आजकल सहनशीलता के
प्रमाणपत्र बांटे जा रहे जिसको नही मिलता वो परेशान होकर मीडिया के पास आ जाता है
फिर मीडिया चिल्लाता है इसके पास सहनशीलता का प्रमाणपत्र नहीं है इसको भी दिया
जाये उसके बाद न्यूज़ रूम में चाय के कप हाथ में लेकर लम्बी –लम्बी बहस होती है, एक
दुसरे को देश का इतिहास भूगोल पढाया जाता है तब उससे पूछा जाता है कुछ दिन पहले
आपके पास जो सहनशीलता प्रमाण पत्र था वो कहाँ गया? दो राजनैतिक कम्पनी इस देश को
चला रही है एक 60 साल अपना माल बेचती रही अब दूसरी आ गयी उसका प्रोडक्ट नया है लोग
हजम नहीं कर रहे है कुछ को राजनैतिक अपच है तो कुछ को धार्मिक हालाँकि माल खोलकर
देखो तो बस रेपर बदला है माल पुराना ही है वैसे बाकि राजनैतिक कंपनियां भी है पर
झोला छाप है गलियों में अपना माल बेचती है आज कल उनका माल लोग कम पकड़ रहे है इस
वजह से देश के अन्दर एक अजीब किस्म का ड्रामा चल रहा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और
सोशल मीडिया का हाल कुछ ऐसा हो गया कि एक बार कोई बुढ़िया अपनी देहलीज़ पर बैठी रो
रही थी किसी राहगीर ने पूछा ताई क्यों रो रही हो? बुढ़िया ने भीगी पलके उठाकर कर
कहा- बेटे खाली समय था कुछ काम नही था तो सोचा थोड़ी देर रो ही लेती हूँ!!!
बिलकुल आज यही हाल आज देश के न्यूज़ चैनलों का हो
रहा है कुछ काम नहीं चलो सहनशीलता पर ही बहस करा लेते है और देखो कई बार जब अपने
मनमाफिक जबाब नहीं मिलता तो एंकर ही असहनशील हो जाता है फिर इसी बीच नई बहस चालू
हो जाती है कि आतंक का धर्म बताओ? फिर धमाल हो जाता हो जाता है, अचानक ब्रेक ले
लिया जाता है| इससे मुझे याद आया की जब मैं कक्षा 5 में था, तब स्कूल में सामान्य
ज्ञान की प्रतियोगिता चल रही थी दुसरे
स्कूल के भी विद्यार्थी आये थे, प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहे थे, हमारी टीम हारने
वाली थी कि अचानक मेरे बाजू में बैठे एक लड़के ने प्रश्न किया कि बताओ पिस्तो कौन
थी? इस पर दुसरे विद्यालय के बच्चों में कानाफूसी शुरू हो गयी और अंत में उन्होंने
हार मान ली अध्यापक महोदय ने पूछा बेटा अब तुम बताओ “पिस्तो” कोण थी!! लड़के ने सहज
भाव से जबाब दिया मास्टर जी पिस्तो हमारी गली में एक कुतिया थी जो अब मर गयी!
अब मेरी इस कहानी को
आतंक से जोड़कर नई बहस को जन्म मत देना ये बस एक कहानी थी कभी मेरा भी मोदी और वीके
सिंह वाला हाल कर दो बस एक बात थी जो ख़तम हो गयी हाँ में कह रहा था आतंक का धर्म
क्या है तो बता दूँ आतंक के कई धर्म है, एक तो बेरोजगारी, दूसरा गरीबी, तीसरा
संकोच, चोथा अल्पज्ञान, पांचवा बढती आबादी, छटा, धार्मिक प्रलोभन, सातवाँ
मरनोपरांत समस्त सुख सुविधा का काल्पनिक आनंद, आठवां उपेक्षा, नोवाँ जबरन अपनी
मानसिकता थोपना, दसवां इन सब में इन लोगों का साथ देना वो भी आतंक का धर्म ही होता
है| अब इसमें कुछ धर्म बचे हो आप जोड़ देना
क्योंकि धर्म एक ऐसी चीज है जो दिखाई नहीं देता पर खतरे में आ जाता है कई रोज पहले
पडोस के कई घरों में कटोरी लेकर गया था कि थोडा धर्म उधार ले लू बाद में लौटा
दूंगा मन थोडा दुविधा में था पर किसी के घर नही मिला फिर मस्जिद गया मंदिर गया
कहीं तो मिल जाये कटोरी लेकर खाली हाथ लौट कर आना पड़ा अब पता चला ताई क्यों रो रही
थी शायद यूँही रो रही होगी कि अरबों रूपये का मालिक धार्मिक बयान देता है पर
भुगतना गरीब को पड़ता है तो क्यूँ न उनके लिए रो लिया जाये जो धर्म बेचते है पर वो
कटोरी में नहीं मस्तिक्ष में भरकर भेजते है पीडीएफ फाइल बनाकर फिर कोई कुछ भी करे
इसके बाद मिडिया, राजनेताओ और धर्मगुरुओं का काम रह जाता है एक मुहावरा हैं ना
आसमान सर उठा लेना उसका अर्थ अब मीडिया और नेताओ को देखकर समझा किसी को देश के
बाहर नहीं करना चाहिए एक हिंदुस्तान ही तो ऐसा मुल्क है जो सांप और शिव दोनों को
दूध पिलाता है मैं यह कहूँगा जिसमें परोपकार हो वह धर्म है।
निःस्वार्थ भाव से त्याग निष्ठा से परिपूर्ण देश-सेवा सबसे बड़ा परोपकार और धरम है||||
राजीव चौधरी
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