इंग्लिश साहित्कार
नयनतारा सहगल ने केन्द्र सरकार पर देश की संस्कृतिक विविधता कायम न रख पाने का
आरोप लगाते हुऐ उन्हें 1986 में दिया गया साहित्य अकादमी पुरुस्कार
लौटाने का घोषणा की है। गौरतलब है नयनतारा सहगल एक भारतीय अंग्रेजी लेखिका है, मई 1927 में जन्मी नयनतारा पंडित जवाहरलाल नेहरु
की बहन विजय लक्ष्मी पंडित की पुत्री है। नयनतारा सहगल उत्तर प्रदेश में दादरी की घटना से दुखी है और उन्हौनें अपना दुख व्यक्त करते हुए लिखा है, ‘दिल्ली से सटे दादरी में मोहम्मद अखलाक
नाम के एक शख्स का गौमांस खाने की अफवाह के बाद बर्बर तरीके से कत्ल कर दिया जाता
है, इन सब मामलों में
इंसाफ की हार हुई है इस घटना ने मुझे घुटनों पर ला दिया है।“ इनके साथ एक और लेखक अशोक बाजपेयी भी इस घटना से दुखी होकर अपना साहित्य सम्मान लौटाने की घोषणा कर चुके
है अब प्रश्न यह कि इन सबको विरोध जताने के लिये इखलाक की मृत देह ही क्यों नजर
आयी ? जबकि देश तो इससे पहले भी सैंकडों धार्मिक, जातीय उन्माद झेल चुका है। नयनतारा जी को
1986 में पुरुस्कृत किया गया और अक्टूबर 1989 में बिहार में भागलपुर दंगा हुआ क्या उस समय नयनतारा जी के घुटने नही
टिके! 1989-90 में कश्मीर में हजारो कश्मीरी पंडितो को
धार्मिक उन्माद के चलते मारा गया उनके घर-बार छीने गये बांग्लादेश में हिन्दूओं पर
अत्याचार हुए तब आपका हिंसा का मापदंड क्या था? इसके बाद 1992 अयोघ्या विवादित
ढांचा इसके बाद मुंबई में श्रंखलाबध बम विस्फोट करीब हजारों लोगों की जान मुस्लिम धार्मिक उन्माद में चली गयी जिसे वो बाबरी मस्जिद का बदला कहते है। तब यह सम्मान क्यों नही
लौटाया अभी क्यों? इसके बाद सितम्बर 2008 में दिल्ली दहल गयी लोगों की जाने गयी
लोग घायल हुए देश के लोकतंत्र के मन्दिर संसद भवन पर हमला हुआ देश के जवान शहीद
हुए मुजफ्फरनगर में धार्मिक उन्माद के कारण दो भाईयों की सैकडों लोगों ने पीट-पीट
कर हत्या कर दी गयी लोग प्रशासन से कार्यवाही की मांग करते रहे तब क्या आपके घुटने
नहीं टूटे, धार्मिक सांस्कृतिक भावनाएं किसी एक समूह
समुदाय की बपौती नही है न ही लोग हमेशा किसी के कहने पर हिंसा पर उतारु होते यदि
पैगम्बर के चित्र बनाना किसी देश में कानूनी रुप से अनुचित नही लेकिन एक मुस्लिम
के समुदाय के लिये यह धार्मिक रुप से अनुचित है यदि वो लोग चित्र बनाने पर दूसरे
देशो में भी जाकर लोगों को मार सकते है तो वही स्थिति भारत में गाय को मार कर खाने
पर बन सकती है क्या हिन्दू धर्म का मजाक बनाने वाले हिंसा की चपेट में नही आ सकते? दादरी की घटना ने अकेली नयनतारा को ही
नहीं तोडा बल्कि इससे पूर्व कोई शोभा डे है। 1948 में मुम्बई में ब्राहम्ण परिवार में जन्मी शोभा डे भी लेखिका
कही जाती है, काल्पनिक कहानियों
में अश्लीलता के घालमेल का सिरका डालकर अचार तैयार करने तक सिमित है। उसने अभी-अभी बीफ खाया है वह खुद
कहती है कि, “मैने अभी-अभी गौमांस खाया है, आओ, मेरा कत्ल कर दो।“ यदि उसके मुताबिक कहू तो टवीट के बाद बैचेन रही होगी कि काश ! उसकी तरफ कोई गुब्बारा ही
उछाल दे और मिडिया को काम मिल जाये। दरअसल दुनिया
में रोजाना हजारों लोग मरते है पर इखलाक की मौत मलाई है इन कथित बुद्धिजीविता के
ठेकेदारो के लिये है, इंसान इनके लिए मौसमी फल है मौसम आते ही टूट पडों गले तक ठूस लो और फिर
मौखिक रुप से उल्टियां करो। जस्टिस काटजू जो खुद ब्राह्मण परिवार से है उसने तो
पहले ही बीफ बेन का विरोध किया था इन सब
के बयान के बाद एक तीसरे स्वामीनाथन एस अंकलेष्वर अय्यर यह
दक्षिण भारत के ब्राहम्ण कुल से है यह कहते है, “कि एक उदारवादी के तौर पर मैं हमेशा इस बात का प्रबल सर्मथक रहा हूँ कि किसी भी व्यक्ति को उसके
मन की चीज खाने की अनुमति होनी चाहिए। लेकिन
मैं भवभूति के नाटक के आधार पर ही यह दावा करता हूँ कि बीफ खाने का अधिकार प्राचीन
हिंदू परंपरा का रहा है। एक ब्राहम्ण के तौर पर मैं वशिस्थ मुनि के पदचिन्हों पर
ख़ुशी से चल रहा हूँ । इन लोगों को देखकर सहज प्रतीत होता है कि ये अजीब किस्म के बोद्धिक आतंकवाद से पिडित लोग है जो
मांसाहार के सेवन से अपनी मति भ्रष्ट कर भारत की अतिप्राचीन संस्कृति ऋषि मुनियों
तक को मांसाहार से लपेट रहे है। अब प्रश्न यह है इन घटना से
दो वर्ग सामने नकल कर आये एक तो वो गौमांस के प्रतिबन्ध
से दुखी थे दूसरे वो जिनके जेहन में एक विषेश वर्ग के लिये अकूत सात्वना छिपी थी चलो हम मानते है यह घटना
निंन्दनीय थी पर इतना भी निंदा का विषय नहीं था कि पूरे विश्व में आंसूओं के कटोरे
उठाये फिरे हिंदू उन्मादी नही है यदि होता तो
कश्मीरी पंडितो के साथ केरल में बंगाल में आसाम में वह रोज धर्म की चक्की में न
पिसता फिर भी किसी घटना पर यदि कहीं हिंसा पर उतारु होता है तो उसके लिये भारतीय
संविधान का पालन भी करता है न कि पूरे विश्व में भारत को बदनाम करता नयनतारा जी आप
कश्मीरी पंडित हो अच्छा होता आपके घुटने उन विस्थापित पंडितो के लिये दर्द करते जो
अब विस्थापित जीवन जीने को मजबूर है न कि इस घटना पर जिसमे अपराधी जेल में है
राजीव चौधरी
जिस देश मे साहित्यकारों का सम्मान नही होता वह देश कभी खूशहाल नही हो सकता.सरकार को साहित्यकारो की सुननी चाहिये,
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