पूरी
दुनिया में मजहब के नाम पर गुटबाजी और मजबूत होती नजर आ रही है। मुसलमानों को
बार-बार ये बयान देना पड़ता है कि इस्लाम का दहशतगर्दी से कोई लेना-देना नहीं है।
क्या दहशतगर्दी और मजहब का कोई रिश्ता है? 2013 से लेखकों, ब्लागरो और विदेशी नागरिकों की बेरहम हत्याओं ने बांग्लादेश को
खतरनाक देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया क्योंकि इन हत्याओं की जिम्मेदारी खुद
आतंकी संगठन लेते है. और
मजहब विशेष के नाम पर ये आतंकी संगठन दुनिया पर कौनसी विचारधारा थोपना चाहते है यह
कोई नहीं जानता.
कई बार तो इनके
धार्मिक मौलाना मौलवी ही इन मामलों पर मौन और निशब्द पाए जाते हैं. क्यों पाए जाते इस बात का कारण जानना
इतना महत्व नहीं रखता, विरोध
करना मतलब प्राण गवाना. कोई
भले ही इसे इनकी मूक सहमति कहता हो! किन्तु मैं इसे सहमति की बजाय भय कह सकता हूँ!”
अमेरिका, भारत ऑस्ट्रेलिया, अब पेरिस सच तो यह है लोग प्रलय से
ज्यादा आतंकवाद से डरे है! आज सभी धर्मो के अन्दर उदारवाद और कट्टरपंथ बीज पनप रहा
है किन्तु यदि आज कोई उदारवादी इस कट्टरपंथ पर गर्व करता हो तो आगे शर्मिंदा भी
इसी पर होना पड़ेगा क्योंकि दुनिया के आरम्भ में प्रेम था और अंत में भी प्रेम ही
होगा.
यदि आज डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए मजबूत दावेदार माना जा रहा तो
निसंदेह वो है क्योकि इसक बिसात बहुत पहले बिछ चुकी है. अमेरिका की जानी-मानी लेखिका और ब्लागर
पामेला जैलर अपने देश में बढ़ रही मजहबी मानसिकता के आतंक को लेकर मुखर है| दुनिया भर की जिहादी गतिविधियों पर नजर
रखते हुए वे आतंक की बारीकियों को समझने में जुटी है| वे कहती है यही लक्ष्य 1400 साल पहले था
और यही लक्ष्य आज भी है. तब
भी उदारवादी मुस्लिम जगत कट्टरपंथी मुस्लिम जगत से शिकस्त खा रहा था और आज भी वो
ही हाल है. जब कोई आतंकी खुद को
उड़ा लेता हैं तो लोग नासमझ बन यही कहते सुनते मिलते हैं कि वह तो बड़ा अच्छा लड़का
था. उसका अडोस पडोस का
व्यवहार भी बहुत अच्छा बताया जाता है आखिर किस तरह वो इस काम में लग जाता है?
दरअसल होता यह हैं जब कोई मुस्लिम हद से
ज्यादा मजहबी हो जाता है और वह फिदायीन बनने से गुरेज नहीं करता और
हिलेरी क्लिंटन कहती है कि हम इस्लाम से नहीं आतंक से लड़ रहे है, कुरान में ऐसा कुछ नहीं जो रूहानी जिहाद
की बात करता हैं.
पामेला
जैलर आगे लिखती 9/11 हमला करने वाले आतंकियों ने 90 बार अल्लाह हु अकबर के नारे
लगाये थे कोई मुझे बताये यह आतंकवाद इस्लामिक क्यों नहीं हैं? और अमन शांति के पक्षधर मुस्लिमों को यह
सच चुभता क्यूँ हैं?? जबकि
कुरान की आयत 3:151 की वह आयत क्यूँ नहीं चुभती जिसमें कहा गया हैं कि हम जल्दी ही
गेर मजहबी लोगों के दिल में खोफ बरपा देंगे? मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने कहा था हम उस मुकाम पर पहुँच
चुके हैं जहाँ कट्टरपंथी लोगों ने पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है. पामेला आगे लिखती है क्या यह बात हजम
हो सकती हैं 1.6 अरब मुस्लिम शेष दुनिया की 7 अरब आबादी को मार डाले ताकि सिर्फ
मुस्लिम फल फूल सके?
पामेला
के अनुसार अगर आप मुस्लिम नहीं है तो इस्लामी कानून के तहत आपके सामने तीन रास्ते
हैं या तो इस्लाम कबूल कर लो, इस्लामिक
झंडा उठाकर लम्बे चौड़े टेक्स चुकाओं मोलवियों की गुलामी में रहो जहाँ आपके कोई
बुनयादी अधिकार नहीं हैं या फिर मर जाओं वह लिखती है अमेरिकी नागरिको का कत्ल हो
रहा है और अमेरिका के वाममार्गी इस उम्मीद से खून सनी जमीन को झाड़-पोंछ कर रहे है. कि अमेरिका की जनता को कुछ नहीं दिखेगा जिस तरह राष्ट्रपति ने यह भी कहा, 'इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम
कितने ताकतवर हैं और हमारे पास कितनी मजबूत फौज है. अमेरिका अकेले दुनिया की
समस्याओं को नहीं सुलझा सकता.'
मुझे लगता है इसमें मुस्लिम जगत के विद्वानों, विचारको, और मानवता के पक्षधर लोगों को एक मंच पर
आकर इस सच को स्वीकार करना होगा. किसी भी मजहब की दीनी तालीम मानवता के लिए
मुक्कमल रास्ते नहीं खोज सकती आज उसकी जरूरत शांति की हम सबने बहुत लड़ाइयों के
बारे में सुना देखा जाना आओ अब आगे के इतिहास पर खून की छीटों की बजाय प्रेम और
सदभाव के गीत लिखे क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि आप अपने
विरोधी को जेल में कैद कर सकते हैं, लेकिन विचारों को बंधक बनाकर नहीं रख सकते.
लेख राजीव
चौधरी



No comments:
Post a Comment