कहती है धर्म का आजादी से क्या मतलब आखिर हमें कब
तक दबा कर रखोंगे? कुछ भी हो पुरुषवादी सोच यदि कुछ जगह बदली तो कुछ जगह पुरुष
बिफरा| वो आज भी महिलाओं के मामले में पुरानी सभ्यता की बात करता दिखाई दे जाता
है| यूरोप में पिछले हजार वर्षो तक जिस नारी को आत्माविहीन समझा | और अरब में कहो
या इस्लाम में तो कपडे के अन्दर से बाहर आना नारी के कत्ल का कारण बन जाता था|
आज
सब कुछ बदला आज की नारी आधुनिकता की चादर में लिफ्टी हुई इतनी आगे निकल आई है कि
वह हर चीज
में खुद की खुशी ढूंढती है। पिछले दिनों ही पढ़ रहा था कि वह दूसरे का दामन थामने
और पहल करने में भी पीछे नहीं रहती। अब नहीं रहा वो झिझक का पर्दा! जिसको उसका
नारीत्व समझा जाता था| आधुनिकता में रची बसी आज की नारी के मन में प्यार और सेक्स
को लेकर पहले की अपेक्षा वो संकोच व झिझक नहीं रही है, जो कुछ सालों पहले थी। वह अपनी संतुष्टि
और अभिव्यक्ति को अपना अधिकर मानती है,जिसका परिणाम यह है कि आज वह खुले दिमाग
के साथ सेक्स के बारे में बातें करती है। वह अपनी इच्छाओं को
सामाजिक दबाव के कारण दमन नहीं करती, बल्कि बिना संकोच के सेक्स की पहल करती है, ताकि उनकी जरूरतों की पूर्ति हो सके। यह बात सही है कि समय
के साथ हर चीज बदल जाती है और महिलाओं की बदलती सोच का यह परिणाम है कि एक समय था जब महिला को जीवनसाथी चुनने व सेक्स मे
संतुष्ट होने का कोई अधिकर नहीं था। पर आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत क्योंकि आज स्त्री ने
मुखर होकर अपनी पसंद जाहिर करनी शुरू कर दी है कि उनके लिए भी सेक्स उतना ही जरूरी है
जितना कि पुरूषों के लिए। आज की लडकियां ज्यादा सक्रिय हैं। आज बहुत
सारी लडकियों के साथ भावनात्मक झझंट नही है। आज की आधुनिक नारी के लिए अब सेक्स गोपनीयता
का विषय नहीं रहा है आधुनिक विचारों ने महिला की ख्वाहिशों को भी एक नई उडान दी है और तो और दांपत्य जीवन में सेक्सुअल संतुष्टि की बात करें
तो अब लडकियां पहल करने में पीछे नही रह गई हैं।
महिलाओं
ने स्वयं के अनुभव के आधार पर, अपनी
मेहनत और
आत्मविश्वास के आधार पर अपने लिए नई मंजिलें, नये रास्तों का निर्माण किया है। पर यह नहीं है
उसकी सफलता के पीछे क्षण अंश भी किसी पुरुष के हाथ होने की सम्भावना को नकार दिया
जायेगा? बिलकुल नहीं तो फिर
समस्या कहाँ से आई? मैं
कौन हूँ का प्रश्न अभी भी नारी के पास किस उत्तर की आस में खड़ा हुआ? दरअसल
पारिवारिक रिश्तों में उसका अपमान, उसका तिरस्कार, उसकी अवहेलना उसे यहाँ तक खींच
कर लाई, उसके पूर्णतया समर्पण के बाद भी उसे शक्की नजरों से देखे जाना, मकड़ी की
तरह बेवजह आरोपों के जाल में लिपटी महिला ने यह जाल तोड़ डाला अपने हक के लिए लड़ी
भी मरी भी| पर आज उस मुकाम पर खड़ी हो गयी जहाँ पुरुष उसे यह कहने को मजबूर हो गया
मेम क्या में अन्दर आ सकता हूँ? लेखक राजीव चौधरी



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