Friday, 5 February 2016

मनुस्मृति पर तांडव


प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक लाओत्से ने सत्य को लेकर कहा है, कि मै जो कुछ लिख रहा हूँ वो सत्य नहीं है, वो सिर्फ मेरा अनुभव है क्योंकि सत्य लिखा नहीं जा सकता उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है| रोहित वेमुला की आत्महत्या पर हीनभावना से ग्रसित चिंतको और विचारको ने एक फिर से मनुस्मृति को लेकर तांडव नृत्य पेश करना शुरू कर दिया है| पता नहीं क्यों!! मै खुद  कई वर्षो से इस विषय को लेकर सोचता हूँ, तो पाता हूँ कि जब जब कोई पिछड़े वर्ग में कोई कांड हो जाता तो मनु स्मृति को बहुत गालिया बकी जाती है किन्तु आरक्षण का लाभ लेते समय सविंधान की पूजा कभी देखने को नहीं मिलती| दूसरा जब तक आप खुद को हीन नहीं समझोगे भला कोई आपको कैसे हीन समझ सकता है?  जातिवाद की बीमारी खुद हमारे अन्दर जन्म लेती है,सिर्फ जन्म ही नहीं लेती जीवन के साथ चलती है| पहले तो यह बीमारी लाश के साथ जल जाती थी किन्तु अब तो राजनेता लोग अपनी नीति से पूर्वग्रही विचारो से जातिवाद की बीमारी के वायरस का पालन पोषण करते है|
मुझे नहीं लगता अब यह संसार धार्मिक ग्रन्थो से चलाने योग्य रह गया, क्योंकि लोग धार्मिक नहीं रहे लोग जाति और मजहब में बंट गये है और यदि कोई पुराने ग्रंथो से चलाना भी चाहेगा तो संसार का हाल मीडिल इस्ट जैसा होगा| दरअसल ना तो मनुस्मृति गलत ना समाज यदि गलत कोई है तो वो है हमारे राजनेता हमारा द्रष्टिकोण| हो सकता है, मनु महाराज ने उस समय को उस समाज को परिस्थितियों को देखकर मनुस्मृति लिखी हो? कोई जरूरी नहीं आज उनका इस्तेमाल हो| आज हमारे पास देश और समाज का नियत्रण करने को संविधान है, उसके अनुरूप हम चल सकते है| कुछ गलत होता है बदल देते है किन्तु परेशानी कुछ और है जो मैने पहले कहा था सत्य लिखा नहीं जाता वो बस स्वीकार करना पड़ता है| कई लोग आज समाज में ऐसे है जो मनुस्मृति को बेकार कहते है किन्तु वो समानता के गुणगान करने वाले सविंधान को भी गाली देते मिल जायेंगे|
इस प्रसंग में  मनु को लेकर मेरा द्रष्टिकोण थोडा भिन्न है| पहली बात तो यह कि मनु कोई धार्मिक गुरु नहीं थे| ना ही में मनु स्म्रति को धार्मिक ग्रन्थ मानता| क्योंकि उसमे धर्म का कोई जिक्र भी नहीं है वो सामाजिक ग्रन्थ था उस समय का उस समाज को नियंत्रित करने के लिए मनु महाराज समाज के स्कूल में एक अद्यापक कि तरह थे जो बस क्लास में अगली पंक्ति में बैठने वाले विद्यार्थिओं को समझदार मानते हो, पढ़ाते हो! जैसा की आमतौर पर सभी स्कूल में होता आया है” जिसमे क्लास की आंखिरी पंक्ति तक कुछ नहीं पहुँचता था और मनु की नजर में वो फिस्सडी बच्चे हो! जो पढना ही नहीं चाहते थे जिससे वो बच्चे हीन भावना से ग्रसित होकर मनु को अपनी शिक्षा दीक्षा का आजतक दोषी ठहरा रहे है| मै आज मनु स्मृति को अंगुली से चाँद दिखाना जैसा बस इतना समझता हूँ और उसी अंगुली से समानता का अवसर समानता का अधिकार रखने वाले संविधान पर बराबरी से कहीं ज्यादा लिखे हरफ दिखा सकता हूँ, मेरा सभी दलित, पददलित, अगड़े पिछड़े, जातिवादी विचारकों से इतना कहना चाहूँगा आप लोग हर एक हिंसा को जाति धर्म के चश्मे से ही क्यों देख्रते हो? ये कैसी हीन भावना है? आज आरक्षण है आगे बढ़ने के लिए ज्यादा अधिकार है| अब क्यों बिना वजह व्यवस्था पर अंगुली उठा रहे हो, या सिर्फ आपकी कलम प्रेम की स्याही की जगह विष की बुँदे से लिपटकर चलती है| खुद को हीनता की ग्रन्थि से मुक्त करो जातिवादी व्यवस्था प्रेम से ढह सकती है रोने-धोने आरोप प्रत्यारोप या हिंसा से नहीं| 
राजीव चौधरी

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