Monday, 16 November 2015

यूरोप के खाली चर्च बिकाऊ है


पहले मैं सुनता था कि विदेशियों के एक दो बार पहने हुए कपडे भारत आते है और फिर उन्हें धोकर रेहड़ी पटरियों पर भारत व अन्य एशियाई देशों में बेचा जाता है, दरअसल आज इसाईयत भी पश्चिमी देशों के लिए एक ऐसी ही चीज बन गयी है जिसका उनके अपने निजी जीवन में कोई अर्थ नहीं रह गया है, और उसका उपयोग केवल बाहरी मुल्को में निर्यात के लिए रह गया है जैसे वो अपने पुराने कपडे पुरानी दवाई बाहरी मुल्को में बेचते हैं | ऐसे ही अब वो इसाईयत को बेच रहे है |
यदि आपको मेरी यह बात जरा भी विचलित करे  तो आप गूगल पर “यूरोप एम्प्टी चर्च ऑन सेल” यानि के यूरोप के खाली चर्च बिकाऊ है लिख कर भी देख सकते हैं इसका कारण है कि आज पश्चिमी देशों का अधिकतर नागरिक चर्च में जाना पसंद ही नहीं करता वो लोग अब इसे बेकार और समय बरबाद करने जैसी बाते मानने लगे हैं अब ईसाईयत को खुद खतरा अपने लोगों से हो गया हैं और वो लोग इस पंथ को बचाने के लिए  गरीब, व विकासशील देशों में फैला रहे हैं| इसाई पंथ को भले ही पुरुषों ने ईजाद किया हो पर आज यूरोप के चर्चघरों में अधिकतर महिला पादरी मिलेंगी या फिर ये कहो कि वो चर्च अब महिलाओं के क्ल्ब  बनते जा रहे हैं या फिर उन्हें अन्य धर्मो के लोगों को बेच दिया जाते हैं | नीदरलैंड के अनरहम शहर में कभी सेंट् जोसफ चर्च हुआ करती थी आज वहां बच्चे स्केटिंग करते दिख जायेंगे तो इंग्लेंड के सेंट् वाल चर्च में सर्कस के कलाकार प्रशिक्षण लेते मिल जायेंगे यह अकेली   चर्च नहीं  है जो श्रद्धालुओं के अभाव से जूझ रहे है   बल्कि कुछ जगह तो श्रद्धालुओं की अत्यधिक कमी के कारण चर्च या तो वीरान पड़े हैं या फिर शराबखानों  में बदल चुके है कुछ जगह चर्चघरों में दुकाने खुली हैं या फिर वो माल का रूप धारण कर चुके हैं| इंग्लेंड और स्कॉटलैंड की चर्च तो आपको ऑनलाइन बिक्री के लिए इन्टरनेट पर मिल जाएँगी एक ऐसी ही चर्च वह आठ महीने के लिए बाजार पर पड़ा है, जो उत्तर-पूर्व मिनीपोलिस में ब्रॉडवे और मध्य रास्ते के चौराहे के पास एक प्रेस्बिटेरियन चर्च है। जिसकी  कीमत  375,000 डॉलर है।
 अब यदि हम चर्च में जाने वाले लोगों के पिछले कुछ समय के आंकड़े देखे तो 1953 में जहाँ 53 प्रतिशत लोग प्रार्थना के लिए चर्च में जाते थे वहीं 1993 आते-आते  यह संख्या घटकर 40 प्रतिशत रह गयी थी जो अब और भी कम हो गयी है कहने को तो इसाई समुदाय में सामूहिक प्रार्थना में विश्वास किया जाता रहा है और सप्ताह में एक बार चर्च जाना जरुरी समझा जाता है लेकिन यूरोप के लोग आज इस सार्वजनिक प्रार्थना पद्धति से ऊब चुके हैं जिस कारण आयरलेंड में 48% इटली में 39% यूके में 12% और डेनमार्क में 5% लोग ही चर्च जाना पसंद करते हैं वैसे देखा जाये तो प्रार्थना कभी भीड़ में नहीं होती क्योंकि उपासना ध्यान एकांत का विषय रहा है पर फिर भी  कुछ पंथो में इसे ही उपासना का जरूरी अंग समझा जाता रहा है चाहें वो शुकवार की नमाज हो या रविवार की चर्च में प्रार्थना|  पर आज के आधुनिक जमाने में लोग विचारशील हो गये है जिस कारण वो भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहते इसी वजह से आज पश्चिमी देशों के पादरी उपेक्षित है हर साल बंद होने वाले गिरजाघरों की संख्या 40 हजार के करीब पहुँच गयी है और नये खुलने वाले चर्चो की संख्या 1000 है हालाँकि इसाई लोगो का चर्च में जाना उनकी आस्था का प्रतीक नहीं हैं क्योंकि वो लोग चर्च के बहाने अपना दिल बहलाने जाते थे पर आज बदलते परिवेश में भौतिक संसाधनों से मनोरंजन करता इसाई समुदाय गिरजा घरों से अपना मुख मोड़ चुका है और कभी अत्याधिक लागत से खड़े किये चर्च आप बिकने के विज्ञापनों की कतार में खड़े है| दरअसल झूट, फरेब और मानवता की हत्या के बल पर खड़े किये संगठन जिन्हें बाद में धर्म का नाम तक दे दिया आज खुद के जाल में फंस रहे हैं जहाँ इसाई प्रोटेस्टैंटों और केथोलिको के  बीच खड़ा है  कैथोलिकों और प्रोटेस्टैंटों की धार्मिक मान्यताओं में बड़े अंतर हैं। उसी तरह शिया सुन्नी के बीच फंसा इस्लाम दिखाई दे जायेगा लेकिन इनसे अलग यदि आज हिन्दू अपने धर्म से व्याप्त कुरीतियाँ और उसमे फैला अन्धविश्वास निकाल दे तो वैदिक धर्म की पताका पुरे विश्व पर फिर लहरा उठेगी इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है अमेरिका में आज सब भारतीय भाषाओँ में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है वहां की महिलाये भारतीय पहनावे को ज्यादा पसंद करने लगी हैं अब धर्म आपके हाथ में है उसे आप किस तरीके से जग के सामने रखोंगे !
राजीव चौधरी

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