उत्तर प्रदेश के
ग्रेटर नोएडा के गांव बिसाहडा इखलाक नाम के शख्स की हत्या वाकई एक निंदा का विषय है। जिसकी न तो मानवता और हमारा संविधान इजाजत
नहीं देता। खबर थी कि इखलाक अपने घर में गाय का मांस खा रहा जिस पर कुछ लोगों ने
मंदिर के लाउडस्पीकर से अन्य लोगों को भी बुला लिया और गौ माता की हत्या से
गुस्सायें लोगों ने इखलाक के साथ मारपीट की जिससे उसकी मृत्यू हो गयी हालांकि
हत्यारो को जेल और मांस को जांच के लिये भेज दिया गया है। पर जिस प्रकार भारतीय
मिडिया ने देश के सामप्रदायिक सोहार्द का बीफ बनाकर पुरे विश्व में प्रस्तुत किया
वो कहीं न कहीं देश लिए के बेहद शर्मनाक है
ऐसा नहीं है कि इस तरह
की अफवाह देश में पहली बार फैली और एक इखलाख की जान चली गयी अफवाह तो 26 जुलाई 2014 में सहारनपुर में एक मस्जिद की मिनार से भी फैली थी जिसे सुनकर दंगाईयों ने
सुबह 7 बजे से सिखों की दुकाने जलाने
और लूटने का काम शुरू किया और दोपहर 12 बजे तक लूटते रहे जिसमें
पुलिस के एक जवान की पीठ में गोली मार दी गयी 3 लोगों को जान गवानी पडी 38 लोग घायल हुऐ सैकडों दुकाने लूटने के
बाद आग के हवाले कर दी गयी। पर उस समय राजनीति और मिडिया मौन साधकर बैठ गयी थी
किन्तु आज राजनेता और मिडिया दोनों ने मिलकर अनूठा विलाप किया जिससे पुरा देश चकित
है कि क्या इतना शोर एक मुस्लिम की हत्या पर है, या एक अल्पसंख्यक की हत्या पर ? यदि मुस्लिम की हत्या पर है तो में
आपको बता दूँ सिरिया में आतंकियों की गोलियों से रोजाना सैकडों लोग दफन हो रहे है।
उनके लिये यह सात्वना की बीन क्यों नही बजती पाक अधिकृत कश्मीर में पाक सेना के
द्वारा मुस्लिम रोज पददलित होते है उनके लिए (युएनओ) को चिट्ठी क्यों नही लिखी
जाती ? दूसरा यदि वो अल्पसंख्यक समुदाय से है तो सरकारी आंकड़ो के हिसाब से तो सिखो
की संख्या मुस्लिमों से कम है तब उनके लिये यह मुआवजा और सात्वना क्यों नहीं
दिखायी गयी थी ? तीसरा इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने जो त्वरित कारवाही की
वह अति प्रशंसात्मक कार्य है, किन्तु यह प्रशासनिक कारवाही
यदि उत्तर प्रदेश सरकार कवाल में उन दो भाइयों सचिन-गौरव की हत्या पर होती तो शायद
मुजफरनगर दंगे का दंश लोगों को न झेलना पडता। चौथा अभी कुछ दिन पहले मेरठ में कुछ
बदमाशों ने एक फौजी वेदमित्र को इस वजह से पीट-पीटकर मार डाला की उसने लड़की के छेड़
छाड़ पर विरोध किया था तब उत्तर प्रदेश सरकार मीडिया और नेता चुप रही उसके परिजनों
को 45 लांख का चेक क्यों नही सोप दिया ?
खैर बात गौमांस भक्षण
करे तो हदीस कहती है, “कि गाय के दूध में शिफा है, इसका मख्खन दवा है और इसका
मांस नही खाना चाहिए और वेद कहता है- निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद 10/1/29 लेकिन भारत की सेक्यूलर जमात इस मामले पर राजनीती करने उतर गयी। कुछ लोगों ने
टवीट भी किये प्रख्यात अश्लील लेखिका शोभा
डे ने कहा, “में बीफ खा रही हूँ, हिम्मत
हैं तो मुझे मारो” अब इस सारे मामले को देखकर समझ आता है कि इन लोगों को रोकना
बडा मुश्किल ये गाय का बीफ भूख या स्वाद में नही खा रहे है बल्कि इसे भी जिहाद में
शामिल कर एक समुदाय को उकसाने के लिए खाया जा रहा है| समझदार को समझाने की जरुरत
नही और मुर्खो को यह बताना कि गाय का दूध अमृत और मांस विष समान है तो यह तब भी
नही नहीं मानेगे अतः इसके लिये सरकार को तुरन्त कडा कानून बनाना चाहिये। राजनैतिक
दलो को समझना होगा कि राजनीती की भेट गौ माता को न चढायें। मेडिकल चिकित्सा कहती है चाकू से हाथ कट जाये तो कई दिनो तक उसकी मरहम पटटी की जानी चाहिऐ पर हम
कहते ऐसे हालात ही क्यों पैदा किये जाये
कि मरहम पटटी की जरुरत पडें। लेकिन राजनेताओं की
दुकान तो संवेदना की मरहम और मुआवजे की पटटी से चलती आयी है। इखलाक के
परिजनों को सरकार व अन्य अलग-अलग राजनैतिक
दलों से करीब 45 लाख रुपये की आर्थिक सहायता
दी जा चूकी है। जबकि देश के लिये जान देने वाले जवान के परिजनों को 10 लाख रूपये धक्के खाकर मिलते है अब देश के राजनेताओ और मिडिया को जनता को यह
भी बताना
होगा सीमा की रक्षा करते हुए शहीद होना ठीक है या मांस खाकर मरने से ?
राजीव चौधरी
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