Wednesday, 14 October 2015

और फिर औरत की चीख गले में


पाकिस्तान के पाठ्यक्रमो में पढ़ाया जाता है कि हिन्दूस्तान में स्त्री दषा अच्छी नहीं थी जिस वजह ये सन 711  में मोहम्मद बिन कासिम ने हिन्दूस्तान पर हमला किया जबकि यह सत्य भी सब जानते है कि बिन कासिम ने राजा दाहिर की दो पुत्रियों के साथ बलात्कार जैसा घिनौना कुकुर्त्य  किया था। पर चलो एक पल को उनके विकृत्य इतिहास को सच मान भी ले तो क्या मुस्लिम देशो में आज स्त्री दशा को देखकर उन पर हमला कर देना चाहिये ?
कई रोज पहले एक महिला की हत्या का खौफनाक विडियों सामने आया है जिसे देखकर मेरी तो रुह कांप गयी। इस विडियों में कुछ लोग पुलिस के सामने हाईवें पर एक औरत का गला काटकर बेरहमी से कत्ल कर देते है। ये विडियों सऊदी अरब में मक्का शहर के पास का है। कहा जा रहा है कि इस महिला के पति ने ही इस पर अपनी 7 साल की बेटी की हत्या का आरोप लगाया था। इसके बाद सऊदी अरब के कानून शरियत के मुताबिक इसे सजा-ए-मौत दी गई और फिर पुलिस की मौजुदगी में सरेआम इसका कत्ल कर दिया गया। सजा से देने से पहले वो महिला चीख-चीख कर यहीं कहती रही कि मैने कत्ल नहीं किया, मैं बेगुनाह हूँ । पर शरियत तो औरत के मामले में बहरी है उसे कहां उसकी चीख सुनायी देती यदि शरियत को चीख सुनती तो वो कब की इराक में यजिदी समुदाय की बच्चियों पर हो रहे अत्याचार की न सुन लेती|  सिरिया में सुडान में अफगानिस्तान, यमन में उठी चीखें न सुन लेती। विडियों में दिखाया गया है कि सड़क पर कुछ लोग एक औरत को घेरकर खडें होते है। बुर्के से ढ़की औरत के हाथ पीछे की और बांध कर उसे सड़क पर बिठा दिया जाता गया। महिला रहम की गुहार लगाती रही,   मगर दरिंदों को कोई फर्क नहीं पडा। हाथ बंधे होने के बावजूद महिला अपनी मौत ठालने के लिये अन्तिम क्षण तक संघर्ष करती रही। लेकिन औरत को सड़क पर दिया जाता है। औरत रसूलल्लहा सल्ललाहो अल्लेही वसल्लम का वास्ता देती रही, रिहाई की भीख मांगती रही, लेकिन जल्लाद तलवार हाथ में उठाता है और फिर औरत की चीख गले में ही घुट जाती है। उसका सिर कलम कर दिया जाता है। 


