Friday, 25 March 2016

मीडिया के लिए दुधारू बने बयानवीर?



पिछले कुछ दिनों से कन्हैया को लेकर मीडियाकर्मी और नेता एक अजीब शोर मचाये हुए है| जानी मानी लेखिका साहित्यकार अवार्ड वापसी करने वालो की मुखिया, नयनतारा सहगल ने तो कन्हैया का कद मोदी के बराबर माप दिया वो तो भला हो सीना नहीं मापा वरना छप्पन की जगह सत्तावन इंच कर देती| तभी अचानक शशी थरूर ने कन्हैया को अमर बलिदानी सरदार भगतसिंह के बराबर का क्रन्तिकारी बता डाला| सत्ता के साथ राज सुख चला जाता है| ऐसा सुना था, किन्तु सत्ता के साथ बुद्धि भी चली जाती है यह कल थरूर के बयान के बाद साबित हो गया|
पिछले कुछ दिनों से मीडियाकर्मियों के पास मुद्दे नहीं है मुद्दे है भी तो उनसे उनका सरोकार नहीं है| ना तो मीडिया को किसान की परवाह है ना गरीब की| उसे तो परवाह है बस अपनी टीआरपी की| न उसकी खबरे राष्ट्र के चरित्र को सही ढंग से पेश करने की रही है| कई बार तो लगता है जैसे मीडिया बस यह साबित करना चाहती है कि भारत चरित्रहीन देश है| यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है| साध्वी, योगी, ओवैसी, लालू आजम, केजरीवाल, साक्षी महाराज, और कन्हैया कहीं यह सब वो चेहरे तो नहीं है जो मीडिया के खेत में खड़ी फसल या दुधारू गाय भेंस जैसे हो? जब टीआरपी की भूख हो इन लोगों के मौखिक बयान राजनीति का पेट भरते से दिखाई दे जाते है| मुझे नहीं लगता कन्हैया के अन्दर कोई बड़ा परिवर्तनकारी राजनेता, समाज सुधारक या परिवर्तनशील युवा हो| उसके पास बस देशद्रोही भाषण है या अराजकतावादी नजरिया| किन्तु इन सब चीजों से देश का किसान मजदूर व्यापारी तो खुश होने से रहा? आखिर मीडिया और विपक्षी नेताओं को ऐसी खूबी नजर आई की उसे देश के अन्दर एक हीरो की तरह पेश किया जा रहा है ? राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता के पास कन्हैया से मिलने का समय तो है किन्तु अपनी पार्टी के विधायक हरकसिंह रावत से नहीं?

कहते है छोटी छोटी चीजें समाज के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। मसलन एक छात्र देश के प्रति यहाँ के लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था नहीं रखता और यह घटना किसी एक गांव की कस्बे या शहर की है, लेकिन बार बार टीवी पर दिखाने से प्रभाव क्या डाला? कि जैसे देश में छात्र आतंक का पर्याय बन चुके हैं। जबकि समाज में हजारों छात्रों ने देश की सेवा की भावना से समाज के प्रति अपना अच्छा नजरिया रखा, तिरंगे के सम्मान में कार्यक्रम रखे, किन्तु वह समाचार नहीं बन पाता क्या इस देश में नकारात्मक खबर ही अपनी जगह बना सकती है| कन्हेया ने देश विरोधी नारे लगाये कन्हैया प्रसिद्ध कन्हैया को थप्पड़ मारने वाला विकास प्रसिद्ध अब सुना है किसी ने जूता मार दिया| राजनीति के अन्दर केजरीवाल का जन्म भी कुछ इसी तरह होता है| हो सकता है आज यह चींजे हमारे लिए मनोरंजन या व्यंग का प्रसंग हो किन्तु इससे समाज में छोटे बच्चों पर तो विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वो सोचते हैं कि न्यूज़ चैनल का मतलब है- लूट हत्या,देशद्रोह और बलात्कार की घटनाओं का अड्डा है। वे सोचते हैं कि समाज भी शायद इन्हीं विसंगतियों से बनता है। समाज के पास सिवाय गंदगी के और क्या हैं? इसलिए समाज के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल गया है| अभी में पिछले दिनों एक खबर पढ़ रहा था जिसमे मीडिया का बहुत अच्छा विश्लेषण किया था कि मौजूदा वक्त में मीडिया हाउस में कारपोरेट की रुची क्या सिर्फ इसलिये है कि मीडिया से मुनाफा बनाया कमाया जा सकता है? या फिर मीडिया को दूसरे धंधो के लिये ढाल बनाया जा सकता है, तो सच तो यही है कि मीडिया कभी अपने आप में बहुत लाभ कमाने का धंधा रहा ही नहीं है। यानी मीडिया के जरीये सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दूसरे धंधो से लाभ कमाने के हालात देखे जा सकते है। पिछले कई सालों में मीडिया और पत्रकारिता का स्वरूप गिरने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि हर किसी की आगे जाने की चाह रही है और झूठी सच्ची मसालेदार खबरों का आदि बने भारतीय समाज ने सच्ची पत्रकारिता को अलग रख इसे ही सच मान लिया और दूरदर्शन जैसे चैनल को हाशिये पर डाल दिया| लेखक राजीव चौधरी

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