हिंदुस्तान के अन्दर
एक दिन में दो घटनाओं का होना अजीब संयोग नहीं है इससे पहले भी इस तरह की अनेक
घटनाएँ हो चुकी है| किन्तु हर बार मुस्लिमों को संदेह की द्रष्टि से देखा जाता है|
किन्तु कुछ प्रसंग भूले नहीं जाते, कुछ साल पहले गाँव में मेरे पड़ोस में एक
मुस्लिम परिवार रहता था| उस परिवार का मुखिया मालदीन शेख ना तो दाढ़ी रखता था ना
टोपी लगाता था| हाँ कभी-कभी नमाज जरूर अदा कर लेता था, वो भी तब जब गाँव में दुसरे
गाँव से जमात इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए आती थी| कई बार जमात उसे कहती की
दाढ़ी टोपी रखनी चाहिए तो वो बड़ी शांत मुद्रा में पूछते की सल्ललाहो अलेही वसल्लम साहब ने कहाँ फ़रमाया है कि बिन दाढ़ी टोपी के मुस्लिम नहीं होता?
धर्म धारणा का विषय है दिखावे का नहीं जो ज्यादा दिखावा करता है वो धार्मिक होने
का स्वांग भरता है|
हमेशा बहस एक सच्चे मुसलमान और सच्चे हिन्दू पर होती है पर मुझे लगता है सच्चा
मुसलमान और सच्चा हिन्दू हमेशा साम्प्रदायिक पाया जाता किन्तु एक अच्छा मुसलमान और
एक अच्छा हिन्दू कभी भी मतभेद, पूजा उपासना की विधि को लेकर नहीं लड़ता| अब ठीक यही
कहावत पुरे विश्व पर लागु करे तो आज 80 फीसदी मुसलमान 20 मुस्लिमो के कृत्यों का
शिकार है और भारत में तो अजीब बिडम्बना कि पाकिस्तान की ओर से कोई आतंकी हमला होने पर भारतीय मुस्लिम बढ़ चढ़ कर, अपने बाक़ी काम छोड़ कर, नेट पैक खत्म हो तो उधार डलवा कर हमले की निंदा में जुट जाते हैं। शेष भारतीयों की सुविधा और विवेक पर निर्भर
है कि वह चाहे निंदा करें या न करें। लेकिन मुसलमान के लिए हर हमले के बाद, ख़ुद को पाकिस्तान परस्त होने की तोहमत से बचाने के गंगा स्नान जरूरी सा हो गया है|
अब पश्चिम बंगाल के मालदा को ही ले लो करीब 2
लाख लोगों को कमलेश तिवारी की गिरफ्तारी के एक महीने बाद याद आया कि उसने कुछ
विवादित बयान दिया था उन्होंने जुलुस निकालकर कमलेश तिवारी के लिए फांसी की मांग
की| अरे भाइयों भावनाएं तो सबकी होती है पहले बयान आजम खान का आया था जब कमलेश के
लिए फांसी मांग रहे हो तो आजम की गिरफ्तारी नहीं तो कम से कम इस्तीफा ही मांग
लेते| या जलूस के नाम पर संपत्ति स्वाह करने का ही इरादा था| किन्तु जिस तरह सब
मौलानाओं ने पठानकोट हमले की मजम्मत की वो वाकई सराहना का विषय है किन्तु एक बार मालदा पर भी जुबान खोलकर कह दो
कि इस्लाम में इस तरह के कारनामों की कोई जगह नहीं किसी की फांसी और रिहाई सविधान
तय करेगा ना की भीड़| पर ये लोग नहीं जानते इनके कारनामों के कारण 17 करोड़ लोगों को
संदेह से देखा जाता है| खेर मेरे पड़ोसी एक अधेड़ मियां जी अपनी जवान बीबी के संग
रहते हैं। बीबी के लिए यह ज़रूरी हैं कि वह घर के दरवाजे पर आने वाले दूधिया, अख़बार वाला या मीटर रीडिंग लेने वाले की ओर देखकर थूके। न थूकती, तो पिटती हैं। बड़े मियां अपनी रात की नाकामी का नज़ला कुछ यूँ ही गिराते हैं।
राजीव चौधरी
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