अब यदि इस विडियो को देखकर गौर किया जाये तो यह बात साफ है की इस्लाम में औरत 21 वीं सदी में भी 1400 साल पुराना जीवन जीने को मजबूर है। माना कि परदा प्रथा किसी समाज की संस्कृति का हिस्सा तो हो सकता पर किसी को जबरन कपडें के अन्दर ठूंसकर पुरा जीवन गुलामों जैसा जीवन जीने को मजबूर करना यह मानवता का हिस्सा नहीं हो सकता! हांलाकि अज्ञानता के कारण कुरितियां सब जगह है, भारत में भी कुछ जगह ओरतों को डायन कहकर मरने की घटना प्रकाशित होती रहती है असम, बिहार, झारखण्ड छतीसगढ़ , बंगाल आदि पूर्वोत्तर राज्यों में कुछ जगह स्त्री की हालत आज भी दयनीय है पर इसे हम अंधविश्वास का शिकार होना कह सकते है लेकिन इस्लामिक समाज में कुरितियों को ही न्याय का हिस्सा समझा जाता है और औरत को सिर्फ दमन, शोषण  की वस्तु जैसे उसके  अन्दर प्राण न हों। पता नहीं निर्मम समुदाय की स्त्री के प्रति क्रुरता कब बंद होगी! इस तरह के निर्णय सुनाने से पहले एक सुत्र का वाक्य सदैव याद रखना चाहियें की स्त्री के दुःख इतने गंभीर होते है उसके शब्द उसकी चीखें उसका दर्द का दस अंश  भी नहीं बता सकती सिर्फ सहानुभूति के जरिये उसकी मर्म वेदना का किंचित आभास पाया जा सकता है। पर कहते है, जो भूक्त भोगी होता है वो ज्यादा जानता है यदि यहां  पर कुछ इस्लामिक मुल्कों की लेखिकाओं को पढे़ तो उनके अनुसार इस्लाम के अन्दर नारी जाति का  सम्मान न के बराबर है सबसे पहले तसलीमा नसरीन कहती है कि अन्य धर्मो के मुकाबले मुस्लिम स्त्री अपने धर्म में कैसे जीती है वह ही अच्छी तरह जानती है। क्योंकि उसे अपने ही परिवार के रिस्तों में स्नेह के मुकाबले वासना की द्रष्टि से ज्यादा देखा जाता है। इस बात की पुष्टि करते हुऐ ईरान मूल की सीरियाई लेखिका डॉ वफा सुल्तान ने इस्लामिक जीवन और रिस्तों नातों से परदा उठाते हुए अपनी पुस्तकए गॉड  हू हेटस उगांडा की लेखिका इरशद मांझी की पुस्तक द ट्रबुल विद इस्लाम टूडे पाकिस्तानी लेखिका फहमीना  दुर्रानी की पुस्तक माई फ्यूडल लार्डसोमालिया की अय्यान हिरसी अपनी पुस्तक द केज्ड वर्जिनआदि में इस्लामिक औरतों के जीवन पर प्रकाश डालते हुए और तसलीमा नसरीन का पक्ष लेते  हुए कहा तसलीमा ने जो लिखा वो अक्षर-अक्षर सत्य है और देखा जाये तो यह सब विभिन्न मुस्लिम देशो की लेखिका है पर इस्लाम में औरत के जीवन पर एक राय रखती है अब प्रश्न है यह कि क्या यह सब की सब जो इस्लामिक कानून की भूक्त भोगी लेखिकाये  गलत है,और इस्लामी कटटरपंथी हिंसक फतवें देने वाले सही है? 

मैं ज्यादा दूर नही जाता बस तसलीमा के विचारों की छोटी सी झलक दिखाता हूँ  उन के विचार में इस्लामी समाज में महिलाओं के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है। उन्हैं सिर्फ बच्चें पैदा करने वाली मशीन समझा जाता है। यदि कोई स्त्री इस पर बोलती है तो खुदा का खौफ दिखाकर तरह-तरह से जलील किया जाता है। अधिकांश जगह उनके साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाता है। इस्लामिक तलाक प्रथा पर तसलीमा कहती है पुरषों के द्वारा स्त्रियां लाना छोडना जूठे भोजन को फैकने जैसा है जिसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण अभी सोशल मीडिया पर देखने को मिला अरबी समुदाय के इस व्यक्ति ने शादी के तीन  दिन बाद अपनी पत्नि को तलाक देते हुए कहा कि फल मैंने चख लिया अब इसे रोज नहीं खा सकता। इस्लामिक जगत में स्त्री को हर पल जो सबसे बडा डर समायें रहता है वो है सिर्फ तलाक |

निस्संदेह यह एक कठिन और दुखद विषय है मुस्लिम समाज में स्त्रियों की स्थिति कानून से अधिक विचारधारात्मक है। मुस्लिम बुद्धिजीवी भी मानते है कि इस्लाम में  अत्याधिक पुरुष विचाराधारा है जिस में स्त्रियों का स्थान अत्यंत निम्न है पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिफार भूटटो ने अपने प्रथम विवाह की करुण गाथा सुनाते हुए स्वीकार किया थाः मैं अपने मजहब पर शर्मिंदा हूँ । बहूपत्नी प्रथा बेहद घृणित चीज है, कोई मजहब इतना दमनकारी नहीं जितना मेरा।,,  खैर तसलीमा व अन्य और इस प्रकार के सच बोलने वाले   लोगों को मीडिया कभी पनाह नहीं देता क्योंकि इस्लाम का सत्य सामने लाना एक वर्जित विषय है। इसी वजह से यह सब लोग हमारे थकाकथित उच्च बोद्दिक मीडिया वर्ग के लिए अछूत हो जाते है। राजीव चौधरी

5 comments: